माँ पर कविता (mother's day)
(अतुकांत कविता)
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हम सब हैं तुम्हारी रचना ,
तुम पर क्या रचे हम माँ!
न शब्द ,न शास्त्र, न लेखनी कोई,
जो तुम्हें परिभाषित कर सके माँ ।
ऐसी दीया जो खुद जलकर ,
हमे रौशन करती हो माँ.
आकांक्षा आसमान से ऊंचा,
ममता तेरी पृथ्वी से भारी है माँ.
गर्मी में सघन साया बन जाती,
जाड़े की नर्म धूप हो माँ.
तेरे स्नेह रसधार के आगे,
सागर भी 'कूप' दिखता है माँ .
कलेजे के टुकड़े को अपनी मौत तक ,
कलेजे से लगाए रखती हो माँ.
चोट हमें जब-जब लगती ,
घायल तुम होती हो माँ.
ईश्वर प्रार्थना सुने
न सुने ,
बिन बताए इच्छा पूरी करती हो माँ .
प्रभु क्षमा करें ना करें, तुम हर खता माफ करती हो माँ .
परमात्मा नतमस्तक तेरे आगे,
उन्हें भी तो, तुम पाली हो माँ ,
मौत के लाख बहाने होते,
जन्म के लिए सिर्फ तुम ही हो माँ.
हर मुश्किल में साथ निभाती,
निस्वार्थ प्रेम की मिसाल हो माँ .
इंसान के रूप में ही नहीं,
प्राणी मात्र के लिए देवी हो माँ.
संसार का नजारा बहुत प्यारा होता,
काश!' किस्मत की लेखनी' पा जाती माँ. परमात्मा ने भी यही कहा है,
उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति तुमही हो माँ.
बच्चों के लिए हर पल बेचैन रहती,
चैन की नींद, चिता पर सोती है माँ.
फौजी देश पर कुर्बान होते,
प्रथम कुर्बानी देती है माँ.
"मदर्स डे"क्या मनाना!
हर क्षण तुम्हारे नाम है माँ.
सुषमा सिन्हा
वाराणसी
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