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Electric Charge and Field

 

नोट- एकसमान विद्युत् क्षेत्र में एक द्विध्रुव की स्थितिज उर्जा पर उसके विभिन्न विन्यासों पर भी पढ़ लें|

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अभिव्यक्ति का समय और पूर्णता का प्रश्न - मेरी पहली साहित्यिक पुस्तक, अंतस पर प्रतिक्रियाओं को लेकर एक स्पष्टीकरण: लवकुश कुमार

लगभग हर दौर में दो तरह के लेखक रहे हैं—एक वे जो भाषा की अंतिम चमक-दमक और शिल्प पर वर्षों काम करते हैं, और दूसरे वे जो समय की पुकार सुनकर तत्काल बोलते हैं। समाज को दोनों की आवश्यकता होती है।

मेरी पुस्तक "अंतस – ज़रा ठहरिए" पर पिछले कुछ दिनों में अनेक प्रतिक्रियाएँ मिलीं। इन प्रतिक्रियाओं में एक रोचक अंतर दिखाई दिया।

 

किशोर और युवा पाठकों का एक बड़ा वर्ग कह रहा है—

 

"सर, यही तो हम ढूँढ़ रहे थे।"

 

"बहुत से ऐसे सवाल पहली बार पढ़ने को मिले जिन पर हमने कभी सोचा ही नहीं था, या इस तरह से नहीं सोचा था।"

 

"यह किताब जैसे हमारी पीढ़ी के लिए ही लिखी गई है।"

 

इन प्रतिक्रियाओं को पढ़कर संतोष होता है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य भी यही था—युवाओं/किशोरों को कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर ले जाना।

 

लेकिन दूसरी ओर कुछ वरिष्ठ और गंभीर पाठकों ने भाषा, शैली, संपादन, टाइपिंग तथा अभिव्यक्ति की कमियों/विस्तार/गहराई की ओर भी ध्यान दिलाया है। मैं उनका भी उतना ही आभारी हूँ।

 

वास्तव में, दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए मूल्यवान हैं।

 

फिर भी, इस अवसर पर मैं अपनी लेखकीय दृष्टि स्पष्ट करना चाहता हूँ।

 

 मैं क्या लिखना चाहता था?

 

मैंने यह पुस्तक भाषा का चमत्कार दिखाने के लिए नहीं लिखी।

 

मैंने यह पुस्तक इसलिए लिखी क्योंकि मुझे लगा कि आज का किशोर और युवा बहुत सारी सूचनाओं के बीच रहकर भी बहुत से बुनियादी प्रश्नों से दूर होता जा रहा है।

मुझे ऐसा लगता है, या कहिए कि मैंने अपनी सीमित दृष्टि में ऐसा देखा है कि:

वह करियर पर बात करता है,

लेकिन जीवन पर कम।

 

वह सफलता पर चर्चा करता है,

लेकिन संतोष पर नहीं।

 

वह प्रतियोगिता समझता है,

लेकिन स्वयं को कम समझता है।

 

वह दुनिया को बदलना चाहता है,

लेकिन अपने भीतर झाँकने का समय नहीं निकाल पाता।

 

यदि यह पुस्तक उसे थोड़ी देर रुककर सोचने पर विवश करती है, तो मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाता है।

 

 क्या पुस्तक में कमियाँ हैं?

 

निश्चित रूप से हैं।

 

मैं यह दावा कभी नहीं करूँगा कि यह एक परिपूर्ण पुस्तक है।

 

भाषा की सीमाएँ हो सकती हैं।

संपादन में त्रुटियाँ हो सकती हैं।

टाइपिंग की गलतियाँ भी हो सकती हैं।

 

जो मित्र इन कमियों की ओर संकेत कर रहे हैं, वे वास्तव में मेरी सहायता कर रहे हैं। अगली आवृत्तियों में इन्हें सुधारना मेरी जिम्मेदारी है।

 

लेकिन मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा—

 

हर प्रकार की त्रुटि समान महत्व की नहीं होती।

 

एक त्रुटि भाषा में हो सकती है।

दूसरी त्रुटि समय पर न बोलने की हो सकती है।

 

मेरे लिए दूसरी त्रुटि अधिक गंभीर है।

 

मै मानता हूँ कि, समय पर कही गई अपूर्ण बात, देर से कही गई परिपूर्ण बात से अधिक उपयोगी हो सकती है।

दूसरा यदि मेरे द्वारा उठाए गए किसी प्रश्न पर गहराई से नहीं भी लिखा गया तो उसका कारण, एक ही किताब में कई सारे जरूरी प्रश्न शामिल करना था, कहते हैं समझदार के लिए इशारा काफी होता है, वैसे जिज्ञासु पाठक के लिए इच्छित विषय पर गहनता से जानने के लिए वरिष्ठ लेखकों का साहित्य भी मौजूद है, इसी के दृष्टिगत ही तो मैंने पुस्तकों की एक सूची भी दे रखी है मेरी पुस्तक के अंत में| 

 

आज का समय तेजी से बदल रहा है।

 

बच्चे और युवा प्रतिदिन हजारों संदेशों, वीडियो और विचारों से घिरे हैं।

 

ऐसे समय में यदि कोई लेखक यह सोचकर वर्षों तक चुप रहे कि अभी भाषा और बेहतर हो जाए, शैली और निखर जाए, प्रत्येक वाक्य पूर्ण हो जाए, तब तक शायद जिन प्रश्नों पर बात करनी थी, वे और अधिक जटिल हो चुके होंगे।

 

मैं पूर्णता का विरोध नहीं करता।

 

बल्कि मैं स्वयं उसे पाने की दिशा में उन्मुख हूँ।

 

लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि जरूरी बात समय पर कही जानी चाहिए।

 

पूर्णता की यात्रा चलती रह सकती है।

 

मौन की भरपाई बाद में नहीं हो सकती।

 

 लेखक भी सीखता है

 

अक्सर हम मान लेते हैं कि लेखक पुस्तक लिखने के बाद पूर्ण हो जाता है।

 

मेरा अनुभव इससे बिल्कुल अलग है।

 

मेरे लिए हर पाठक एक शिक्षक है।

 

कोई भाषा सिखाता है।

 

कोई विचारों की गहराई दिखाता है।

 

कोई संपादन की आवश्यकता बताता है।

 

कोई यह विश्वास दिलाता है कि पुस्तक ने उसके जीवन में कुछ बदल दिया।

 

इन सभी से मैं सीख रहा हूँ।

 

मैं किस कसौटी पर अपनी पुस्तक को देखता हूँ?

 

  • यदि कोई विद्यार्थी पहली बार किसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर सोचने लगे...
  • यदि कोई युवा सोशल मीडिया की निरर्थक दौड़ से निकलकर पुस्तक पढ़ने लगे...
  • यदि कोई अपने माता-पिता को नए दृष्टिकोण से समझने लगे...
  • यदि कोई अपने जीवन को केवल नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह देखने लगे...
  • यदि किसी को अपनी तकलीफ के इतर दूसरों की तकलीफ में भी तकलीफ हो 
  • पाठक यह समझ पाए कि जीवन में आज़ादी सबसे ऊपर होती है, किसी भी सुविधा से ऊपर
  • पाठक में यह हिम्मत आ सके कि वह कार्य की गुणवत्ता को व्यवहार कुशलता से ऊपर रख सके 
  • युवाओं में गलत की आलोचना करने की हिम्मत भरपूर रहे भले ही इसके लिए उसे अकेले ही क्यों न हो जाना पड़े 

 

तो मेरे लिए यह उपलब्धि किसी भी भाषाई प्रशंसा से कम नहीं है।

 

साहित्य का अंतिम उद्देश्य केवल भाषा का सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चेतना जगाना भी है।

 

अंत में

 

मैं अपने सभी आलोचकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।

 

जो कमियाँ बता रहे हैं, वे भी मेरी यात्रा के साथी हैं।

 

जो पुस्तक के उद्देश्य को समझ रहे हैं, वे भी।

 

मैं भविष्य में भाषा, शिल्प और संपादन—सभी पर अधिक मेहनत करूँगा।

 

लेकिन यदि मुझे फिर कभी चुनाव करना पड़े कि एक जरूरी बात आज कहूँ या उसे पूर्ण बनाने के लिए वर्षों तक रोककर रखूँ,  तो संभवतः मैं फिर वही करूँगा जो इस पुस्तक के साथ किया—

 

समय की पुकार को प्राथमिकता दूँगा।

 

क्योंकि मेरा विश्वास है—

 पूर्णता एक सतत यात्रा है, पर समय पर की गई सार्थक अभिव्यक्ति कभी-कभी एक पूरी पीढ़ी की दिशा बदल सकती है।

मैं आलोचना को स्वीकार करता हूँ, सुधार के लिए प्रतिबद्ध हूँ, लेकिन समय पर आवश्यक संवाद को पूर्णता की प्रतीक्षा में स्थगित करना उचित नहीं मानता।

 

सादर धन्यवाद

लवकुश कुमार

अस्वीकरण - इस लेख को सँवारने के लिए, chatgpt का इस्तेमाल किया गया है|


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कौन-से कारक पढ़ने-लिखने की संस्कृति को नुकसान पहुँचा सकते हैं? — एक चिंता : लवकुश कुमार

कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक पोस्ट पढ़ी। उसमें एक लेखिका ने लिखा कि उन्होंने किसी की प्रशंसा सुनकर एक पुस्तक खरीदी, लेकिन उन्हें वह पसंद नहीं आई। उन्होंने अपना अनुभव फेसबुक पर साझा किया। यह उनका व्यक्तिगत अनुभव था और उसे व्यक्त करने का अधिकार भी उन्हें है। लेकिन उस पोस्ट को पढ़ते हुए मेरे मन में एक बड़ा प्रश्न उठा—क्या हमारी अभिव्यक्ति का तरीका कभी-कभी अनजाने में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को भी नुकसान पहुँचा सकता है?

यह लेख किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह उस व्यापक चिंता पर विचार करने का प्रयास है कि जिस समाज में वैसे ही पुस्तकें कम पढ़ी जाती हों, वहाँ हम अपने शब्दों से कैसी साहित्यिक संस्कृति बना रहे हैं।

हम अक्सर कहते हैं कि लोग किताबें नहीं पढ़ते। मोबाइल, सोशल मीडिया और त्वरित मनोरंजन ने पढ़ने की आदत को कमज़ोर कर दिया है। लेकिन क्या केवल यही कारण हैं? या हम स्वयं भी अनजाने में ऐसी मानसिकता बना रहे हैं जिसमें पुस्तकें, लेखक और पढ़ने की प्रक्रिया कम महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है?

जब मैं लोगों से किताबों पर बात करता हूँ तो कई बार एक वाक्य सुनने को मिलता है—"फलाँ वक्ता तो बस अपनी किताब बेचने की फिराक में है।"

यह सुनकर मुझे आश्चर्य होता है। यदि कोई व्यक्ति तर्कपूर्ण बातें कर रहा है, हमें अपने अंतर्विरोधों से परिचित करा रहा है, हमारी सोच को चुनौती दे रहा है, या हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने में मदद कर रहा है, तो फिर उसकी पुस्तक बेचने में समस्या क्या है? क्या किसी लेखक को अपनी वर्षों की मेहनत का पाठक मिलना अपराध है?

हम पुस्तक को संवाद का माध्यम मानने के बजाय केवल एक उत्पाद क्यों मानने लगे हैं?

एक अच्छी पुस्तक केवल सूचना नहीं देती, वह हमारे अनुभव का विस्तार करती है। वह हमें अपने से भिन्न लोगों, संस्कृतियों, विचारों और समयों से मिलाती है। कई बार वह हमारे भीतर ऐसे प्रश्न पैदा करती है जिनका उत्तर हमें वर्षों बाद मिलता है। पुस्तक का मूल्य केवल इस बात से नहीं आँका जा सकता कि उसने पढ़ते ही हमें "वाह!" कहने पर मजबूर किया या नहीं।

आज एक और प्रवृत्ति दिखाई देती है। यदि किसी पुस्तक से तुरंत आनंद नहीं मिला, कोई बिल्कुल नया विचार नहीं मिला, या वह हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो हम सार्वजनिक रूप से उसके बारे में नकारात्मक टिप्पणी कर देते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं कि हम अपनी असहमति व्यक्त करें। स्वस्थ आलोचना साहित्य की आवश्यकता है। लेकिन आलोचना और निरुत्साहन में एक सूक्ष्म अंतर होता है।

हमें स्वयं से पूछना चाहिए—हम पढ़ते किसलिए हैं?

क्या केवल नया जानने के लिए?

क्या केवल मनोरंजन के लिए?

क्या केवल सौन्दर्यबोध के लिए?

या फिर स्वयं को थोड़ा और समझने के लिए?

कई बार कोई पुस्तक हमें नया कुछ नहीं बताती, बल्कि वही बात अधिक स्पष्टता, संवेदनशीलता या गहराई से समझाती है जिसे हम पहले से जानते थे। क्या यह कम उपलब्धि है? हर पुस्तक का उद्देश्य क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत करना नहीं होता। कुछ पुस्तकें प्रश्न जगाती हैं, कुछ अनुभव बाँटती हैं, कुछ भाषा का सौन्दर्य दिखाती हैं, कुछ प्रेरित करती हैं, और कुछ केवल यह एहसास कराती हैं कि हम अपनी उलझनों में अकेले नहीं हैं।

हर पुस्तक हर पाठक के लिए नहीं होती।

जो पुस्तक किसी को साधारण लगे, वही किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकती है। जिस कविता में एक व्यक्ति को कुछ न मिले, वही दूसरे के भीतर वर्षों से दबे भावों को शब्द दे सकती है। इसलिए किसी पुस्तक पर अंतिम निर्णय देने से पहले यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि हमारी प्रतिक्रिया एक व्यक्तिगत अनुभव है, सार्वभौमिक सत्य नहीं।

आज के समय में पुस्तकों के सामने एक और चुनौती है—प्रचार।

अक्सर कहा जाता है कि अच्छी पुस्तक को प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। यह बात शायद उस समय सही रही होगी जब पुस्तकों के अलावा ज्ञान के बहुत कम माध्यम थे। लेकिन आज लाखों सूचनाओं के बीच यदि किसी पुस्तक की चर्चा ही न हो, तो पाठक उसके अस्तित्व से भी परिचित नहीं हो पाएगा।

प्रचार और अतिशयोक्ति में अंतर है।

यदि कोई पाठक किसी पुस्तक की अच्छाइयों की चर्चा करता है, तो वह केवल लेखक का नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति का भी समर्थन करता है। मैं स्वयं इसका अनुभव कर चुका हूँ। मेरी अपनी वेबसाइट को मित्रों का सहज समर्थन मिलने में लगभग दो वर्ष लग गए। तब मैंने सोचा—हम अपने मित्रों के अच्छे कार्यों का उल्लेख करने में इतना संकोच क्यों करते हैं? क्या हमें डर रहता है कि कहीं लोग इसे पक्षपात न समझ लें? या फिर हमने प्रशंसा को भी संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया है?

एक समाज की बौद्धिक संस्कृति केवल लेखकों से नहीं बनती; वह पाठकों, शिक्षकों, मित्रों, पुस्तकालयों, समीक्षकों और संवादों से मिलकर बनती है।

यदि लेखक ही लगातार एक-दूसरे को छोटा सिद्ध करने में लगे रहें, तो उन लोगों की दृष्टि में लेखकों की छवि कैसी बनेगी जो पहले से ही पुस्तकों को अनावश्यक मानते हैं? स्वस्थ असहमति और कठोर अवमानना में अंतर होता है। साहित्य का विकास बहस से होता है, उपहास से नहीं।

इसका अर्थ यह नहीं कि पुस्तकों की आलोचना बंद कर दी जाए। बिल्कुल नहीं। बल्कि आलोचना और भी अधिक होनी चाहिए—पर वह ऐसी हो जो पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करे, न कि पढ़ने से ही विमुख कर दे।

शायद पुस्तकों की समीक्षा लिखते समय कुछ बातें ध्यान रखी जा सकती हैं—

  • यह स्पष्ट किया जाए कि यह मेरा व्यक्तिगत पाठकीय अनुभव है।

  • पुस्तक किन पाठकों के लिए अधिक उपयोगी हो सकती है, इसका उल्लेख किया जाए।

  • केवल कमियाँ नहीं, उसकी विशेषताओं पर भी बात की जाए।

  • यदि पुस्तक हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो उसके कारण बताए जाएँ।

  • लेखक के व्यक्तित्व और पुस्तक की समीक्षा को अलग रखा जाए।

कभी-कभी मुझे लगता है कि पुस्तकों पर एक प्रकार का "अस्वीकरण" होना चाहिए—यह पुस्तक किन पाठकों के लिए लिखी गई है, इसका संकेत दिया जाए। जैसे विज्ञान की पुस्तक और कविता की पुस्तक का उद्देश्य अलग होता है; वैसे ही आत्मकथा, दर्शन, उपन्यास, शोध और प्रेरक साहित्य की अपेक्षाएँ भी अलग-अलग होती हैं। इससे पाठक अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार चयन कर सकेगा और अनावश्यक निराशा भी कम होगी।

यह बात सत्य है कि लोग एक दूसरे की पुस्तकों के सकारात्मक पहलू को पाठकों के सामने लाते हैं, क्या कोई और भी तरीका है? इससे बेहतर और क्या तरीका हो सकता है पुस्तकों के बारे मे अधिक से अधिक लोगों को बताने का? क्या इसमें कुछ गलत है? गलत तो तब है जब झूठी तारीफ की जाए, इसीलिए अब जब पुस्तक छपवाना आसान होता जा रहा है तो इस बात की जरूरत आन पड़ी है कि भूमिका से पहले एक पृष्ठ इस बात पर हो कि पुस्तक किनके लिए फायदेमंद हो सकती है और पाठकों के किस वर्ग के लिए लिखी गयी है|

अंततः प्रश्न किसी एक पुस्तक या एक लेखक का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम ऐसा वातावरण बना रहे हैं जहाँ अधिक लोग पढ़ने के लिए प्रेरित हों, या ऐसा वातावरण जहाँ लोग पुस्तक खरीदने से पहले ही संदेह से भर जाएँ।

यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ अधिक पढ़ें, अधिक सोचें और अधिक संवेदनशील बनें, तो हमें केवल अच्छी पुस्तकें लिखने की नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति को भी सहेजने की आवश्यकता है।

क्योंकि पुस्तकें केवल पन्नों का संग्रह नहीं होतीं; वे मनुष्य और मनुष्य के बीच चलने वाला सबसे लंबा, सबसे शांत और सबसे गहरा संवाद होती हैं। और किसी भी सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह इस संवाद को कितना जीवित रख पाती है।

 

शुभकामनाएँ

लवकुश कुमार

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अंतिम दृश्य (कहानी) - विशाल चंद

बरसों बाद शहर से छुट्टियाँ बिताने आया नाती शुभम अपने बूबू (दादाजी) के साथ खेतों की ओर निकल पड़ा ।

 

रास्ते में एक के बाद एक बंद पड़े मकानों पर ताले लटके थे। कहीं टूटी छतों पर घास उग आई थी तो कहीं आँगन में झाड़ियां अपनी मर्ज़ी से बढ़ रही थी। पूरे गाँव में ऐसा सन्नाटा था कि दूर बहते गधेरे की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।

 

नाती ने धीरे से पूछा,

"बूबू, इतने सारे घर खाली क्यों हैं? क्या यहाँ कोई नहीं रहता?"

बूबू कुछ क्षण चुप रहे। उनकी आँखें उन बंद दरवाज़ों पर टिक गईं, जिनके पीछे कभी जीवन बसता था।

 

उन्होंने लंबी साँस ली और बोले,

"नाती, ये घर खाली नहीं हैं... इनमें यादें रहती हैं। यहाँ कभी हँसी रहती थी, त्योहार रहते थे, खेतों की खुशबू रहती थी। अब बस ताले रह गए हैं।"

 

दोनों धीरे-धीरे खेतों की ओर बढ़ने लगे। बूबू ने दूर फैले सीढ़ीनुमा खेतों की ओर इशारा करते हुए कहा,

 

"जब मैं तेरी उम्र का था, तब इन खेतों में मंडुवा, कौदा, झंगोरा, जौ और गेहूँ इतना होता था कि साल भर किसी चीज़ की कमी नहीं रहती थी। कटाई के दिनों में पूरा गाँव एक परिवार बन जाता था।"

 

नाती ने चारों ओर देखा। अधिकांश खेत झाड़ियों से ढके थे। "अब खेती क्यों नहीं होती, बूबू?"

 

बूबू मुस्कुराए, लेकिन वह मुस्कान भीतर के दर्द को छिपा नहीं सकी

"खेती करने वाले ही कहाँ बचे, नाती? पहले जंगली सूअर रात में फसल का थोड़ा-बहुत नुकसान करते थे। अब बंदर, लंगूर, हिरण और दूसरे जंगली जानवर मिलकर पूरी मेहनत उजाड़ देते हैं। ऊपर से पढ़े-लिखे लड़कों को गाँव में काम नहीं मिलता। पेट की आग उन्हें शहर ले जाती है।"

 

कुछ दूर चलने के बाद एक कच्ची सड़क दिखाई दी।

नाती ने पूछा,

"बूबू, यह सड़क कब बनी?"

बूबू की आँखों में हल्की-सी चमक आई।

"यह सड़क सरकार ने नहीं बनाई थी बेटा... इसकी शुरुआत गाँव वालों ने की थी। हर घर से जिसने जितना बन पड़ा, उतना चंदा दिया। जिसके पास पैसे नहीं थे, उसने अपने हाथों का श्रम दिया। महीनों तक हम सबने गैंती और फावड़े से पहाड़ काटा। उस दिन लगा था कि अब हमारे बच्चे लौट आएँगे।"

 

"फिर लौटे क्यों नहीं?" शुभम ने पूछा 

यह सुनकर बूबू कुछ देर तक चुप रहे।

फिर बोले,

"सड़क से रास्ता बनता है बेटा... ज़िंदगी नहीं। ज़िंदगी के लिए रोज़गार चाहिए, अस्पताल चाहिए, अच्छे स्कूल चाहिए और ऐसी खेती चाहिए जिसमें किसान की मेहनत बची रहे। जब तक ये सब नहीं होगा, तब तक सड़क गाँव तक तो पहुँच जाएगी, लेकिन गाँव के बच्चे वापस नहीं पहुँच पाएँगे।"

 

दोनों खेत की मेड़ पर बैठ गए।

सामने डूबता सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था। हवा में पहाड़ की हल्की-सी खुशबू थी लेकिन उस खुशबू में एक अनकहा दर्द भी घुला हुआ था।

 

नाती ने धीरे से बूबू का हाथ पकड़ लिया।

"बूबू... क्या मैं बड़ा होकर इस गाँव में रह सकता हूँ?"

बूबू ने उसके सिर पर हाथ फेरा। उनकी आँखें भीग चुकी थीं

"रहना नाती... लेकिन मजबूरी में नहीं, अपनी मर्ज़ी से। ऐसा पहाड़ बनाना कि किसी को अपना गाँव छोड़ना ही न पड़े।"

सूरज पूरी तरह पहाड़ के पीछे छिप चुका था।

घर लौटते समय बूबू ने एक बार फिर पीछे मुड़कर गाँव को देखा। बंद घर वैसे ही खड़े थे, जैसे बरसों से किसी अपने का इंतज़ार कर रहे हों और नाती पहली बार समझ रहा था कि पलायन केवल गाँव छोड़ने का नाम नहीं बल्कि उन आँखों का दर्द है जो हर शाम लौटते कदमों की राह देखती हैं।

विशाल चन्द  @reading_owl.3

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लेखक की टिप्पणी

यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "उत्तराखंड में पलायन और मेरा गांव" से प्रेरित है। उस समय उठाए गये पलायन के प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।


विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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बाइक का हॉर्न उसके लिए महज पृष्ठभूमि का शोर भर था - एक संस्मरण सड़क दुर्घटना से जुड़ा

संस्मरण ताकि मेरे पाठक नुकसान से बच सकें:

साल 2025 की पूर्वार्ध की बात है मैं एक व्यस्त तिराहे की तरफ बढ़ रहा था अपनी मोटरसाइकल पर, मै तिराहे पर पहुँचने से पहले देखता हूँ की जिस सड़क को मैं जॉइन करने की तरफ बढ़ रहा हूँ उस पर एक युवक स्कूटी से आ रहा है और उसके पीछे वाली सीट पर भी एक सवारी है, मेरा ध्यान गया की स्कूटी का ड्राईवर तो सामने देखने के बजाय अपनी दायीं तरफ को कुछ देख रहा है|

मुझे अनुमान लगा की तिराहे पर पहुँचते ही वह और मैं संभवतः एक ही पास पहुँचने वाले हैं अतः टक्कर होने के संभावना है, अतः मैंने कई बार हॉर्न बजाया, लेकिन उस व्यस्त सड़क में वह हॉर्न उसके लिए महज एक शोर था वह अपने दायें देखता रहा और उसकी स्कूटी आगे बढ़ती रही और मेरी मोटर साइकल भी, और मेरी बाइक का  हॉर्न भी बीच बीच बजता रहा और इतने ही समय में दोनों गड़ीं टक्कर की नौबत में आ गईं और तब जाकर मुझे भी लगा कि ब्रेक लेना है और उसने भी देखा की बाइक आ रही है लेफ्ट से हम दोनों ने ब्रेक लिए उसने मेरी बाइक को लेफ्ट से टक्कर मारी हम तीनों गिरे (1+2) मैंने गिरते वक़्त अपने बाहर रखे बाइक से और पूरी तरह गिरने से बचने के लिए बायाँ हांथ जमीन पर टिकाया|

दोनों गाडियाँ उठाई गईं, एक दो बातों का आदान प्रदान हुआ, मैंने कहा कि पहले तो सामने के बजाय दायें देख रहे थे और दूसरा हॉर्न भी नहीं सुना

उसके पीछे बैठे साथी ने कहा कि तुम क्यों नहीं रुक गए हमे देखकर, मैंने डांटते हुये कहा कि एक तो लापरवाही से चल रहे ऊपर से मुझे ही दोष दे रहे| हम सभी अपने अपने रास्ते गए, कुछ दिन तक कलाई का दर्द कम न हुआ तो एक्स रे करवाया और पता चला की कलाई मे मामूली फ्रेक्चर है लेकिन प्लास्टर लगना बहुत जरूरी |

 

उस दिन समझ आया कि दूसरे तो दायें भी देखेंगे और हैडफोन पर गाने भी सुनेंगे ड्राइव करते वक़्त और हो सकता है कि गुस्से या शराब के नशे में हों, अपनी सुरक्षा के लिए हॉर्न बजाने के साथ रुक जाना और उसके निकाल जाने का इंतज़ार करना ही ठीक है अगर गुंजाइश है, क्योंकि हॉर्न तो बहुतों के लिए महज एक शोर है|

काश मुझे ये बात पहले किसी ने बताई होती, खैर मै आपको बता रहा हूँ|

कुछ और बातें खासकर पहाड़ पर ड्राइविंग की फिर कभी 

 

शुभकामनायें

लवकुश 


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आधुनिक समाज की सच्चाई (कविता) - विजयीप्रिया शर्मा

हम इतने सभ्य हो चुके हैं,

इतने सभ्य कि अब इंसान इंसान को देखकर मुस्कुराना भूल रहा है,

और कुछ यूं हुआ है

चारों तरफ उजाला है, पर अधिकतर अपनी अपनी स्क्रीन के अंधेरे में डूबे हुए हैं।

अंगूठे चल रहे हैं लगातार......

लाइक शेयर और स्क्रोल की अंधी दौड़ में, हम औंधे मुंह व्यस्त हैं फोन चलाने में,

बिना यह जाने कि .....

सामने बैठी बूढ़ी आंखें बात करना चाहती हैं,

वो अपना बुढ़ापा खोना चाहती हैं,

हमारी खिलती जवानी के साथ, 

पर हम रील के पंद्रह सेकंड के क्षणिक सुख में व्यस्त हैं।

रिश्तों के धागे अब वाई-फाई से जुड़ते हैं,

नेटवर्क कमजोर होते ही टूट जाते हैं। 

हजारों फ्रेंड्स है वर्चुअल दुनिया में, 

पर आधी रात को उदास दिल एक कंधा, दिल की सुनने वाला एक इंसान ढूंढने के लिए तरस जाता है।

यहां मशीनें इंसानों की तरह सोच रही है,

और इंसान रोबोट की तरह बिना सोचे जी रहा है। 

यह हमारी सबसे बड़ी प्रगति है। 

हमने चांद पर कदम रख दिया, 

पर जमीन पर अपनों का हाथ छोड़ दिया।

हम चालाक हो गए हैं। 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बात कर लेते हैं,

मगर पड़ोस के घर का हाल नहीं जानते हैं।

हम पत्थरों के दौर से निकल कर कांच और सिलिकॉन के नए पाषाण युग में आ खड़े हुए हैं,

पर उनमें अब कोई आहट नहीं होती है।

यह तरक्की का शिकार है यह संवेदनाओं का पतन?

हमारा चरित्र अब प्रोफाइल पिक्चर करती है,

और हमारी योग्यता.....

लाइक और कॉमेंट्स की गिनती।

 

- विजयीप्रिया शर्मा 


विजयीप्रिया जी स्नातक में मानविकी की छात्रा हैं और सामाजिक विषयों पर लिखती रहती हैं, वह वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं और पढ़ने लिखने की संस्कृति को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं| उनका मानना है कि पढ़ने लिखने वालों को एक मंच पर लाकर हम अपने विचार और जीवन/दुनिया को लेकर अपने अवलोकन ज्यादा से ज्यादा लोगों से साझा कर पाएंगे और इस तरह दुनिया और स्वयं को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण बना पाएंगे, महान लेखिका महादेवी वर्मा जी की रचनाएँ और व्यक्तित्व उन्हे खास पसंद हैं|


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अधूरी उड़ान (कहानी): स्त्री विमर्श - विशाल चंद

"चेली, अगले रविवार को लोग तुझे देखने आ रहे हैं।"

रसोई में आटा गूँधते हुए माधवी के हाथ एक पल के लिए रुक गए। उसने धीरे से ईजा की ओर देखा। ईजा की नज़रें झुकी हुई थीं, जैसे यह बात कहते हुए वे स्वयं भी भीतर से टूट रही हों।

"लेकिन ईजा... मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ।" 

ईजा ने बस इतना कहा—"सब ठीक हो जाएगा चेली... शादी के बाद भी पढ़ाई कर लेना।"

माधवी हल्का-सा मुस्कुराई। वह जानती थी कि यह मुस्कान केवल उसके चेहरे पर थी, मन में नहीं।

 

उस छोटे-से पहाड़ी गाँव में लड़कियों के सपनों की उम्र अक्सर बारहवीं की परीक्षा तक ही मानी जाती थी।

कुछ ही दिन पहले बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया था।

"रिजल्ट आ गया?" पड़ोस की चाची ने आँगन से आवाज़ लगाई।

 

माधवी ने धीरे से सिर झुका दिया।

"एक विषय में रह गई..."

 

बस इतना सुनना था कि घर का माहौल बदल गया। ईजा (मां) चुप रहीं। बौजू(पिताजी) देर तक कुछ नहीं बोले। लेकिन शाम होते-होते अम्मा की आवाज़ पूरे आँगन में गूँज उठी— "अब पढ़ाई-लिखाई बहुत हो गई। चेली जवान हो गई है। कोई अच्छा लड़का देखो। पढ़-लिखकर कौन-सा कलेक्टर बनना है?"

 

उस दिन माधवी ने पहली बार महसूस किया कि परीक्षा में असफल होने से भी बड़ा डर उसके सामने खड़ा है—कहीं उसकी शादी तय न कर दी जाए और वही हुआ।

 

अगले ही सप्ताह दो रिश्तेदार घर आए। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा था और बातों में एक सरकारी नौकरी में कार्यरत लड़के का ज़िक्र। किसी ने माधवी से नहीं पूछा कि वह क्या चाहती है। उससे केवल इतना कहा गया—

"चेली, मेहमानों के लिए चाय बना दे।"

 

चाय की ट्रे लेकर जब वह कमरे में पहुँची तो उसे लगा जैसे वहाँ उसकी नहीं। उसके भविष्य की कीमत तय की जा रही हो।

 

रिश्तेदार जाते-जाते बौजू से कह गए— "ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं मिलते। फ़ौज में नौकरी है। चेली की ज़िंदगी बन जाएगी।"

 

अम्मा कई महीनों से एक ही बात दोहराती थीं— "मरने से पहले अपनी पोती का ब्याह अपनी आँखों से देख लूँ, फिर भगवान जब चाहे बुला ले।" बौजू चुप रहते। ईजा की आँखें भर आतीं और माधवी... वह बस सब सुनती रहती।

 

वह पढ़ना चाहती थी। उसका सपना था कि वह अध्यापिका बने। उसे लगता था कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की ताक़त भी देती है। लेकिन गाँव में आज भी यह मान लिया जाता था कि चेली की सबसे बड़ी मंज़िल उसकी शादी है।

 

कुछ दिनों बाद बौजू ने धीरे से कहा— "माधवी, लड़का अच्छा है। सरकारी नौकरी करता है। हमें लगता है कि यही ठीक रहेगा।"

 

माधवी बहुत देर तक खिड़की से पहाड़ों को देखती रही। सामने दूर तक फैले चीड़ और बांज के जंगल हवा के साथ झूम रहे थे। उसे लगा जैसे पहाड़ों के ऊपर उड़ते पक्षी उससे पूछ रहे हों—"क्या सपनों की भी कोई उम्र होती है?"

 

उसने चाहा कि एक बार कह दे— "मैं अभी शादी नहीं करना चाहती। मैं पढ़ना चाहती हूँ।"लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। शायद इसलिए कि वह जानती थी—उसके एक "ना" के सामने अम्मा की आख़िरी इच्छा, ईजा की मजबूरियाँ, बौजू की सामाजिक चिंता और रिश्तेदारों की सलाह खड़ी थी।

 

धीरे-धीरे शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। कॉलेज की फीस के लिए जो पैसे उसने बचाकर रखे थे, उन्हीं पैसों से उसके लिए शादी की साड़ी खरीदी गई।

 

रिश्तेदार आते और कहते— "चेली भाग्यशाली है। फ़ौजी लड़का मिला है।" अब इससे अच्छा रिश्ता कहाँ मिलेगा?

 

हर कोई उसकी किस्मत की बातें कर रहा था, लेकिन किसी ने उसके सपनों के बारे में नहीं पूछा। 

शादी का दिन आ गया। मंडप में मंत्र गूँज रहे थे। अग्नि साक्षी थी। रिश्तेदार मुस्कुरा रहे थे। तभी उसकी दोस्त लक्ष्मी ने पूछा— तू इस विवाह से खुश तो हैं न ? 

 

माधवी ने सामने देखा। अम्मा के चेहरे पर संतोष था।

ईजा की आँखों में आँसू थे।

बौजू के चेहरे पर वर्षों की चिंता उतरती दिखाई दे रही थी।

 

उसने धीमे से कहा— "हाँ..."

 

उस एक शब्द के साथ सबके चेहरे खिल उठे। लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह "हाँ" उसकी इच्छा थी या परिस्थितियों के आगे उसका मौन समर्पण।

 

समय बीत गया।

 

एक दिन माधवी अपनी छोटी-सी चेली को स्कूल छोड़ने जा रही थी। पहाड़ की वही पगडंडी थी, वही चीड़ के पेड़ और वही सुबह की धूप।

 

रास्ते में चेली ने मासूमियत से पूछा— "ईजा, मेरी शादी भी आप लोग ही तय करोगे?"

 

माधवी कुछ पल के लिए ठिठक गई। उसने अपनी चेली का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा— "नहीं चेली। शादी तेरी होगी, इसलिए फैसला भी तेरा होगा। हमारा काम तुझे समझाना होगा, तेरे लिए फैसला लेना नहीं।"

 

चेली मुस्कुरा दी और आगे दौड़ गई।

 

माधवी वहीं खड़ी पहाड़ों की ओर देखने लगी। उसे लगा कि उसकी अपनी उड़ान भले ही अधूरी रह गई हो, लेकिन अब उसकी चेली के पंख कोई नहीं काट पाएगा

 

शायद बदलाव ऐसे ही शुरू होता है—जब एक पीढ़ी अपने हिस्से का दर्द अगली पीढ़ी को विरासत में देने से इनकार कर देती है।

 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

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 लेखक की टिप्पणी

 

यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "लड़की, विवाह और सहमति" से प्रेरित है। उस समय उठाए गए सामाजिक प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं, किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।

यदि यह कहानी पाठकों को विवाह में सहमति, शिक्षा और बेटियों के सपनों पर एक बार फिर सोचने के लिए प्रेरित करे, तो इसका उद्देश्य सार्थक होगा।


विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


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सत्रहवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 27-06-2026

बीते शनिवार (27-06-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से सत्रहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  • रूपतिल्ली की कथा – श्री प्रकाश मिश्र (पूर्वोत्तर भारत पर आधारित)
  • ठहरो दु:शाषन – राजीव जोशी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • जल थल मल – सोपान जोशी
  • एवरेस्ट की कहानी – प्रो० आल अहमद सुरदर (बाल साहित्य)
  • पीपल की छांव में-  पीपल बाबा (स्वामी प्रेम परिवर्तन)
  • शादी होने तक ही पढ़ पाती थीं लड़कियाँ” - हर्षा भंडारी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • शर्ट का बटन- प्रियंका जोशी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • 'इकिगाई' (Ikigai) - हेक्टर गार्सिया और फ्रांसिस मिरालेस

  • ·         केवल पढना ही काफी नहीं, जरुरत है पढ़े हुए को साझा करने की, ताकि और लोग भी लाभान्वित हो सकें और इस तरह हमारे लिए भी उनके साथ सामंजस्य बिठाना आसान होगा
  • ·         प्रो पीटर ग्रे, शिक्षा मनोविज्ञान के अमेरिकी अध्येता हैं, जो मुख्यतः शिक्षा और खेलों के अंतर्संबंधों पर उनके गहन शोध के लिए जाने जाते हैं|
  • ·         शिक्षा को समझने के लिए उसके इतिहास को भी समझना होगा
  • ·         हमें उन विद्यालयों की विधि को भी समझना होगा जो परंपरागत विद्यालयों से भिन्न होते हुए भी कुशल नागरिक दे रहे हैं
  • ·         दो कार्यों का लक्ष्य यदि एक ही है तो ताल मेल बिठाकर चलने से अभीष्ट उद्देश्य को पाना आसान हो जाता है|
  • ·         लिखना जरुरी है, इसे एक उदाहरण से समझिये कि यदि आप आज अपने शहर के बारे में कुछ लिखते हैं तो आज के बीस साल बाद वह एक दस्तावेज का कार्य करेगा जो हमें उन बीस सालों में शहर के विकास की यात्रा को समझने में मदद करेगा|
  • ·         अगर आज आप चीज़ों को एक डायरी के रूप में भी दर्ज कर रहे हैं तो कालांतर में एक पुस्तक तैयार हो सकती है|
  • ·         पुस्तक परिचर्चा, चाहे किसी समिति के द्वारा आयोजित हो या किसी व्यक्ति के द्वारा इसका प्रयोजन पढने लिखने और समझ को साझा करने का वातावरण(माहौल) तैयार करना है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों में पढने की ललक जागे, अतः आयोजक बधाई और सहयोग के पात्र हैं और साथ वह साथी भी धन्यवाद के पात्र हैं जो परिचर्चा में शामिल होकर इसके महत्व और प्रासंगिकता का समर्थन करते हैं|
  • ·         किसी भी चीज़ पर बात रखना तब ही सहज और सार्थक होता है जब हम उसे भली भाँति समझ चुके हों|
  • ·         यदि आप समाज में बेहतरी का बदलाव चाहते हैं तो पढने लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य एक अच्छा विकल्प हो सकता है, जिसमें पढने लिखने और किताबों पर बात वाले आयोजनों में सक्रियता से भागीदारी करके, बेहतर माहौल सुनिश्चित किया जा सकता है|
  • ·         आज पिथौरागढ़ के साथ बेरिनाग और बागेश्वर तक भी पुस्तक परिचर्चा के आयोजन पहुँच चुके हैं, यह कार्य आगे बढ़ते रहे इसके लिए समर्पित युवाओं को आगे आना होगा
  • ·         अगर किताब पढ़कर आप उस पर चर्चा नहीं करेंगे तो बात आगे कैसे बढ़ेगी|

 केदारनाथ और पर्यटन, जरूरत इस बात पर सोचने की कि अब आस्था ही खींच रही या फिर रील संस्कृति भी 

तेनजिंग से पहले के अभियानों का इतिहास, ताकि हम बेहतर समझ सकें एवरेस्ट पर फतेह को 

पीपल बाबा को नानी द्वारा बचपन में  ही प्रकृति-प्रेमी बना दिया (सीधे नहीं परोक्ष रूप से)

उत्तर पूर्व के हमारे देशवासियों के साथ जो भी भेदभाव की खबरें हमे सुनने को मिलती हैं इसका कारण है उनके बारे में हमारी जानकारी कम होना, क्योंकि इन पर आधारित साहित्यिक पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है|

श्री प्रकाश मिश्र के और भी उपन्यास हैं उत्तर पूर्वी भारत की जनजातियों पर, जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम खुद से अलग एक समाज के बारे में जान सकें ताकि उनके साथ सहज हो सकें और जान सकें कि क्यों किसी के लिए अपनी पहचान बनाए रखने का संघर्ष, उसके जीवन एक एक अंग होता है|

एक बात जो जरूरी है वह है कि ऐसा साहित्य केवल इच्छा की दृष्टि से नहीं, एक जरूरत समझकर पढ़ा जाना चाहिए ताकि आपसी तालमेल, सहजता, एकता और सम्मान सुनिश्चित किया जा सके|

शैक्षिक दखल पत्रिका का प्रकाशन शैक्षिक दखल समिति द्वारा हर छमाही किया जाता है, जोकि शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच है|

पुस्तक परिचर्चा में किसी भी पुस्तक पर बोलने के लिए किताब खत्म होने का इंतज़ार न करें, जितना पढ़ा है उसका संदर्भ देकर भी अपनी बात रखी जा सकता है|

कोई लेख पढ़ा है तो उस पर भी अपनी बात/अवलोकन साझा किया जा सकता है|

लाल बहादुर वर्मा का आदिवासी साहित्य हमे इस तबके को बेहतर समझने और इनके साथ संवेदित होने में मदद कर सकता है|

सोपान जोशी जी की किताब हम सबके के लिए जरूरी होनी चाहिए ताकि हम समझ सकें पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को, 

ह्वेल का मल, अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए पोषक तत्व का काम करता है|

ये समय है कि हम विचार करें और अध्ययन भी कि पहाड़ों पर बढ़ते सैलानियों का वहाँ की परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है|

शिक्षकों को चाहिए कि यदि उन्हे विद्यार्थियों के किसी प्रश्न का जवाब नहीं आता तो उन्हें डांटने के बजाय (ऐसे प्रकरण सुनने को मिलते हैं) उनसे उस पर चर्चा कि जाए और अगर जरूरत पड़े तो समय भी मांगा जाये लेकिन उन्हे डांटकर प्रश्न पूछने के लिए हतोत्साहित न किया जाए, तब ही हम उनके अंदर की जिज्ञासा और सृजनशीलता को सही पोषण दे पाएंगे|

अगर किसी छात्र या छात्रा कि गणित या और कोई विषय कमजोर है और उसके द्वारा उस विषय को आगे चलकर छोड़ दिया जाता है तो कोई जरूरी नहीं कि इसमें उस विद्यार्थी की ही अक्षमता है, बहुत संभावना है कि उस विषय के अध्यापक उतने सक्षम न मिलें हों|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम,प्रियंका जोशी मैम, विशाल दा (विशाल चंद जी), कर्ण भाईजी,अंशुल मैम, कृष्णा जायसवाल, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, प्रीति जायसवाल, शुभम गुप्ता, और लवकुश कुमार

परिचर्चा का कुशल संचालन, लिटरेरी लैंड, कानपुर के हमारे पुस्तक साथी कर्ण भाई जी ने किया, जोकि परिचर्चा को रोचक और यादगार बनाने वाला रहा|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 04 जुलाई (शनिवार रात 09:00 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

 

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