
क्या आप चाहते/चाहती हैं
ऐसा समाज जिसमे
लोग अपना काम बहुत अच्छे से कर रहे हों
लोग अपने काम से काम रखते हों और एक दूसरे को
परेशान न करते हों
सड़कों पर लोग नियम से चल रहे हों, दुर्घटनाएँ कम से
कम हों
सभी अपना काम ईमानदारी से कर रहे हों
लोग अपने वादों पर खरे उतरते हों
लोग किसी को उसकी जाति, समुदाय, वंश, शारीरिक
सुंदरता से न पहचान उसे उसके काम से पहचानते हों
अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का अवसर सबको मिलता
हो
लोग नयी जगह भी सुरक्षित महसूस करते हों
लोग एक दूसरे से सलीके से और प्रेम के साथ पेश आयें
लोग अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें
लोग अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग न करें
लोग कमजोर पर हसने के बजाय उनके साथ करुणा का
बर्ताव करें
तकलीफ मे फंसे इंसान को यथासंभव मदद मिले नाकि
लोग खड़े होकर बस वीडियो बनाएँ
काम करने वाले को काम का श्रेय दें नकि चापलूसी करने
वाले और बातें बनाने वालों को
सबको उनके हिस्से का श्रेय और प्रतिष्ठा मिले
हिंसा का स्थान न हो, लोगों को आजादी हो "न" कहने की
स्वतन्त्रता हो जबरदस्ती नहीं, सबसे उनका पक्ष या
अनुभव सुना जाए
साझा हितों के कार्यक्रमों मे सभी साझेदारों से उनकी राय
जानी जाये और उसे उचित स्थान भी दिया जाए
शिक्षकों का उचित सम्मान हो
लोग एक दूसरे का आंकलन सतही बातों पर न करें
अपराध कम से कम हों
मजबूत द्वारा कमजोर का शोषण न हो
भेदभाव न हो, परिवारवाद न हो
ज्यादा से ज्यादा लोगों में अपनी गलती स्वीकार करने का
और ज़िम्मेदारी लेने का साहस हो
वगैरह वगैरह......

बहुत तकलीफ होती है ये देखकर जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों को सुनता हूँ, ये कहते हुए कि अभी तो नौकरी की तैयारी कर रहे, अभी तो बिज़नेस को खड़ा करना है, साहित्य कहाँ!
कुछ तो इस अति प्रतियोगी समय की बात है और कुछ तो ओढ़ी हुयी बेचारगी, बेचारगी इसलिए कहना चाहता हूँ कि खुद को जानना और खुद की असली जरूरतों को समझना, हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए और साहित्य इसमें मदद करता है इसीलिए साहित्य तो जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए, उसके लिए नौकरी पाने या बहुत ज्यादा पैसा इकठ्ठा कर लेने का इंतज़ार क्यों!
हम अक्सर लोगों को कहते हुये सुनते हैं कि अमुक इंसान बहुत ही छोटी या संकीर्ण सोच का इंसान है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि और लोग भी हमारे बारे में ऐसी ही बाते हैं करते होंगे, कारण? एक दूसरे को न समझ पाना, कितना अच्छा हो कि हमारे आस पास देश दुनिया से, चहुं ओर का साहित्य मौजूद हो फिर जरूरत कम हो जाएगी किसी को संकीर्ण सोच वाला इंसान कहने की|

जब मायूसी में खुद को मोटीवेट करने के अन्य सतही उपायों में, अन्दर की तकलीफ ढकने के लिए मनोरंजन में समय लगाया जा सकता है तो फिर बेहतरीन साहित्य के अध्ययन में क्यों नहीं, जिससे एक दिशा और क्लैरिटी मिलेगी जो बार-बार मोटिवेशन की जरूरत को भी खत्म कर देगी|
ये साहित्य भी आपके लिए ही है, आपकी जरूरतों और दुविधाओं को ध्यान में रखकर, आपके आवेगों और भावनाओं को संबोधित करते हुये लिखा गया साहित्य|
किसी ने यदि अपना समय और जीवन देकर लिखा हो तो क्या आप इसे कोई व्यापार समझते हैं, क्योंकि कुछ लोगों का पूर्वाग्रह रहता है कि पुस्तकें भी एक वाणिज्य का हिस्सा हैं, इस पर मै एक ही बात कहना चाहता हूँ कि पुस्तकें यदि आपकी दुविधा को कम कर सकें, आपके जीवन को सार्थक दिशा दे सकें या फिर लेखकों के अनुभव और अभिव्यक्ति आपको सुकून दे सकें या मन को शांति दे सकें, समाज में सौहार्द बढ़े और लोगों मे संवेदनशीलता (ताकि वह एक दूसरे की तकलीफ समझ उनके साथ खड़े हो पाएँ) और करुणा बढ़े तो हमे ऐसी किताबों को खुद भी पढ़नी चाहिए और अन्य लोगों को भी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए|
हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी- निदा फ़ाजली आखिर ऐसा क्यों? जवाब साहित्य मे मिलेगा कि हम क्यों नहीं सहज हो पाते लोगों से जुडने में!

