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घोंसला और पिंजरा (एक कविता) - सौम्या गुप्ता

तुम बनाओ अपने महल अटारी,

मुझे अपने घोंसले में रहने दो,

मत रोको मुझको अब पिंजरे में,

मुझे गगन में उड़ने दो।

 

जानती हूँ तुम मुझे पिंजरा भी सोने का दोगे,

चुगने के लिए मोती से दाने भी दोगे,

पर जानती हूँ ये भी कि,

फिर तुम मुझे उड़ने भी नहीं दोगे,

मुझसे कीमत वसूलोगे,

मेरे पंखों को कुतरोगे।

 

इसीलिए मैं तिनका-तिनका जोड़कर बनाऊँगी अपना घोंसला,

चुगने के लिए दाना भी खुद ले आऊँगी,

लड़ूगी चील-बाज अन्य पक्षियों से अकेले,

कभी हार जाऊँगी, कभी संघर्ष कर पार पाऊँगी,

है सब मंजूर मुझे,

पर मैं तुम्हारे पिंजरे में नहीं आऊँगी।

 

 

- सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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