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अंतिम दृश्य (कहानी) - विशाल चंद

बरसों बाद शहर से छुट्टियाँ बिताने आया नाती शुभम अपने बूबू (दादाजी) के साथ खेतों की ओर निकल पड़ा ।

 

रास्ते में एक के बाद एक बंद पड़े मकानों पर ताले लटके थे। कहीं टूटी छतों पर घास उग आई थी तो कहीं आँगन में झाड़ियां अपनी मर्ज़ी से बढ़ रही थी। पूरे गाँव में ऐसा सन्नाटा था कि दूर बहते गधेरे की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।

 

नाती ने धीरे से पूछा,

"बूबू, इतने सारे घर खाली क्यों हैं? क्या यहाँ कोई नहीं रहता?"

बूबू कुछ क्षण चुप रहे। उनकी आँखें उन बंद दरवाज़ों पर टिक गईं, जिनके पीछे कभी जीवन बसता था।

 

उन्होंने लंबी साँस ली और बोले,

"नाती, ये घर खाली नहीं हैं... इनमें यादें रहती हैं। यहाँ कभी हँसी रहती थी, त्योहार रहते थे, खेतों की खुशबू रहती थी। अब बस ताले रह गए हैं।"

 

दोनों धीरे-धीरे खेतों की ओर बढ़ने लगे। बूबू ने दूर फैले सीढ़ीनुमा खेतों की ओर इशारा करते हुए कहा,

 

"जब मैं तेरी उम्र का था, तब इन खेतों में मंडुवा, कौदा, झंगोरा, जौ और गेहूँ इतना होता था कि साल भर किसी चीज़ की कमी नहीं रहती थी। कटाई के दिनों में पूरा गाँव एक परिवार बन जाता था।"

 

नाती ने चारों ओर देखा। अधिकांश खेत झाड़ियों से ढके थे। "अब खेती क्यों नहीं होती, बूबू?"

 

बूबू मुस्कुराए, लेकिन वह मुस्कान भीतर के दर्द को छिपा नहीं सकी

"खेती करने वाले ही कहाँ बचे, नाती? पहले जंगली सूअर रात में फसल का थोड़ा-बहुत नुकसान करते थे। अब बंदर, लंगूर, हिरण और दूसरे जंगली जानवर मिलकर पूरी मेहनत उजाड़ देते हैं। ऊपर से पढ़े-लिखे लड़कों को गाँव में काम नहीं मिलता। पेट की आग उन्हें शहर ले जाती है।"

 

कुछ दूर चलने के बाद एक कच्ची सड़क दिखाई दी।

नाती ने पूछा,

"बूबू, यह सड़क कब बनी?"

बूबू की आँखों में हल्की-सी चमक आई।

"यह सड़क सरकार ने नहीं बनाई थी बेटा... इसकी शुरुआत गाँव वालों ने की थी। हर घर से जिसने जितना बन पड़ा, उतना चंदा दिया। जिसके पास पैसे नहीं थे, उसने अपने हाथों का श्रम दिया। महीनों तक हम सबने गैंती और फावड़े से पहाड़ काटा। उस दिन लगा था कि अब हमारे बच्चे लौट आएँगे।"

 

"फिर लौटे क्यों नहीं?" शुभम ने पूछा 

यह सुनकर बूबू कुछ देर तक चुप रहे।

फिर बोले,

"सड़क से रास्ता बनता है बेटा... ज़िंदगी नहीं। ज़िंदगी के लिए रोज़गार चाहिए, अस्पताल चाहिए, अच्छे स्कूल चाहिए और ऐसी खेती चाहिए जिसमें किसान की मेहनत बची रहे। जब तक ये सब नहीं होगा, तब तक सड़क गाँव तक तो पहुँच जाएगी, लेकिन गाँव के बच्चे वापस नहीं पहुँच पाएँगे।"

 

दोनों खेत की मेड़ पर बैठ गए।

सामने डूबता सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था। हवा में पहाड़ की हल्की-सी खुशबू थी लेकिन उस खुशबू में एक अनकहा दर्द भी घुला हुआ था।

 

नाती ने धीरे से बूबू का हाथ पकड़ लिया।

"बूबू... क्या मैं बड़ा होकर इस गाँव में रह सकता हूँ?"

बूबू ने उसके सिर पर हाथ फेरा। उनकी आँखें भीग चुकी थीं

"रहना नाती... लेकिन मजबूरी में नहीं, अपनी मर्ज़ी से। ऐसा पहाड़ बनाना कि किसी को अपना गाँव छोड़ना ही न पड़े।"

सूरज पूरी तरह पहाड़ के पीछे छिप चुका था।

घर लौटते समय बूबू ने एक बार फिर पीछे मुड़कर गाँव को देखा। बंद घर वैसे ही खड़े थे, जैसे बरसों से किसी अपने का इंतज़ार कर रहे हों और नाती पहली बार समझ रहा था कि पलायन केवल गाँव छोड़ने का नाम नहीं बल्कि उन आँखों का दर्द है जो हर शाम लौटते कदमों की राह देखती हैं।

विशाल चन्द  @reading_owl.3

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लेखक की टिप्पणी

यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "उत्तराखंड में पलायन और मेरा गांव" से प्रेरित है। उस समय उठाए गये पलायन के प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।


विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

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