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दसवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 10-05-2026

बीते रविवार (10-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से दसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

ब्राह्मण की बेटी – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

जीत आपकी- शिव खेड़ा

संबंध और क्या है जीवन- आचार्य प्रशांत

  • पढ़ने का उद्देश्य जीवन के लिए रोटी कमाने तक सीमित न हो, बल्कि इससे आगे बढ़कर एक सार्थक जीवन के लिए खुद को तैयार करना हो|
  •  निर्णय निर्माण के लिए समय देकर, स्वयं की जरूरतों की समीक्षा करें, अपने असल जरूरतों को समझें और जो जरूरतें अभी महसूस हो रही हैं उनकी प्रासंगिकता के बारे मे अच्छे से विचार करें, दूसरों को देखकर अपनी प्राथमिकताएँ न बनाएँ, पहले स्वयं को समझें फिर अपनी जरूरतों को
  • जिस दिन आपको अपनी असली जरूरतों का पता चल जाएगा आपको बाहर से प्रेरणा की जरूरत महसूस न होगी
  • हौसला आता है स्पष्टता से, इसीलिए अध्ययन करें
  • सफलता और असफलता की भावना से ऊपर उठ जो जरूरी है वो करें, पूरा प्रयास और सही कार्य के लिए प्रयास अपने आपमें एक जीत है, सबसे पहला कदम सही काम के चुनाव का|

  • परिस्थितियाँ हमे सिखाती हैं, यदि आप एक उचित और जरूरी कार्य के लिए प्रयासरत हैं तो हार न माने
  • अध्ययन के बाद यदि आपकी समझ मे कुछ बेहतरी न आए तो आपको विचार करना चाहिए कि क्या वाकई पढ़ना सार्थक रहा?
  • खुद को खुलकर ईमानदारी से अभिव्यक्त करें ताकि आपसे इत्तेफाक रखने वाले लोग आपसे जुड़ सकें और आपके कार्यों मे सहयोग कर सकें
  • परिचर्चा को ऐसे संचालित करें जैसे कि हम सब एक कमरे मे बैठे बात कर रहे हों |
  • परिचर्चा में, सक्रिय रहें, पूछे जाने पर प्रतिक्रिया जरूर रखें ताकि परिचर्चा को एक दिशा दी जा सके
  • “जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना जरूरी है”- एक शेर का हिस्सा

