बीते रविवार (24-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से बारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
अकार - पत्रिका (दिलरस प्रियंवद द्वारा संपादित)
चीफ़ की दावत – भीष्म साहनी
The Trial Week – a wellness Programme
12 Week Fitness Project –
The autobiography of Paramhansh Yoganand

- शिक्षा के उद्देश्य में एक है सीखने और समझने की ललक को जिंदा रखना
- जानकारी भरना और पढ़ाना मूल उद्देश्य नहीं
- ज्ञान का निर्माण और सृजन स्वयं कर सकें विद्यार्थी यह है अंतिम उद्देश्य
- बच्चे बचपन से स्वाभाविक रूप से ही सीखने की पृवत्ति रखते हैं, जिज्ञासा रखते हैं
- बीज को हम खींचकर नहीं बढ़ाते वरन उसे अंकुरित और पोषित होने का उचित माहौल देते हैं वैसे ही हो बच्चों की शिक्षा व्यवस्था भी
- अभिभावक तो सबसे पहले अध्यापक हैं

- जो लोग साहित्य अध्ययन की शुरुआत करना चाहते हैं और उन्हे यदि मोटी किताबें डराती हैं तो वह पत्रिका से शुरुआत कर सकते हैं|
- पत्रिका का सुझाव इसलिए क्योंकि हर पाठक की अपनी रुचि होती है, किसी को कहानी तो किसी को कविताएं और किसी को संस्मरण या यात्रा वृत्तान्त पसंद आते हैं, पत्रिकाओं में इस तरह कई विधाओं पर रचनाएँ होती हैं| दूसरा कि एक रचना मन को न भाने पर आगे बढ़ा जा सकता और कोई दूसरी रचना पर ध्यान दिया जा सकता है| इस तरह एक रचना ही सही लेकिन मुकम्मल पढ़ा जा सकता है |
- अकार संगमम – 3 दिन का आयोजन, जहां पर साहित्यकारों के बीच चर्चा
- यह एक वैचारिक पत्रिका इसीलिए इससे भी आसान के लिए पाखी, हंस, मधुमती और आजकल जैसी कुछ बेहतरीन पत्रिकाओं से शुरुआत की जा सकती है|
- यदि आप कुछ लिखती/लिखते हैं तो रचनाएँ प्रेषित की जा सकती हैं पत्रिकाओं को इस तरह आपका एक पाठक वर्ग तैयार हो सकता है जो भविष्य में आपके द्वारा किसी पुस्तक के लिखे जाने पर, पाठकों तक उसकी पहुँच सुनिश्चित करने में मददगार हो सकता है|

- आज की जो भी हालत है हमारी उसे स्वीकार करना चाहिए और बेहतरी के लिए प्रयास लेकिन उस हालत को अपने साथ के लोगों से छिपाकर उनके सामने बेहतर होने का ढोंग इंसान को अपनी ही खूबियाँ भूल जाने की तरफ धकेल देता है, आपकी भाषा और आपका पहनावा जैसी भी हो उसके लिए खुद को कभी हीन न समझें और इस बात को समझें की जीवन की सफलता, आंतरिक सच्चाई, करुणामय हृदय और चीजों की समझ के साथ जीने में है नाकी बाहरी दिखावे में|
- जब तक हम अपनी कमियों को छिपाते रहेंगे, उन्हे दूर करना मुश्किल ही रहेगा
- हम सबमें अपार संभावनाएं हैं, किसी इंसान को कमतर बोलकर उसे छिपा देना उसकी मानवीय गरिमा के खिलाफ है, जैसा की चीफ की दावत में दिखाया गया है|
- व्यायाम में, पूर्णता हो, केवल शाम का टहलना पर्याप्त नहीं
- पढ़ाई भी तब ही होगी जब शरीर स्वस्थ हो, स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मष्तिस्क का निवास होता है |
- औरतों के लिए तो उचित व्यायाम बहुत ही जरूरी है|
- आपकी छवि दूसरों के मन मे कैसी है, इसका अगर दबाव रहेगा तो इंसान अपनी सहजता खो देता है, सभ्य दिखने के दबाव में सहजता न खोएँ और पूर्वाग्रह में न रहें|
- स्वयं को खुलकर व्यक्त करना, यह सुनिश्चित करता है कि लोग आपको लेकर कम से कम भ्रम मे रहेंगे|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम, गुंजन त्यागी मैम, सौम्या मैम, अरविंद कुमार, रंजीत ठाकुर, प्रिया शर्मा, अनुपम जायसवाल, प्रीति जायसवाल, गायत्री जायसवाल, अंकित जायसवाल, रंजीत कुमार, प्रिया कश्यप,विशाल जायसवाल, c सिंह और लवकुश कुमार|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 06 जून (शनिवार रात 08:30 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार