लगभग हर दौर में दो तरह के लेखक रहे हैं—एक वे जो भाषा की अंतिम चमक-दमक और शिल्प पर वर्षों काम करते हैं, और दूसरे वे जो समय की पुकार सुनकर तत्काल बोलते हैं। समाज को दोनों की आवश्यकता होती है।
मेरी पुस्तक "अंतस – ज़रा ठहरिए" पर पिछले कुछ दिनों में अनेक प्रतिक्रियाएँ मिलीं। इन प्रतिक्रियाओं में एक रोचक अंतर दिखाई दिया।
किशोर और युवा पाठकों का एक बड़ा वर्ग कह रहा है—
"सर, यही तो हम ढूँढ़ रहे थे।"
"बहुत से ऐसे सवाल पहली बार पढ़ने को मिले जिन पर हमने कभी सोचा ही नहीं था, या इस तरह से नहीं सोचा था।"
"यह किताब जैसे हमारी पीढ़ी के लिए ही लिखी गई है।"
इन प्रतिक्रियाओं को पढ़कर संतोष होता है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य भी यही था—युवाओं/किशोरों को कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर ले जाना।
लेकिन दूसरी ओर कुछ वरिष्ठ और गंभीर पाठकों ने भाषा, शैली, संपादन, टाइपिंग तथा अभिव्यक्ति की कमियों/विस्तार/गहराई की ओर भी ध्यान दिलाया है। मैं उनका भी उतना ही आभारी हूँ।
वास्तव में, दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए मूल्यवान हैं।
फिर भी, इस अवसर पर मैं अपनी लेखकीय दृष्टि स्पष्ट करना चाहता हूँ।
मैंने यह पुस्तक भाषा का चमत्कार दिखाने के लिए नहीं लिखी।
मैंने यह पुस्तक इसलिए लिखी क्योंकि मुझे लगा कि आज का किशोर और युवा बहुत सारी सूचनाओं के बीच रहकर भी बहुत से बुनियादी प्रश्नों से दूर होता जा रहा है।
मुझे ऐसा लगता है, या कहिए कि मैंने अपनी सीमित दृष्टि में ऐसा देखा है कि:
वह करियर पर बात करता है,
लेकिन जीवन पर कम।
वह सफलता पर चर्चा करता है,
लेकिन संतोष पर नहीं।
वह प्रतियोगिता समझता है,
लेकिन स्वयं को कम समझता है।
वह दुनिया को बदलना चाहता है,
लेकिन अपने भीतर झाँकने का समय नहीं निकाल पाता।
यदि यह पुस्तक उसे थोड़ी देर रुककर सोचने पर विवश करती है, तो मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाता है।
निश्चित रूप से हैं।
मैं यह दावा कभी नहीं करूँगा कि यह एक परिपूर्ण पुस्तक है।
भाषा की सीमाएँ हो सकती हैं।
संपादन में त्रुटियाँ हो सकती हैं।
टाइपिंग की गलतियाँ भी हो सकती हैं।
जो मित्र इन कमियों की ओर संकेत कर रहे हैं, वे वास्तव में मेरी सहायता कर रहे हैं। अगली आवृत्तियों में इन्हें सुधारना मेरी जिम्मेदारी है।
लेकिन मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा—
हर प्रकार की त्रुटि समान महत्व की नहीं होती।
एक त्रुटि भाषा में हो सकती है।
दूसरी त्रुटि समय पर न बोलने की हो सकती है।
मेरे लिए दूसरी त्रुटि अधिक गंभीर है।
मै मानता हूँ कि, समय पर कही गई अपूर्ण बात, देर से कही गई परिपूर्ण बात से अधिक उपयोगी हो सकती है।
दूसरा यदि मेरे द्वारा उठाए गए किसी प्रश्न पर गहराई से नहीं भी लिखा गया तो उसका कारण, एक ही किताब में कई सारे जरूरी प्रश्न शामिल करना था, कहते हैं समझदार के लिए इशारा काफी होता है, वैसे जिज्ञासु पाठक के लिए इच्छित विषय पर गहनता से जानने के लिए वरिष्ठ लेखकों का साहित्य भी मौजूद है, इसी के दृष्टिगत ही तो मैंने पुस्तकों की एक सूची भी दे रखी है मेरी पुस्तक के अंत में|
आज का समय तेजी से बदल रहा है।
बच्चे और युवा प्रतिदिन हजारों संदेशों, वीडियो और विचारों से घिरे हैं।
ऐसे समय में यदि कोई लेखक यह सोचकर वर्षों तक चुप रहे कि अभी भाषा और बेहतर हो जाए, शैली और निखर जाए, प्रत्येक वाक्य पूर्ण हो जाए, तब तक शायद जिन प्रश्नों पर बात करनी थी, वे और अधिक जटिल हो चुके होंगे।
मैं पूर्णता का विरोध नहीं करता।
बल्कि मैं स्वयं उसे पाने की दिशा में उन्मुख हूँ।
लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि जरूरी बात समय पर कही जानी चाहिए।
पूर्णता की यात्रा चलती रह सकती है।
मौन की भरपाई बाद में नहीं हो सकती।
अक्सर हम मान लेते हैं कि लेखक पुस्तक लिखने के बाद पूर्ण हो जाता है।
मेरा अनुभव इससे बिल्कुल अलग है।
मेरे लिए हर पाठक एक शिक्षक है।
कोई भाषा सिखाता है।
कोई विचारों की गहराई दिखाता है।
कोई संपादन की आवश्यकता बताता है।
कोई यह विश्वास दिलाता है कि पुस्तक ने उसके जीवन में कुछ बदल दिया।
इन सभी से मैं सीख रहा हूँ।
तो मेरे लिए यह उपलब्धि किसी भी भाषाई प्रशंसा से कम नहीं है।
साहित्य का अंतिम उद्देश्य केवल भाषा का सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चेतना जगाना भी है।
मैं अपने सभी आलोचकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।
जो कमियाँ बता रहे हैं, वे भी मेरी यात्रा के साथी हैं।
जो पुस्तक के उद्देश्य को समझ रहे हैं, वे भी।
मैं भविष्य में भाषा, शिल्प और संपादन—सभी पर अधिक मेहनत करूँगा।
लेकिन यदि मुझे फिर कभी चुनाव करना पड़े कि एक जरूरी बात आज कहूँ या उसे पूर्ण बनाने के लिए वर्षों तक रोककर रखूँ, तो संभवतः मैं फिर वही करूँगा जो इस पुस्तक के साथ किया—
समय की पुकार को प्राथमिकता दूँगा।
क्योंकि मेरा विश्वास है—
पूर्णता एक सतत यात्रा है, पर समय पर की गई सार्थक अभिव्यक्ति कभी-कभी एक पूरी पीढ़ी की दिशा बदल सकती है।
मैं आलोचना को स्वीकार करता हूँ, सुधार के लिए प्रतिबद्ध हूँ, लेकिन समय पर आवश्यक संवाद को पूर्णता की प्रतीक्षा में स्थगित करना उचित नहीं मानता।
सादर धन्यवाद
लवकुश कुमार
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