  • स्वीडन यदि पूरी तरह डिजिटल हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को फिर से किताबों पर ला रहा तो क्या इतना काफी नहीं है हमारे लिए किताबों और पुस्तकालय के महत्व को समझने के लिए!
  • साहित्य को प्रोत्साहित करके हम इसी दुनिया को जिसमें हम रहते हैं, एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं जहां लोगों में प्रेम हो, संवेदनशीलता और हो आपसी सम्मान
  • फोन देखते देखते सो जाने से बेहतर है एक किताब पढ़ते पढ़ते सो जाना, असर आपको अगले दिन ही दिख जाएगा, साहित्य का चुनाव ढंग का हो|
  • पुस्तकें हमारी भाषा शैली को बेहतर करती हैं, हम लोगों को बेहतर समझ पाते हैं और उनसे तालमेल बिठाना आसान हो जाता है|
  • आप किसी भी विधा के विद्यार्थी हों, हर महीने 2-3 पुस्तकें पढ़ने का उद्देश्य रखना आपको कई मामलो मे बेहतर कर सकता है, जीवन के संघर्षों के लिए आपको तैयार कर सकता है और साथ मे मिल सकती है आंतरिक शांति और स्थिरता|
  • यदि आपमें बातचीत से लोगों के साथ जुड़ाव बनाने की चाहत है तो नियमित पुस्तकें पढ़ना न केवल आपको बेहतर शब्द दे सकता है साथ ही कार्यालय और व्यक्तिगत जीवन मे लोगों के साथ समन्वय बनाते हुये, खुद को अभिव्यक्त करते और दूसरों को समझते हुये आगे बढ़ने मे मदद कर सकता है|
  • पुस्तकें आपकी विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं जबकि विडियो मे काफी कुछ समझा देने और विजुअल जोड़ देने से हमारे दिमाग़ को जानकारी प्रोसैस करने की जरूरत कम पड़ती है और नतीजा कि हमारी  विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता का उपयोग न होने से इनमे बेहतरी कि गुंजाइश घट जाती है और इस तरह कुछ सृजन करने की संभावना भी| इसीलिए पुस्तकों का साथ बनाएँ रखें|
  • हमे विश्वास है कि जब लोग पढ़ना शुरू करेंगे तो समाज बेहतरी की ओर अग्रसर होगा, वही समाज जिससे प्रभावित हुये बिना हम नहीं रह सकते
  • कुछ लोगों मे इतनी स्पष्टता है कि वह सही नियत से एक काम में लगे हैं तो निरंतर अपने प्रयास को बढ़ ही रहे हैं बिना इस बात की परवाह के कि अभी वर्तमान मे उनका प्रयास कितना कारगर है क्योंकि सही नियत से किया गया काम बिलकुल उसी तरह है जैसे एक बीज को माहौल, खाद और पानी देकर पौधे से पेड़ और फिर फलदार पेड़ बनने तक उसके लिए लगे रहना|
  • कभी न भूलें कि आज जिन भी चीजों और मूल्यों का लाभ हम ले रहे हैं वह कहीं न कहीं हमारे पूर्वजों द्वार बहुत त्याग और संघर्ष से अर्जित किया हुआ है, चाहे वह आजादी हो या लोकतंत्र, इसीलिए हमे भी अपने बुढ़ापे और आने वाली पीढ़ी को सही और सुरक्षित हवा, जल और माहौल मिल सके, इसके लिए काम करना होगा, इसमें भी हमारे अकेले से काम न चलेगा, हम अगर एक एक पौधा लगा रहे हैं तो हमें ये देखना होगा कि कोई एक साथ हजारों और लाखों पौधे क्यों उजाड़ रहा? उसकी समझ पर काम करना होगा|
  • प्रयास करें कि रोज कम से कम एक पेज ही पढ़ लो एक पुस्तक से 
  • जब मातापिता और घर के बड़े स्वयं ही पुस्तक लेकर पढेंगे तो उन्हें देख घर के बच्चे भी पुस्तकों के तरफ आकर्षित होंगे, और ये आकर्षण जुड़ाव में बदल पाए इसके लिए जरुरी है कि घर में उम्दा, रोचक बाल साहित्य के रूप में रंगबिरंगी किताबें मौजूद हों|
  • इसे परिचर्चा में शामिल होना भी एक तरीका है अपने जीवन अपने दिन को सार्थक करने का |
  • जीवन सम्बन्ध है। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध, प्रकृति से सम्बन्ध, समाज से सम्बन्ध।

  • इन सम्बन्धों का आधार क्या है?

  • क्या है हमारे सम्बन्धों की वास्तविकता ?

  • क्या हमारे सम्बन्ध डर, लालच, मोह, आसक्ति की छाया मात्र हैं, या ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं? 

  • क्या हमारे सम्बन्ध अकेलेपन से बचने के उपाय हैं, या आन्तरिक पूर्णता का प्रस्फुटन ? 

  • और क्या है, सच्चा प्रेम? 

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

अंशिका शर्मा मैम, हिमांशु जोशी जी, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अंजना वर्मा, आरती मैम, अरविंद कुमार, धर्मेंद्र शर्मा सर, शोभित, प्रिया शर्मा, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, विजय कुमार, प्रिय कश्यप और कर्ण भाईजी|

कुशल और श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन कर्ण भाईजी ने किया|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

 

अगली परिचर्चा 17 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार