banner

Pre-booking of books by the author started...

Books by Author Lovekush Kumar

Explore the books by author for excelling in your discipline.

Read Now

Physics

Explore for detailed physics solutions and tips.

Read Now

Society

Explore more about ideas and inspiring actions for a better society.

Read Now

Excellence

Explore more about ideas and inspiring actions for a better society.

Read Now

Human Values

Explore more about ideas and inspiring actions for a better society.

Read Now

Education

Explore more about ideas and inspiring actions for a better society.

Read Now

Appreciation and Promotion

Explore for "promotable images/quotes" at your social media for a better society.

Read Now

कुछ सवाल

सामाजिक स्थिति को लेकर कुछ जरुरी सवालों के लिए क्लिक करें।

अभी पढ़े

लघु कहानियां

लेखक द्वारा सामाजिक तानेबाने पर लिखित कुछ कहानियों के लिए क्लिक करें।

अभी पढ़े

भौतिकी (Physics in Hindi)

हिन्दी में भौतिकी की समझ को बेहतर करने के लिए क्लिक करें।

अभी पढ़े
Banner 2
Banner 3

Recent Articles

दसवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 10-05-2026

बीते रविवार (10-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से दसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

ब्राह्मण की बेटी – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

जीत आपकी- शिव खेड़ा

संबंध और क्या है जीवन- आचार्य प्रशांत

  • पढ़ने का उद्देश्य जीवन के लिए रोटी कमाने तक सीमित न हो, बल्कि इससे आगे बढ़कर एक सार्थक जीवन के लिए खुद को तैयार करना हो|
  •  निर्णय निर्माण के लिए समय देकर, स्वयं की जरूरतों की समीक्षा करें, अपने असल जरूरतों को समझें और जो जरूरतें अभी महसूस हो रही हैं उनकी प्रासंगिकता के बारे मे अच्छे से विचार करें, दूसरों को देखकर अपनी प्राथमिकताएँ न बनाएँ, पहले स्वयं को समझें फिर अपनी जरूरतों को
  • जिस दिन आपको अपनी असली जरूरतों का पता चल जाएगा आपको बाहर से प्रेरणा की जरूरत महसूस न होगी
  • हौसला आता है स्पष्टता से, इसीलिए अध्ययन करें
  • सफलता और असफलता की भावना से ऊपर उठ जो जरूरी है वो करें, पूरा प्रयास और सही कार्य के लिए प्रयास अपने आपमें एक जीत है, सबसे पहला कदम सही काम के चुनाव का|

  • परिस्थितियाँ हमे सिखाती हैं, यदि आप एक उचित और जरूरी कार्य के लिए प्रयासरत हैं तो हार न माने
  • अध्ययन के बाद यदि आपकी समझ मे कुछ बेहतरी न आए तो आपको विचार करना चाहिए कि क्या वाकई पढ़ना सार्थक रहा?
  • खुद को खुलकर ईमानदारी से अभिव्यक्त करें ताकि आपसे इत्तेफाक रखने वाले लोग आपसे जुड़ सकें और आपके कार्यों मे सहयोग कर सकें
  • परिचर्चा को ऐसे संचालित करें जैसे कि हम सब एक कमरे मे बैठे बात कर रहे हों |
  • परिचर्चा में, सक्रिय रहें, पूछे जाने पर प्रतिक्रिया जरूर रखें ताकि परिचर्चा को एक दिशा दी जा सके
  • “जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना जरूरी है”- एक शेर का हिस्सा

  • स्वीडन यदि पूरी तरह डिजिटल हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को फिर से किताबों पर ला रहा तो क्या इतना काफी नहीं है हमारे लिए किताबों और पुस्तकालय के महत्व को समझने के लिए!
  • साहित्य को प्रोत्साहित करके हम इसी दुनिया को जिसमें हम रहते हैं, एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं जहां लोगों में प्रेम हो, संवेदनशीलता और हो आपसी सम्मान
  • फोन देखते देखते सो जाने से बेहतर है एक किताब पढ़ते पढ़ते सो जाना, असर आपको अगले दिन ही दिख जाएगा, साहित्य का चुनाव ढंग का हो|
  • पुस्तकें हमारी भाषा शैली को बेहतर करती हैं, हम लोगों को बेहतर समझ पाते हैं और उनसे तालमेल बिठाना आसान हो जाता है|
  • आप किसी भी विधा के विद्यार्थी हों, हर महीने 2-3 पुस्तकें पढ़ने का उद्देश्य रखना आपको कई मामलो मे बेहतर कर सकता है, जीवन के संघर्षों के लिए आपको तैयार कर सकता है और साथ मे मिल सकती है आंतरिक शांति और स्थिरता|
  • यदि आपमें बातचीत से लोगों के साथ जुड़ाव बनाने की चाहत है तो नियमित पुस्तकें पढ़ना न केवल आपको बेहतर शब्द दे सकता है साथ ही कार्यालय और व्यक्तिगत जीवन मे लोगों के साथ समन्वय बनाते हुये, खुद को अभिव्यक्त करते और दूसरों को समझते हुये आगे बढ़ने मे मदद कर सकता है|
  • पुस्तकें आपकी विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं जबकि विडियो मे काफी कुछ समझा देने और विजुअल जोड़ देने से हमारे दिमाग़ को जानकारी प्रोसैस करने की जरूरत कम पड़ती है और नतीजा कि हमारी  विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता का उपयोग न होने से इनमे बेहतरी कि गुंजाइश घट जाती है और इस तरह कुछ सृजन करने की संभावना भी| इसीलिए पुस्तकों का साथ बनाएँ रखें|
  • हमे विश्वास है कि जब लोग पढ़ना शुरू करेंगे तो समाज बेहतरी की ओर अग्रसर होगा, वही समाज जिससे प्रभावित हुये बिना हम नहीं रह सकते
  • कुछ लोगों मे इतनी स्पष्टता है कि वह सही नियत से एक काम में लगे हैं तो निरंतर अपने प्रयास को बढ़ ही रहे हैं बिना इस बात की परवाह के कि अभी वर्तमान मे उनका प्रयास कितना कारगर है क्योंकि सही नियत से किया गया काम बिलकुल उसी तरह है जैसे एक बीज को माहौल, खाद और पानी देकर पौधे से पेड़ और फिर फलदार पेड़ बनने तक उसके लिए लगे रहना|
  • कभी न भूलें कि आज जिन भी चीजों और मूल्यों का लाभ हम ले रहे हैं वह कहीं न कहीं हमारे पूर्वजों द्वार बहुत त्याग और संघर्ष से अर्जित किया हुआ है, चाहे वह आजादी हो या लोकतंत्र, इसीलिए हमे भी अपने बुढ़ापे और आने वाली पीढ़ी को सही और सुरक्षित हवा, जल और माहौल मिल सके, इसके लिए काम करना होगा, इसमें भी हमारे अकेले से काम न चलेगा, हम अगर एक एक पौधा लगा रहे हैं तो हमें ये देखना होगा कि कोई एक साथ हजारों और लाखों पौधे क्यों उजाड़ रहा? उसकी समझ पर काम करना होगा|
  • प्रयास करें कि रोज कम से कम एक पेज ही पढ़ लो एक पुस्तक से 
  • जब मातापिता और घर के बड़े स्वयं ही पुस्तक लेकर पढेंगे तो उन्हें देख घर के बच्चे भी पुस्तकों के तरफ आकर्षित होंगे, और ये आकर्षण जुड़ाव में बदल पाए इसके लिए जरुरी है कि घर में उम्दा, रोचक बाल साहित्य के रूप में रंगबिरंगी किताबें मौजूद हों|
  • इसे परिचर्चा में शामिल होना भी एक तरीका है अपने जीवन अपने दिन को सार्थक करने का |
  • जीवन सम्बन्ध है। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध, प्रकृति से सम्बन्ध, समाज से सम्बन्ध।

  • इन सम्बन्धों का आधार क्या है?

  • क्या है हमारे सम्बन्धों की वास्तविकता ?

  • क्या हमारे सम्बन्ध डर, लालच, मोह, आसक्ति की छाया मात्र हैं, या ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं? 

  • क्या हमारे सम्बन्ध अकेलेपन से बचने के उपाय हैं, या आन्तरिक पूर्णता का प्रस्फुटन ? 

  • और क्या है, सच्चा प्रेम? 

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

अंशिका शर्मा मैम, हिमांशु जोशी जी, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अंजना वर्मा, आरती मैम, अरविंद कुमार, धर्मेंद्र शर्मा सर, शोभित, प्रिया शर्मा, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, विजय कुमार, प्रिय कश्यप और कर्ण भाईजी|

कुशल और श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन कर्ण भाईजी ने किया|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

 

अगली परिचर्चा 17 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

Read More
प्रस्फुटन (कहानी) - शीतल भट्ट

"एक मजेदार कक्षा के साथ, सीखने, खुलने, निखरने और बेहतरी के सफर पर एक संकोची लड़की के एक मुखर व्यक्ति बनने की कहानी" 

 

शालिनी बहुत ही चुपचुप रहने वाली लड़की है। पहले वह स्कूल में अक्सर अपना सिर नीचे ही रखती,वह कभी सवाल नहीं करती थी। समझ न आने में सर को बताती नहीं थी कि उसे समझ नहीं आ रहा है। उसके लिए स्कूल जाना सबसे बोझिल कामों में से एक था। स्कूल और वहां के माहौल ने उसकी तरफ कभी कोमल हाथ नहीं बढ़ाया, बचपन से ही टीचर के लिए डर और अपने साथियों द्वारा उसका मजाक बनाए जाने का ऐसा असर हुआ कि स्कूल उसके लिए किसी यातना शिविर सा बन गया।

वह हमेशा दबाव में रहती, डर उसके ऊपर इतना हावी हो गया था कि वह हमेशा डरी-डरी रहती। ऐसा करते-करते शालिनी ने आठवीं पास कर लिया। वह घर में बहुत खुश रहती, वहां वह सहज हो पाती। मां के साथ घर के काम में हाथ बटाती। स्कूल से आते ही मां को खोजते हुए खेतों में पहुंच जाती थी।

शालिनी को लगता स्कूल जाने से अच्छा यह होता कि वह अपनी मां के साथ घर और खेतों का काम कर पाती। लेकिन स्कूल तो जाना ही था,उससे बचना नामुमकिन सा था। अब उसका दाखिला बड़े स्कूल में हो गया। वह नौवीं में पहुंच गई थी। तमाम तरह की शंकाएं और उस स्कूल के बारे में सुनी बातें उसे रह रहकर डराती। वही डर में वह खुद को फिर से सहमा हुआ पाती जहां से वह अभी अच्छी से निकली भी नहीं थी। नया स्कूल सच में बड़ा था ,वहां बहुत सारे बच्चे थे। टीचर भी बहुत सारे।यह नजारा उसके लिए आश्चर्यजनक करने वाला रहा।

एक दिन उन्हें कक्षा में एक अध्यापक पढ़ाने आएं। सोमेश सर ,जो उन्हें सामाजिक विज्ञान पढ़ाते थे। पहली बार तो वह सर के व्यवहार को देखकर अचंभित हो गई कि कोई अध्यापक ऐसा भी हो सकता है। वह बच्चों से लगातार प्रश्न पूछने को कह रहे थे। बिना किसी डर के वह पहली कक्षा थी जहां शालिनी को राहत सी महसूस हुई।

सोमेश सर ने बहुत सारी बातें बताई। किताबें,समाज और साथ में स्कूल के पुस्तकालय की भी। शालिनी ने आज तक अपने जीवन में पुस्तकालय नहीं देखा था। सच बात तो यह थी कि पाठयपुस्तक के अलावा उसने कोई किताब देखी ही नहीं थी। सोमेश सर के मृदु और बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार का यह असर होने लगा कि शालिनी दबे पांव पुस्तकालय का रुख करने लग गई। वह सहमी सी जाती थी,एक कोने में जाकर बैठ जाती थी। उसके लिए वह पुस्तकालय किसी अजूबे से कम न था।टेबल पर बहुत सारी पत्रिकाएं बिखरी हुई थी। अलमारियों में बहुत करीने से किताबें लगी थी

दीवारों में बच्चों के हाथों से लिखे हुई कुछ लंबे से पोस्टर टंगे हुए थे। बाद में सर ने बताया कि यह दीवार पत्रिका है। जो वहां के बच्चों ने स्वयं बनाई है। इसमें कुछ भी लिख सकते हो,जिसे किसी किताब से नहीं उतारना बल्कि अपने भीतर की दुनिया में जो चल रहा है उसे कागज में उतारना है,बिना किसी संकोच के। उसे पहली बार महसूस हुआ कि बच्चों को भी स्कूल में सम्मान दिया जाता है। यहां कुछ न आने पर सिर्फ उन्हें मारा या डांट नहीं लगाई जाती बल्कि उनके हिस्से की दुनिया रचने की आजादी भी दी जाती है।

इस तरह से शालिनी सर के साथ धीरे धीरे घुलने मिलने लग गई। अब वह सर के सामने वाली बेंच में बैठी रहती। इंटरवल होते ही पुस्तकालय आ जाती। पत्रिकाएं पढ़ती। यह उसका पसंदीदा काम होने लगा। सोमेश सर के पढ़ाने का अंदाज सबसे निराला था। उनके कक्षा में सन्नाटा कभी भी जगह नहीं ले पाया,वहां बच्चों की हंसी, बच्चों के प्रश्न और विषय से संबंधी किसी बात पर अपनी बात रखते बच्चों का शोर कक्षा को जीवन्त बनाएं रखता था।हर किसी की बात सुनी जाती, बहुत बार तो ऐसा होता कि बच्चे सर की बात से सहमत नहीं होते, उसके एवज में स्वयं तर्क करने लगते, फिर भी पूरा माहौल खुशनुमा बना रहता। यह सब शालिनी को भीतर ही भीतर गुदगुदाता । उसने आज तक ऐसा दृश्य न देखा था न कभी कल्पना की थी। उसने एक ऐसे अध्यापक की कल्पना किसी सपने में भी नहीं की थी। उसका बालमन सर की तरफ आकर्षित होता जा रहा था। वह सोमेश सर ही थे जो उसे हर वक्त लाइब्रेरी में मिलते। शालिनी का यह पहला परिचय था पुस्तकों से। उसे किताबों की रंग बिरंगी दुनिया अपनी सी लगती। वहां कोई उसे उसकी कमजोरी से नहीं आंकता था, बल्कि अपनी क्षमताओं से मिलाता।सोमेश सर बच्चों के विचार व्यक्त करने और पढ़ने के बहुत पक्ष में रहते,यही कारण था कि बच्चों की चहलकदमी सर के आस पास बनी रहती।

एक दिन शालिनी इंटरवल में लाइब्रेरी में बैठी थी, तब ही स्कूल में बनने वाली दीवार पत्रिका के लिए नए संपादक मंडल का चुनाव हो रहा था। सर ने शालिनी से भी पूछा कि क्या वह भी संपादक मंडल की सदस्य बनना चाहेगी।सर के सामने वह सिर्फ हां बोल पाई थी। लेकिन उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे लगा हां यही तो चाहती थी वो। उसके बाद उसका लेखन शुरू हो गया। जिसे सोमेश सर ने काफी सराहना शुरू किया। इसका असर यह होने लगा कि सर की कक्षा में उसका डर निकलने लगा। वह सभी चीजों में बढ़ चढ़ के प्रतिभाग करने लगी। सर के सिखाने का ही तरीका था कि उसके भीतर कभी गौरवबोध नहीं आया। सोमेश सर सभी बच्चों को एक समान मानते। किसी को सिर्फ इसलिए तवज्जो नहीं देते थे कि वह अच्छा बोलता है या पढ़ने में अच्छा है। वह बच्चों की तरफ से आने वाली शिकायत में भी तटस्थ बने रहते। उन्हें कभी शालिनी ने किसी की तरफदारी करते नहीं सुना। हालांकि वह बच्चों के लेखन को सार्वजनिक रूप से सराहते। शालिनी को अब पढ़ने में आनंद आने लगा,सामाजिक विषय उसका पसंदीदा विषय बन गया। उसे सोमेश सर के पढ़ाने का बेसब्री से इंतजार रहता।वह एक दिन भी घर में नहीं रहती,रोज स्कूल में जाती,अब वह पहले से ज्यादा चीजों को सीखने की कोशिश करती।

शालिनी धीरे धीरे आत्मविश्वास से भरने लगी थी। वह किसी न किसी बहाने से सर के आस पास रहती,उनसे बातें करती। सर का स्नेह ही था जो उसे सीखने को प्रेरित कर रहा था।अब उसने अपने आस पास समाज को ज्यादा  बारीकी से देखना शुरू कर दिया। सर ने उसकी यह भ्रांति भी तोड़ी कि सिर्फ स्कूल की चारदीवारों के भीतर और पाठयपुस्तकों से ही सीखा जाता है। वह किताब को समाज से जोड़कर पढ़ाया करते थे। उनमें अक्सर गांव के गरीब व्यक्ति की कहानी, सस्ते गल्ले की दुकान वाले का इंटरव्यू , अगर आप प्रधानमंत्री बन गए तो क्या करोगे, इस तरह के विषय शामिल रहते। इन सबको वह बड़ी ईमानदारी से करती।

उसे सर को दिखाने का उतावलापन रहता, उसने कैसा लिखा है करके। स्कूल पहुंचकर वह सबसे पहले लाइब्रेरी की ओर देखती कि सर आएं हैं या नहीं। जो विषय आज तक उसे रटने वाला और उबाऊ लगता था उसे सोमेश सर ने सबसे मजेदार बना दिया था। स्कूल अब उसके लिए दबाव नहीं बल्कि उत्सुकता का केंद्र बन गया। सोमेश सर उसकी जिंदगी में न आएं होते तो उसके जीवन में जो यह बदलाव आ रहे थे ,वह कभी नहीं आ पाते। उसने अब लोगों की बातों को नजरअंदाज करना सीख लिया था। वह बाकी विषयों में भी ध्यान लगाने लगी थी। 10वीं में वह अच्छे अंकों से पास हो गई थी। जबकि उसके घर वालों को यह डर था कि कहीं वह फेल न हो जाएं। विषय में रुचि बढ़ने के कारण उसने 11वीं में भी मानविकी विषय लिए। जिसके लिए उसे घर में भी काफी संघर्ष करना पड़ा। घर वाले चाहते थे लड़की साइंस ले, लेकिन दिल तो मानविकी विषयों में अटक गया था।

जबरदस्ती वो विज्ञान पढ़ भी नहीं पाती। फिर भी कुछ दिन विज्ञान पढ़ने गई, एकदम वह उदास पड़ने लग गई। सोमेश सर की कक्षा उसे रह रहकर याद आती,उसका वहां न होने का विचार उसे उदास कर जाता। उसने किसी से बात करना छोड़ दिया था। घर में भी किसी से बात नहीं करती थी। एक दिन हताश होकर वह स्कूल से जाते ही बिस्तर में जाकर सो गई, कंबल के अंदर मुंह छिपाकर रोती रही। उस रात घर वालों के बहुत मनाने पर भी उसने खाना नहीं खाया। उसकी जिद्द के आगे घर वालों को हार माननी पड़ी। दूसरे दिन सुबह स्कूल जाते वक्त पापा ने उसे मानविकी पढ़ने की इजाजत दे दी। वह दिन उसके लिए किसी उपलब्धि की तरह था। मानो उसने अपनी कोई जरूरी मांग मनवाई हो। इस तरह उसने मानविकी में अपना एडमिशन लिया। वह खुश तो थी, लेकिन उसके सभी साथियों ने विज्ञान विषय ले लिए थे। वह अकेली पड़ गई थी। बाकी जो थे वह अभी उसके लिए नए थे। पूरे स्कूल में एक तरह की हवा फैल गई कि शालिनी ने मानविकी ले ली। वह भी सोमेश सर के विषय के कारण। घर जाते वक्त उसके कुछ साथियों ने कहा भी था यह पागल हो गई है, सोमेश सर ने इसमें काला जादू कर लिया है।

जहां सब विज्ञान पढ़ रहे हैं और यह कला वर्ग में जा रही है। पहले पहले उसे यह बताने में शर्म सी आती या संकोच होता की वह कला वर्ग की छात्रा है।लोग भी उसे शक की नजरों से देखते। बाकी धीरे धीरे उसे वहां वहीं सुकून मिलने लगा था, जिसके लिए उसने संघर्ष किया था। सोमेश सर राजनीति विज्ञान पढ़ाते। वह लाइब्रेरी जाने लगी। लिखना,पढ़ना दोनों साथ साथ चलता रहा। उसे याद है एक बार सर ने उसे "आजादी मेरा ब्रांड" पुस्तक पढ़ने को दी,जो अनुराधा बेनीवाल का यात्रा वृतांत है। उसे पढ़कर उसे बहुत आजादी का अनुभव हुआ। जहां पहले वह कहीं भी अकेले जाने से डरती थी,अब उसने अकेले चलना शुरू कर दिया। उसने इस पुस्तक की समीक्षा भी लिखी। जिसे काफी सराहना मिली।

इस तरह पढ़ना लिखना उसकी आदतों का हिस्सा बन गया। 12वीं तक वह लगातार सोमेश सर से पढ़ती रहीं और चीजों को जानती रही। लिखना पढ़ना उसके पसंदीदा कामों में एक बन गया।सोमेश सर का ही असर था कि शालिनी के व्यवहार में बहुत सकारात्मक परिवर्तन आएं। बाकी विषयों में भी उसने मन लगाकर पढ़ना शुरू किया।

एक बार जब वह इंटरवल के बाद होने वाली क्लास में थोड़ी देरी से पहुंची तो इंग्लिश के अध्यापक ने उसे बुरी तरह डांटते हुए कहा कि तुम्हारा यही रवैया रहा तो तुम इंग्लिश में फेल हो जाओगी। यह सुनकर वह सहम गई और चुपचाप अपनी जगह में जाकर बैठ गई। जब 12वीं का रिजल्ट आया तो शालिनी न सिर्फ अंग्रेजी में उत्तीर्ण हुई थी बल्कि बहुत अच्छे नंबर लेकर आई। यह देखकर उसके आंखों में आंसू आ गए । यह पल उसके लिए भावुक करने वाला था। यह सिर्फ परीक्षा का ही रिजल्ट नहीं था , शालिनी के टूटने, बिखरने बनने, सीखने, अपने डर से लड़ने, खुद को लेकर हीन भावना से निकलने का सफर था। उन सभी लोगों की उपेक्षाओं के बावजूद सोमेश सर की अपेक्षाओं ने उसे बचा लिया था। सोमेश सर ने अपने प्रेम और मृदु स्वभाव से न सिर्फ पढ़ने को रुचि में बदल दिया बल्कि कभी भी किसी प्रश्न का जवाब नहीं बताते थे, बल्कि स्वयं खोज लाने को कहते थे। जिससे बच्चों को स्वयं जूझना पड़ता। इसी ने शालिनी को मजबूत और स्वयं कुछ खोजने सीखने को उत्साहित किया।

 

-शीतल भट्ट


 

शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
अंतस : ज़रा ठहरिए- पुस्तक समीक्षा: विशाल चंद

पुस्तक- अंतस : ज़रा ठहरिए 

लेखक- लवकुश कुमार 

प्रकाशक- Notion Press 

 

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में ठहरना लगभग भूल चुके हैं हम। ऐसे समय में "अंतस" एक ऐसी पुस्तक बनकर सामने आती है, जो न सिर्फ हमें रुकने के लिए कहती है साथ ही भीतर झांकने का साहस भी देती है।

इस पुस्तक को पढ़ने से पहले मुझे लगा था कि यह एक सामान्य सेल्फ हेल्प किताब जैसी होगी लेकिन जैसे-जैसे मैं इसके पन्नों में आगे बढ़ता गया। यह अनुभव कहीं अधिक व्यक्तिगत और गहरा होता चला गया। लेखक ने रोज़मर्रा की साधारण लगने वाली घटनाओं के माध्यम से जीवन के बड़े सवालों को बेहद सहजता से उठाया है।

लेखक की सबसे बड़ी ताकत उनकी संवेदनशीलता है। वह किताबों और लेखकों के महत्व को जिस आत्मीयता से प्रस्तुत करते हैं। वह कहीं न कहीं सीधे दिल तक पहुंचती है। पुस्तक में विभिन्न किताबों, फिल्मों और विचारों का ज़िक्र न केवल पाठक की जिज्ञासा बढ़ाता है बल्कि उसकी सोच के दायरे को भी विस्तृत करता है।

इस पुस्तक की एक और खासियत इसके छोटे-छोटे प्रसंग और उद्धरण हैं। जो कम शब्दों में गहरी बात कह जाते हैं। एक जगह लेखक एक चिड़िया का उदाहरण देते हैं जो जंगल में लगी आग को बुझाने के लिए अपनी चोंच में पानी भरकर लाती है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि छोटी-छोटी कोशिशें भी बड़े बदलाव का हिस्सा बन सकती हैं। सिर्फ दर्शक बनकर रहने से बेहतर है कुछ करना।

संक्षेप में -  

  • यह किताब रोज़मर्रा की छोटी-छोटी चीज़ों में छिपे बड़े सवालों को सामने लाती है और हमें ठहरकर अपनी ही ज़िंदगी को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करती है।
  • अलग-अलग किताबों, फिल्मों और विचारों के ज़िक्र न सिर्फ इस पुस्तक को पढ़ने की इच्छा जगाते हैं, बल्कि साथ ही हमारी सोच को भी विस्तार देते हैं।
  • मेरे लिए यह पुस्तक केवल पढ़ने का अनुभव नहीं रही, बल्कि खुद से जुड़ने की एक प्रक्रिया बन गई। यह हमें लिखने, पढ़ने, अपने विचार खुलकर रखने, असहमति दर्ज करने और दूसरों के विचारों का सम्मान करने की सीख देती है।
  • कुल मिलाकर अंतस : ज़रा ठहरिए एक सधी हुई, प्रेरणादायक और भीतर तक असर छोड़ने वाली पुस्तक है। जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो अपने जीवन को थोड़ी गहराई से समझना चाहता है।

पुस्तक से कुछ उद्धरण - 

" वह हर इंसान सम्मान के योग्य है जो अपना कार्य

ज़िम्मेदारी और ईमानदारी से कर रहा है भले ही आपको उससे कोई

व्यक्तिगत फायदा न हो, इसकी परिणति ऐसे होती है कि सम्मान की

चाह में अन्य लोग भी ज़िम्मेदारी से अपना काम करने को प्रेरित होते हैं"

 

"अपने संसाधनो / धन / समय का एक हिस्सा परोपकार मे जरूर

लगाएँ, आपकी आय कम हो या ज्यादा उसमे दूसरों के लिए कुछ

कर पाने की गुंजाइश जरूर रखें, ये न हो कि पूरा वक़्त तथाकथित

अपनों के लिए चीजें और सुरक्षा खरीदने मे या उसकी तैयारी में लगा

दिया, एक-एक दिन को सार्थक करें, जिसमे व्यायाम, अध्ययन, और

जरूरतमन्द की मदद जरूर से शामिल हों, आप कितना भी वंचित

महसूस कर लें, ऐसे लोग भी हैं जो आपसे भी ज्यादा वंचित हैं, उनके

लिए कुछ काम करके, एक जरूरी उदाहरण बनें।"

 

"जब जीवन मे कोई उद्देश्य न दिखे तब एक काम किया जा सकता है,

है, जरूरतमन्द लोगों की निस्वार्थ सेवा, उनमे सबसे ऊपर जिस बात को

मैं रखता हूँ, वह है लोगों को शिक्षित करना, उन्हे लोगों की तकलीफों

को लेकर संवेदित करना, उनकी समझ पर काम करना, उन्हे मेहनत,

उत्कृष्टता और हुनर के लिए तैयार करना, उन तक बड़े बड़े लोगों की

जीवनियाँ और प्रेरक प्रसंग पहुंचाना, उन तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाना"

 

"सबसे बड़ा पाप अन्याय को देखकर भी चुप रहना है।"

- महात्मा गांधी

 

"जो इंसान अपनी समझ और आकांक्षाएं साझा नहीं करना चाहता वो

समाज से अपनी सहूलियत की दिशा की अपेक्षा कैसे कर सकता है! बिना

किसी पूर्वाग्रह के और बिना इस बात की चिंता किए कि लोग मेरे बारे में

क्या सोचेंगे बेधड़क होकर अपनी बात रखिए और दूसरों को भी हिम्मत

दीजिए, जो कुछ महसूस कर रहें उसे सामने व्यक्त करने का |

आपका एक लाइन का इनपुट भी मायने रखता है।"

#opinion_matters

 

"एक उपाय बाहर के प्रभाव को न्यूट्रल करने का, वह है अपने घर मे

अपनी क्षमता में एक पुस्तकालय का निर्माण करना जिसमे देश दुनिया

का उत्कृष्ट साहित्य हो और हो जीवनियाँ दुनिया के महान लोगों की,

जिन्होने आजादी और गरिमा के लिए जीवन भर संघर्ष किया, और

दुनिया को एक बेहतर जगह बनाया, अपने जीवन मे उत्कृष्ट कार्य करके

आनंद प्राप्त किया, ईमानदारी, बहादुरी और करुणा का जीवन जिया,

ताकि बच्चों को जीवन के लिए सही आदर्श मिल सकें |"

 

उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas

                                                                                   Amazon link

                                                                                   Flipkart link

 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

https://www.facebook.com/vishal.chandji

Reading Owl Facebook page

https://www.instagram.com/reading_owl.3


विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।

Read More
नौवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 03-05-2026

बीते रविवार (03-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से नौवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

कबिरा सोई पीर है (उपन्यास) - प्रतिभा कटियार (लोकभारती प्रकाशन, लेखिका अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की कार्यकर्ता हैं)

स्मारिका  - उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट 

अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) - महेश चन्द्र पुनेठा 

मुसाफिर कैफे  - दिव्य प्रकाश दुबे

खाकी में इंसान  - अशोक कुमार साथ में लोकेश ओहरी 

नचिकेता - महेश चन्द्र पुनेठा 

  • प्रयास करें की घर में कोई एक घंटे का अंतराल निर्धारित करें जब घर के बड़े कोई साहित्यिक पुस्तक लेकर उसका अध्ययन करें, इससे नियमित हमारी समझ को विस्तार मिलेगा और घर में माहौल आएगा पढने लिखने का, हो सकता है कि बड़ों को देख बच्चे भी पुस्तकें लेकर बैठें, बच्चों की रंग बिरंगी आकर्षक पुस्तकें डिस्प्ले रैक में रखें ताकि वो बच्चों को अपनी और आकर्षित कर सकें|
  • किसी साहित्यिक रचना की मार्मिकता, बारीकी, पठनीयता और सामाजिक सरोकार पाठक के मन को बाँध सकती हैं कि वह पूरी पुस्तक पढ़ जाये 
  • जिन्होंने जातिगत भेदभाव कभी झेला नहीं उन्हें जातिगत भेदभाव को उजागर करने वाली रचनाएँ और बातें अतिश्योक्ति लग सकती हैं |
  • 03 मई को विश्व पत्रकारिता दिवस होता है, यइसका उद्देश्य प्रेस की आजादी के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना, मीडिया की स्वतंत्रता पर हमलों का विरोध करना और पत्रकारिता के दौरान जान गंवाने वाले पत्रकारों को श्रद्धांजलि देना है। 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषित यह दिवस, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा में निष्पक्ष पत्रकारिता की भूमिका को रेखांकित करता है
  • स्व० उमेश डोभाल (पत्रकार) और गिरीश चंद्र तिवारी (गिर्दा) हैं जैसे अमिट शख्शियतों और उनके योगदान पर बात हुयी |
  • जम्हूर आलम उअर नैनीताल की होली पर भी बात हुयी 
  • हिंदी भाषा में बात रखना ही आपको इसमें और पढने को प्रेरित करेगा, फिर लिखने को और इससे ही भाषा समृद्ध होती ही और हममें निपुणता आती है| 
  • उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

    आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हिमांशु जोशी जी, आकाश कश्यप, कृष्णा जायसवाल, गुंजन त्यागी मैम, प्रिया शर्मा, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, कपिल देव, अंशुल पाण्डेय, सौम्या वर्मा, प्रिया, लक्ष्मण जोशी, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, विजय कुमार, ममता, गायत्री जायसवाल, अरुण मौर्या और लवकुश|

  • पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

    धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

    इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

    अगली परिचर्चा 10 मई, रविवार रात 09 बजे होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

      धन्यवाद 

    -लवकुश कुमार

Read More
ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है माँ (कविता)- सुषमा सिन्हा

माँ पर कविता (mother's day)
(अतुकांत कविता)

----------
हम सब हैं तुम्हारी रचना ,
तुम पर क्या रचे हम माँ!
न शब्द ,न शास्त्र, न लेखनी कोई,
जो तुम्हें परिभाषित कर सके माँ ।
ऐसी दीया जो खुद जलकर ,
हमे रौशन करती हो माँ. 
आकांक्षा आसमान से  ऊंचा,
ममता तेरी पृथ्वी से भारी है माँ. 
गर्मी में सघन साया बन जाती, 
जाड़े की नर्म धूप हो माँ.
तेरे स्नेह रसधार के आगे,
सागर भी 'कूप' दिखता है माँ .
कलेजे के टुकड़े को  अपनी मौत तक ,
कलेजे से लगाए रखती हो माँ. 
चोट हमें जब-जब लगती ,
घायल तुम होती हो माँ. 
ईश्वर प्रार्थना सुने 
न सुने ,
बिन बताए इच्छा पूरी करती हो माँ .
प्रभु क्षमा करें ना करें, तुम हर खता माफ करती हो माँ .
परमात्मा नतमस्तक तेरे आगे,
उन्हें भी तो, तुम पाली हो माँ ,
मौत के लाख बहाने होते,
जन्म के लिए सिर्फ तुम ही हो माँ.
हर मुश्किल में साथ निभाती,
निस्वार्थ प्रेम की मिसाल हो माँ .
इंसान के रूप में ही नहीं,
प्राणी मात्र के लिए देवी हो माँ. 
संसार का नजारा बहुत   प्यारा होता,
काश!' किस्मत की लेखनी' पा जाती माँ.  परमात्मा ने भी यही कहा है,
उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति तुमही हो माँ.
बच्चों के लिए हर पल बेचैन रहती,
चैन की नींद, चिता पर सोती है माँ. 
फौजी देश पर कुर्बान होते,
प्रथम कुर्बानी देती है माँ. 
"मदर्स डे"क्या मनाना!  
हर क्षण तुम्हारे नाम है माँ. 

सुषमा सिन्हा 
वाराणसी 
मोबाईल 9369998405 

Read More
पुस्तक परिचर्चा - एक मंच

पुस्तक परिचर्चा में केवल पुस्तकों पर ही बात नहीं होती, इसमें पुस्तकों के महत्व पर भी बात होती है और एक मंच को निरंतरता मिलती है कि कल कोई जुझारू युवा जुड़े और इस मुहिम को और आगे तक ले जाए‌।

शुभकामनाएं 

लवकुश कुमार 

Read More
अनारको के आठ दिन: पुस्तक परिचय सह समीक्षा - अंकित मिश्रा

पुस्तक का नाम – अनारको के आठ दिन

लेखक - सत्यु

"अनारको का बहुत बहुत मन था कि पापा से कहे. पापा एक सवाल और पूछूं? और फिर पूछे कि आप जब भी कोई चीज जानते नहीं तो यह क्यों कह देते हैं कि उल्टा सवाल मत कर|"

 

प्रस्तुत पुस्तक में इसी प्रकार से बच्चों के सवालों, उनकी जिज्ञासाओं के उठने, अपने आसपास के माहौल को देखने, चल रही प्रक्रियाओं के कारण को समझने से जुड़े अनुभवों और बच्चों के इन व्यवहारों पर माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को बड़े ही सुन्दर तरीके व्यक्त किया गया है।

 

इस पूरे कथानक की नायिका अनारको है जो हर बात को जानने को जिज्ञासु है। लेखक ने कथानक को कुछ इस तरह बुना है कि अधिकतर बातें अनारको के सपनों में पूरी हो जाती हैं जो अलग-अलग दिनों में घटित होते हैं।

 

पहले दिन में उससे कहा जाता है कि लोटे में पानी लेकर ठाकुर जी को चढ़ा आओ तो वह सवाल करती है कि ठाकुर जी को पानी चढ़ाना या उन्हें खुश करना क्यों जरुरी है? फिर दादी के बताने पर कि ठाकुर जी तो पेड़ पौधे, कंकर पत्थर में हर जगह हैं, वह तर्क रखती है तो क्या मैं ये पानी बाहर भिंडी के पौधे में डाल दूँ।

 

दूसरे दिन में स्कूल की प्रक्रियाओं पर मछलियों की एक सभा द्वारा सवाल उठाये गए हैं जो बच्चों को मशीनीकृत वातावरण या अनुशासन के नाम पर दंडात्मक विधानों, कई तरह की बंदिशें लगाये जाने की ओर उन्मुख करते हैं। कई विद्यालयों में भी ऐसी बातें दिख जाती हैं नहीं अनुशासन के नाम पर बच्चों को बोलने की आजादी नहीं दी जाती। सवाल पूछने वाले बच्चों को अक्सर डांट मिल जाती है या उनके सवालों को टाल दिया जाता है। ऐसे ही एक विद्यालय में बच्चों से बातचीत के दौरान उनका बोलना ऐसे हो रहा था जैसे वे किसी खेल में बोल रहे हों और उनकी बात दूसरा सुन नहीं सके। "जबकि मध्यावकाश में उनकी आवाज में जबरदस्त तेजी देखने को मिली|

बच्चे हां या ना बोलने में सकुचा रहे थे। पूरी कक्षा एक दम शांत-शांत थी।"

 

तीसरे दिन में सामाजिक ताने-बाने और "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" की समस्या दिखाई गई है जिसमें पितृसत्तात्मक परिवारों में जेंडर आधारित भेदभाव पर तंज कसा गया है। अनारको घर से भाग रही है तो गोलू के पापा उसे कहते हैं कि अपनी मौसी को भेज देना, नल आ रहा है, पानी भर ले आकर, जबकि वे खुद नल के पास में ही लेटे हुए हैं, लेकिन पानी भरना या घर से जुड़े काम तो केवल महिलाएं ही करेंगी, वे उठकर पानी नहीं भर सकते।

हमारे समाज में जेंडर आधारित भेदभाव एक बड़ी समस्या है, जिसमें समाज ने लिंग के आधार पर कामों का बंटवारा कर दिया है। कामाने घर से बाहर सिर्फ पुरुष ही जाएंगे और घर के कामों को महिलाएं ही करेंगी, ऐसी सोच और व्यवस्था हमारी सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए बाधक है। साथ ही ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो खुद भले ही गलत व्यवहार करें लेकिन दूसरों को उपदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ते

 

चौथे दिन के सपने के माध्यम से विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बात की गयी है। हमारे समाज में अमीर-गरीब और ऊँच-नीच की जो खाई है वह समाज के लिए घातक है, इस पर बात की गयी है|

लेखक के ही शब्दों में अनारको ने देखा "जो ज्यादा अच्छे कपड़े पहने था वह ज्यादा बदमाशी कर रहा था।"

 

अनारको ने बहुत से लोगों ऐसे देखे थे। ऐसे- सब उन जैसे लगते थे जो गर्मी की दोपहर में कहीं से आकर घर के बाहर बैठे रहते थे और जब अनारको उनको पीने के लिए गिलास भरकर पानी देने जाती तो हमेशा मुँह के पास हाथ ले जाकर कहते 'डाल दो गुड़िया' कभी गिलास को हाथ में नहीं लेते

 

पांचवें दिन में शिक्षा के उद्देश्य और आकलन को बेहतर तरीके से समझाया गया है। मम्मी के ये कहने पर कि पास होकर अच्छी नौकरी की जा सकती है तो अनारको कहती है कि ये काम तो मैं फेल होकर भी कर सकती हूँ। और यह कौन तय करता है कि कौन पास होगा और कौन फेल और यह तय करना जरुरी क्यों है? साथ ही आकलन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं क्या समझने में ठीक तरह से मदद कर पाती हैं कि किसने क्या सीखा?

 

छठवें दिन में भूतों को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और बच्चों पर इनके प्रभाव को दर्शाया गया है। पहाड़ी सन्दर्भ में तो यह समस्या और बड़ी है। यहाँ तो बच्चे ढेरों ऐसी कहानियाँ जानते हैं जो भूतों के बारे में हैं। अमूमन इस अवधारणा की शुरुआत बाल्यकाल में ही हो जाती है। पालन पोषण के दौरान बच्चों को अलग-अलग तरीके से भय दिखाया जाना हमारी परम्पराओं में शामिल रहा है। जैसे शाम हो गयी, बाहर न जाना, नहीं तो भूत पकड़ ले जायेगा| इन बातों का बच्चों पर बहुत प्रभाव पड़ता है।

 

सातवें दिन में भी बहुत ही संवेदनशील बात को उकेरा गया है। बच्चों को अक्सर प्रदर्शन की वस्तु मान लिया जाता है। जैसे घर में कोई मेहमान आया तो बच्चों से कहा जाता है कि पोयम सुनाओ, डांस करो आदि। इस दिन प्रधानमंत्री आने वाले हैं तो सब लगे हैं उनकी आवभगत के लिए। घंटों के लिए सड़कों पर रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और लोगों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है।

 

आठवें दिन में किसी नई वस्तु के बारे में बच्चों की जिज्ञासा किस कदर बढ़ जाती है, वे वस्तु विशेष के बारे में जानने के लिए कई तरह के यत्न करते हैं। यह बात पुस्तकों के बारे में बहुत अच्छे से लागू होती है। कोई पुस्तक जब बच्चे को अच्छी लग जाए तो वह उसे पढ़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन इसके लिए जरुरी है बच्चों को किताबों में रूचि पैदा की जा सके।

 

अनारको के आठ दिन पुस्तक बच्चों के व्यवहार, उनके कल्पना संसार, उनकी जिज्ञासाओं तथा हमारे कौन से व्यवहार बच्चों को पसंद नहीं आते, यह समझने के लिए बहुत ही उपयुक्त है।

-अंकित 

 

अंकित  मिश्रा जी हिन्दी विषय के विद्यार्थी हैं| उनका काम कक्षा- कक्ष में ऐसे हिन्दी शिक्षण को लेकर उन्मुख है जिसमें भाषाई कौशलों की सर्वोत्तम स्थिति बच्चों को हासिल कराई जा सके| उन्हें सम- सामयिक विषयों पर कविताएँ लिखना भी पसंद है|


इसी पुस्तक पर कुछ टिप्पणियां:- यहाँ क्लिक करें


 

अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

 

 

Read More
अनारको के आठ दिन - सत्यु (बाल साहित्य) : पुस्तक सामग्री से कुछ टिप्पणियां

मुख्य पात्र - अनारको

पुस्तक में बच्चों के सवालों और व्यवहारों को किस प्रकार से प्रस्तुत किया गया है?

पुस्तक में बच्चों की जिज्ञासाओं, उनके आसपास की दुनिया को समझने की कोशिशों, और माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को सुंदर तरीके से व्यक्त किया गया है। बच्चों के अनुभवों और उनके व्यवहारों को समझने में मदद मिलती है।

पुस्तक में जेंडर आधारित भेदभाव को किस प्रकार दर्शाया गया है?

पुस्तक में जेंडर आधारित भेदभाव को दर्शाने के लिए, अनारको के परिवार की घटनाओं और बातचीत का उपयोग किया गया है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे घर के कामों को महिलाओं के लिए निर्धारित किया जाता है, जबकि पुरुष इससे दूर रहते हैं। यह समाज में मौजूद लैंगिक असमानता को उजागर करता है।

बच्चों पर अंधविश्वासों का क्या प्रभाव पड़ता है?

अंधविश्वास बच्चों के मन में डर और अनिश्चितता पैदा करते हैं। वे उन्हें दुनिया को एक डरावनी जगह के रूप में देखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, जहाँ हर चीज का जवाब नहीं है। इससे बच्चों में आत्मविश्वास की कमी और दूसरों पर निर्भरता की भावना भी आ सकती है। अंधविश्वास बच्चों को गलत जानकारी पर विश्वास करने और तर्कसंगत सोच से दूर रहने के लिए भी प्रोत्साहित कर सकते हैं।

बच्चों को शिक्षा में कैसे रुचि पैदा की जा सकती है?

बच्चों को शिक्षा में रुचि पैदा करने के लिए कई तरीके हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा को बच्चों के लिए मजेदार और मनोरंजक बनाया जाए। इसके लिए, शिक्षकों को बच्चों की रुचियों और जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए। उन्हें खेल, कहानियों, और अन्य रचनात्मक गतिविधियों का उपयोग करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, माता-पिता को भी बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें बच्चों को पढ़ने और सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, और उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। माता-पिता को बच्चों के स्कूल के काम में भी रुचि लेनी चाहिए और उनकी सफलता में मदद करनी चाहिए।

बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानने से क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं?

बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानना उनके आत्म-सम्मान और विकास के लिए हानिकारक हो सकता है। इससे उन्हें ऐसा महसूस हो सकता है कि उन्हें प्यार और स्वीकृति पाने के लिए प्रदर्शन करना होगा। इससे उनमें आत्मविश्वास की कमी, सामाजिक चिंता और दूसरों को खुश करने की निरंतर आवश्यकता भी पैदा हो सकती है।

इसके अतिरिक्त, बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानने से उनकी रचनात्मकता और जिज्ञासा भी कम हो सकती है। वे डर सकते हैं कि अगर वे गलतियाँ करते हैं तो उन्हें डांटा जाएगा, इसलिए वे नए विचारों और अनुभवों से डरेंगे।


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
सवाल का महत्व है लेकिन उससे भी अधिक महत्व है इस बात का कि सही सवाल पूछा जाए: शिक्षा के संदर्भ में

2013 में मैंने प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करके बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और फिर 2016 में आईआई टी दिल्ली, इन पड़ाव का प्रभाव, मेरे परिचितों पर पड़ा और परिणामतः कई लोगों ने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए मुझसे सलाह ली

  • कुछ लोगों ने कहा कि गर्मी कि छुट्टी मे मैं उनके बच्चों को ट्यूशन दे दूँ
  • कुछ ने उन कोचिंग/स्कूल का नाम पूछा जहां मैंने पढ़ा
  • कुछ ने उन किताबों का नाम पूछा जिन्हे मैंने पढ़ा 
  • बहुत कम या कहूँ कि इक्का दुक्का लोगों ने पूछा कि "आप पढ़ते कैसे हैं, क्योंकि वही किताबें और उन्ही कोचिंग या उन्ही स्कूल का सहारा तो अन्य लोग भी लेते हैं फिर परिणाम अलग क्यों!"

 

जिन्होने नहीं पूछा तो उनको मैंने बिना पूछे ही "तरीके" पर सुनने का आग्रह किया लेकिन अधिकतर ने नजरंदाज करके सीधे किताब, कोचिंग या स्कूल के नाम पर फोकस किया क्योंकि उनके मन में था कि "पढ़ तो उनका बच्चा लेगा ही बस किताब/कोचिंग का नाम पता चल जाएगा"

बदलाव कुछ खास नहीं रहे, क्योंकि मेरी बताई किताब तो कई बार खरीद ली गयी, मेरी बताई गयी कोचिंग मे प्रवेश भी ले लिया गया लेकिन कितना कुछ सीखा जा सका, इस पर कोई बात न हुयी, बात हुयी तो सीधे रिज़ल्ट आने पर|

 

किताब और कोचिंग के जितना ही और कई मामलों में इनसे ज्यादा महत्वपूर्ण है "तरीका या एप्रोच" 

 

इसीलिए जब भी किसी से पढ़ाई पर बात करें तो उस चर्चा में तरीके को समुचित स्थान दें |

 

शुभकामनाएँ

-लवकुश 

Read More
आठवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 26-04-2026

बीते रविवार (26-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से आठवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

सर्जनात्मक शिक्षा – डॉ राघव प्रकाश एवं डॉ सविता पालीवाल

बाघेन – नवीन जोशी

जीव जंतुओं की विचित्र आदतें और प्रवृत्तियाँ - राजेंद्र कुमार राजीव

अविज्ञान – नरेंद्र कोहली

आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश

प्रफुल्ल चन्द्र राय – पं श्रीराम शर्मा आचार्य

देवेंद्र मेवाड़ी के नाट्य साहित्य में बाल मनोविज्ञान (शोधपत्र)

तुम तो अच्छे मुसलमान थे रहमान

कमरुनिशा का कटोरदान

  • बेहतर समाज के लिए केवल आपका ही सजग और संवेदनशील होना जरूरी नहीं, इसके साथ इतना ही  जरूरी है कि पड़ोस का वातावरण भी बेहतर हो, एक उदाहरण से समझिए- यदि आप सड़क पर यातायात नियमों का पालन कर रहे हैं तो इतने भर से ही आपकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, अन्य चालकों का भी नियमों के प्रति सचेत और जिम्मेदार होना जरूरी है|
  • ये बहुत जरूरी है कि पुस्तक परिचर्चा जैसे जरूरी कार्यों का सिलसिला आगे बढ़े इसके लिए जरूरी हो जाता है कि हम स्वयं भी हिस्सा लें और अन्य साथियों को भी इस मुहिम से जोड़ें
  • बेहतर समाज के लिए जरूरी है कि संवेदनशीलता, सृजनशीलता का विकास और चेतना का उन्नयन हमारी शिक्षा का हिस्सा/उद्देश्य बन जाए
  • आलोचनात्मक दृष्टिकोण के विकास के लिए जरूरी है साहित्य अध्ययन, ऐसा अध्ययन जो विचारोतेजक हो|
  • हमे इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि कहीं हम भौतिक संपन्नता, व्यक्तिगत संपत्ति अर्जन की भाग दौड़ मे चीजों को समग्रता मे देखने, या अपनी दृष्टि को समाज केन्द्रित या विश्व केन्द्रित रखने के बजाय व्यक्तिकेंद्रित तो नहीं हो जा रहे! कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी स्वार्थ सिद्धि या विलासिता के लिए हम समाज मे गंदगी, प्रदूषण या अराजकता फैलाने मे योगदान दे रहे हों! अगर ऐसा है तो हम इस गलतफहमी मे हैं कि ज्यादा दिन तक शुकून से रह पाएंगे
  • अगर हम वाकई आने वाली पीढ़ी और अपने बुढ़ापे मे शुकून और व्यवस्था की कामना रखते हैं तो हमे अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं से समाज मे समता, स्वतन्त्रता, लोकतन्त्र, गरिमा और बंधुता की भावना बढ़ाने के लिए समुचित और संगठित प्रयास करने होंगे|
  • अर्थकेंद्रित और धनपिपासु रवैया समाज को शोषण और असामनता जनित अव्यवस्था की तरफ ले जाता है|
  • स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य मानव की अंतर्निहित शक्तियों का विकास है|
  • आज के समय की बहुत बड़ी और तात्कालिक जरूरत है कि शिक्षा में तकनीकी के साथ मानविकी और साहित्य के अध्ययन को उचित स्थान, उचित वेटेज मिले|
  • शिक्षा ऐसी हो कि जो हमारी क्षुद्रताओं को नंगा कर दे ताकि हम उससे ऊपर उठकर विश्वबोध कर सकें|
  • शिक्षा ऐसी हो कि मनुष्य अपने संकीरंताओं से ऊपर उठकर अपनी विराटता से परिचित हो और “विश्व मानव” बनने की तरफ अग्रसर हो|
  • हमे इस बात का सकल्प लेना होगा कि बतौर एक अभिभावक या शिक्षक हमे शिक्षा को जीवनोन्मुखी बनाने के लिए प्रयत्न करने होंगे|

  • किसी इंसान पर जो आपके ही बीच रहा हो उस पर भी मनगढ़ंत आरोप उसके व्यवहार पर अप्रत्याशित असर कर सकते हैं|
  •  लिखना तब ही सार्थक है जब यह उन तक पहुँच सके जिनहे संबोधित करते हुये लिखा गया हो, इसके लिए जरूरी है साहित्य का प्रचार प्रसार और उपलब्धता को सुनिश्चित करना, इसमे पुस्तक परिचर्चा और सामुदायिक पुस्तकालय एक निर्णायक भूनिका निभा सकते हैं|
  • कोई रचना इफेक्टिव हो, इसके लिए जरूरी हो जाता है कि वह पाठक को बांध सके, कम से कम पाठकों के उस वर्ग को जिसको ध्यान मे रखकर वह रचना रची गयी है|
  • उमेश पंत जी का साहित्य हमे समकालीन मिट्टी की धरातल की सच्चाई से अवगत कराता है|

  • क्या आपको पता है कि खरगोश के बिल में भी अलग अलग कमरे होते हैं, अलग अलग प्रयोजन के लिए ? चमगादड़ उल्टा क्यों लटकता है और कैसे ? ऐसा ही बहुत कुछ पढ़ जा सकता है, “जीव जंतुओं की विचित्र आदतें और प्रवृत्तियाँ - राजेंद्र कुमार राजीव ” में
  • जिज्ञासा और सवाल जरिया बन सकते हैं आविष्कारों के
  • साहित्य अध्ययन का रस ऐसा है कि यदि लग जाए तो समय का पता नहीं चलता और जिज्ञासा बढ़ती जाती है, बस जरूरत है तो एक रोचक किताब के संपर्क मे आ जाओ आप, जैसे हमारी एक पुस्तक साथी गुंजन त्यागी मैम, “आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश” को एक ही दिन में पूरा पढ़ गईं
  • आधुनिक तरीकों से पौराणिक कहानियों की व्याख्या हमे बहुत कुछ सीखा सकती हैं जो हमे एक बेहतर नागरिक बनने मे मदद कर सकती हैं|
  • शिक्षा कमाई का जरिया नहीं, जीवन को बेहतर तरीके से जीन और खुद कि उच्चतम संभावनाओं को पाने का जरिया है|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हर्षा भंडारी मैम, कृष्णकांन्त वर्मा,आरती मैम, अंकित मिश्रा सर, गुंजन त्यागी मैम, नंदेश्वर, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, सचिन सिंह, अंशुल, शोभित, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, अरुण मौर्या और लवकुश|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 02 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

Read More