पुस्तकें निचोड़ होती हैं जीवन के अनुभवों का और प्रेम का प्रतीक होती हैं, उनके प्रेम का प्रतीक जिन्होने अपने जीवन के अहम पल में आपके लिए लेखन किया और फिर हमें उपलब्ध कराया|
बेचारगी वाली बात पर वापस आते हैं - ऐसी ही बेचारगी कुछ ऐसे लोगों ने भी ओढ़ रखी है जो एक नौकरी में पहले से हैं और दूसरी की तैयारी कर रहें, उनसे भी यही कहना है कि जिस तरह हम तैयारी के साथ सोना और आराम नहीं छोड़ देते और न ही छोड़ पाते हैं सोशल मीडिया और दोस्तों के साथ गपशप या मन बहलाने के अन्य शौक तो फिर क्यों हम दिन का आधा या एक घंटा साहित्य को नहीं दे सकते!, क्या केवल हर वक़्त प्रतियोगी परीक्षा के लिए पढ़ते रहने से हमारे सफल होने की संभावना 100% हो जाएगी, नहीं, फिर क्यों जीवन और दिनचर्या के संतुलन को बिगाड़ना? क्या ऐसा करना समझदारी है!
मैंने ऐसे काफी लोगों को देखा है जो सब कुछ छोड़कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और फिर चयन न होने पर जीवन से हताश हो जाते हैं उसका कारण साफ है क्योंकि उन्होने जीवन के केंद्र में ही उस परीक्षा को ही रख लिया, जबकि करने के लिए और भी बहुत कुछ है जीवन में, साहित्य अध्ययन से स्वयं की समझ को विस्तार देना भी उनमे से एक काम है, जो न केवल आपको समझ देता है बल्कि निर्णय लेने और विकट परिस्थितियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है| और साथ ही मदद करते हैं लोगों के साथ तालमेल बैठाकर चलने में क्योंकि जीवन मे यह भी तो सीखना ही है तो इसे भी उचित महत्व दें, जब जीवन में और भी प्राथमिकताएँ होगी तो परीक्षा मे असफलता आपको तोड़ेगी नहीं, जीवन से निराश नहीं करेगी|

एक सवाल अक्सर आता है मन में कि बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग भी क्यों भ्रष्टाचार मे संलिप्त पाये जाते हैं, क्यों उनमे भी साहस की कमी मिलती है अन्याय के खिलाफ लड़ने को? उसका जवाब यही है कि वो उत्कृष्ट साहित्य से दूर रहे और कभी जान ही न पाये स्वयं को! वो बस अपने आपको एक शरीर मानकर रह गए, काश! उन्होने महान लोगों को पढ़ा होता है और जान पाते कि कैसे महान आत्माओं ने सत्य और न्याय को व्यक्तिगत हित-अहित और मोह से ऊपर रखकर जीवन मे डटकर संघर्ष किया और केवल अपने परिवार तक सीमित न रहकर, जन सामान्य को भी अपना अंश मानकर कभी अन्याय और भेदभाव के रास्ते नहीं चले|

बहुत बार नासमझी में हम ऐसी प्राथमिकताएँ निर्धारित कर लेते हैं खुद के लिए (अमूमन समाज की देखा देखी में) कि हमेशा दबाव में रहते हैं और लोगों से प्रेमवत पेश नहीं आ पाते, साहित्य ऐसी अवस्था में आपको वह दृष्टि दे सकता है, जिससे आप समझ सको कि क्या है जो आपके जीवन मे वाकई जरूरी है और क्या है जो बिलकुल गैर जरूरी है और इस तरह आप समाज के दबाव मे आकर "सामाजिक गुलामी" करने से बच जाते हो|
कभी कभी हम दूसरों को समझ नहीं पाते और दूसरे हमे नहीं समझ पाते, कभी कभी ऐसा भी होता है कि हम देखते हैं कि कोई एक फर्जी इंसान पर भरोसा कर लेता है बल्कि एक सच्चे इंसान से दूर भागता है| क्या है ये सब ?- ये है समझ का अभाव और है दूसरों को समझ पाने या खुद को अभिव्यक्त कर पाने की कुशलता न हो होना|

साहित्य अध्ययन इसमे भी आपकी मदद कर सकता है क्योंकि कभी-कभी खुद को अभिव्यक्त करने का पूरा समय नहीं मिल पाता हमें, उस स्थिति में यदि सामने वाला साहित्य अध्ययन करने वाला इंसान हुआ तो संभावना है कि उसकी समझ इतनी विस्तृत होगी कि इशारे में ही आपकी बात समझ जाए, जैसे एक डॉक्टर अमूमन लक्षणों से हमारी दिक्कत समझ जाता है|




हर गाँव या मोहल्ले में एक सामुदायिक पुस्तकालय हो।
उपहार के रूप में लोग पुस्तकें भेंट करें।
शैक्षणिक संस्थाओं में पुरस्कार के रूप में अनिवार्य रूप से पुस्तकें दी जाय।


साहित्य हमे एक दूसरे को समझने में मदद करता है, और इस तरह से एक दूसरे से जुड़ने में भी और जब हम खुद को समाज से जुड़ा हुआ पाते हैं, तो हमारे अंदर प्रेम का भाव आता है जो हमसे एक से एक बेहतर काम करवा लेता है और हमारे लिए आनंद की अवस्था में रहना आसान होता है, इसीलिए साहित्य अध्ययन हमारी समझ को बेहतर करके हमारे मन को भी बेहतर कर सकता है|

बताये देता हूँ :-


इसीलिए अंत में इस बात पर अपनी बात खत्म करता हूँ कि यदि सामाज की बेहतरी के लिए कुछ बदलाव करने की चाहत है आपमें, तो बिना किस बड़े पद या खूब पैसे कमाकर लोगों का भला सोंचने से पहले अभी से अपनी दैनिक दिनचर्या में साहित्य अध्ययन को स्थान दें और अन्य लोगों को भी अपने कर्मों द्वारा प्रेरित करें|
याद रखिए, किसी पीड़ित की मदद से बड़ा और जरूरी काम है, उस इंसान का हृदय परिवर्तन जो लोगों को पीड़ा देने मे खुशी पाता है|
उससे भी पहले उस मानसिकता पर वार जो इंसान को उत्पीड़क और क्रूर बनाती है|

किसी गरीब की मदद से भी महत्वपूर्ण काम ये है कि उसे अपनी गरीबी मिटाने के अवसर मिलें, उसे उसकी मेहनत और जरूरत भर की आमदनी मिले, और ये तब ही संभव है जब लोगों में खुद के उन्नयन के लिए दूसरों को लूटने और एक्सप्लोइट करने की मानसिकता न हो|
एक उत्पीड़क केवल दूसरों का उत्पीड़न ही नहीं करता वह दूसरों के चेहरे की हंसी और जीवन की शांति छीनकर अपने आस पास के माहौल को भी दुख और तड़प से भर देता है!
हमारी पाश्विक प्रवृत्ति, असंवेदनशीलता और अधिक से अधिक भोगने की हवश और लोगों पर राज करने की असीमित भूख!
कौन मिलाएगे हमें अपने से पाशविक रूप से, कौन जगाएगा हमारे अंदर संवेदना?
जवाब है, "उत्कृष्ट साहित्य- दिल को छूती कहानियाँ, उपन्यास, तकलीफ और तड़प को अभिव्यक्त करती कविताएँ, सच्चाई उजागर करते संस्मरण और बहुत कुछ"
तो क्या आप संकल्प ले रहे/रहीं कि आज से तमाम व्यस्तताओं के बीच साहित्य को वक़्त देना सुनिश्चित करेंगे/करेंगी, अगर नहीं कर सकते/सकतीं तो फिर समाज में बदलाव कि बात करना या लोगों पर दोष मढ़ते रहने की आपकी टेंडेसी केवल खुद को धोखा देने और मन बहलाने वाली बात भर है, उसमें कोई सच्चाई नहीं |
यदि असहमत हैं तो लिख भेजें, ईमेल नीचे है -
कुछ नहीं तो एक पत्रिका से ही शुरुआत कर लें, भले ही कुछ खर्चें प्रबंधित करने हों|
शुभेच्छा
'कुमार' लवकुश कुमार
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर का आभार ज़ो समय-समय उपाय सुझाते रहते हैं, समाज में पढ़ने लिखने की संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए ताकि हम एक संवेदनशील और साहसी समाज का निर्माण कर सकें|
आपके द्वारा शुरू किया गया "दीवार पत्रिका - एक अभियान " इस दिशा में एक सशक्त कदम है| आपकी पुस्तक "शिक्षा के सवाल, लोकोदय प्रकाशन लखनऊ" न केवल आपके शैक्षिक अनुभवों का संकलन हैं वरन उन दिक्कतों को अभिव्यक्त करता दस्तावेज़ भी है जो शिक्षा को उसके असली उद्देश्य को पाने यथा बच्चों में सृजनशीलता, रचनात्मकता, स्वतंत्र सोच, स्पष्टता और साहस जगाने/निखारने को पामे में बाधा बन रही हैं|
आपका कविता संग्रह "अब पहुंची हो तुम - समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून" एक संकलन है ऐसी कविताओं का जो न केवल हमे संवेदित करती हैं बल्कि स्पष्टता और साहस भी देती हैं|
आपके द्वारा संपादित, "शैक्षिक दखल" एक बेहतरीन और जरूरी प्रयास है शिक्षा के समग्र पहलूओं को समझने का और उसके अंतिम उद्देश्य को पाने के लिए जरूरी उपाय करने हेतु माहौल तैयार करने का|
"समाज के सवाल शिक्षा के सवालों से भिन्न नहीं हैं|"- महेश चन्द्र पुनेठा

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