
यह मेरे लिए खुशी की बात है कि जिस पुस्तक के लिए, इतने महीनो से प्रयास चल रहा था वह अब पाठकों के लिए उपलब्ध हो गई है, कुछ आम सवालों के जवाब, परिचय और आपकी प्रतिक्रिया के लिए यह लेख | ईमेल - KCPHYQA@GMAIL.COM
सवाल जैसे कि
लेखक का परिचय जरूरी है और प्रासंगिक भी, पुस्तक की सामग्री के आंकलन में
ये किताब क्यों खरीदें, अन्य किताबों से यह किस तरह अलग हो सकती है? कुछ बातें इस पर :
स्टूडेंट्स के लिए है अतः स्टूडेंट्स की कुछ समस्याएँ जिन्हें संबोधित किया गया है :
कुछ बातें जिनके चलते इस पुस्तक को लिखने की जरुरत पड़ी:
कुछ ही दिनों में यह पुस्तक अमेज़न और फ्लिप्कार्ट पर उपलब्ध होगी, अपने जानने वाले विद्यार्थियों को गिफ्ट करने के लिए एक एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है यह पुस्तक, जो न केवल उनके पढ़ने के तरीके को बेहतर करेगी बल्कि उन्हें एक अवलोकन और एनालिसिस की दृष्टि देगी| इसे निम्नलिखित लिंक से खरीदा जा सकता है| https://notionpress.com/in/read/ok-physics-tips-aur-tareeke, या बिना डिलीवरी शुल्क के प्राप्त करने के लिए अपने निकटतम पुस्तक विक्रेता द्वारा डिमांड (वितरक को) सबमिट करवाएं (पुस्तक के लिए अपने पते का फॉर्म भरें )

सभी प्यारे विद्यार्थियों से एक बात—अपने विषय में आने वाली कठिनाइयों से जूझना सीखिए। किसी प्रश्न का उत्तर या समाधान तुरंत कहीं से खोज लेने की आदत मत डालिए। ऐसा करने से आपकी सोचने-समझने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। अपना अधिक समय मूल अवधारणाओं (Concepts) को स्पष्ट करने में लगाइए। जब आपकी नींव मजबूत होगी, तब आप सबसे कठिन अवधारणाओं को भी समझ पाएँगे और जटिल से जटिल प्रश्नों का समाधान भी स्वयं कर सकेंगे।
इस संदर्भ में अब्राहम लिंकन का एक प्रसिद्ध कथन याद आता है—"यदि मुझे किसी पेड़ को काटने के लिए छह घंटे दिए जाएँ, तो मैं पहले चार घंटे अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाऊँगा।" यही सिद्धांत पढ़ाई पर भी लागू होता है। अवधारणाओं को मजबूत करना ही अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करना है।
अक्सर ऐसा होता है कि कोई विद्यार्थी किसी कठिन प्रश्न से लंबे समय तक जूझता रहता है, फिर भी उसका समाधान नहीं निकाल पाता। तब उसे स्वयं या उसके माता-पिता को लगता है कि उसका समय व्यर्थ चला गया। वास्तव में ऐसा नहीं होता। भले ही उस एक प्रश्न का उत्तर न मिला हो, लेकिन उस संघर्ष के दौरान अनेक संबंधित अवधारणाएँ उसके मन में स्पष्ट हो चुकी होती हैं। यही बौद्धिक विकास की वास्तविक प्रक्रिया है।
एक दार्शनिक के बारे में कहा गया है कि "दार्शनिक वह अंधा व्यक्ति है जो अँधेरे कमरे में काली बिल्ली को खोजता रहता है।" परंतु विद्यार्थी की स्थिति तो इससे कहीं बेहतर है। उसकी आँखें खुली हैं, चारों ओर ज्ञान का प्रकाश फैला हुआ है और उसके पास सीखने की इच्छा भी है। ऐसे में यदि वह धैर्य और निरंतर प्रयास बनाए रखे, तो वह किसी भी अवधारणा रूपी 'काली बिल्ली' को अवश्य खोज लेगा।
इसलिए कठिनाइयों से घबराइए नहीं, उनसे मित्रता कीजिए।
हर संघर्ष आपको केवल एक प्रश्न का उत्तर नहीं देता, बल्कि सोचने की क्षमता, धैर्य और आत्मविश्वास भी देता है। यही गुण जीवन भर आपकी सबसे बड़ी पूँजी बनेंगे।
- भुवन पंत "इत्यादि"
लगभग ढाई दशकों तक भौतिक विज्ञान के एक शीर्ष संस्थान का नेतृत्व करते हुए, भौतिक विज्ञान में परास्नातक आदरणीय भुवन पंत सर ने सैकड़ों युवाओं को देश-विदेश के नामचीन इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों तक पहुँचाया। पिछले तीन वर्षों से अध्यापन को विराम देकर वे अपना पूरा समय रचनात्मक लेखन को दे रहे हैं। उनकी व्यंग्य रचनाएँ समाज के विविध रंगों, विरोधाभासों और विडंबनाओं को तीक्ष्ण किंतु सहज शैली में प्रस्तुत करती हैं।

HC Verma (HCV) सर की कुछ बातें
प्यारे विद्यार्थियों आपने वर्मा सर का नाम जरूर सुना होगा और अगर नहीं सुना है तो उनके बारे में अपने शिक्षक से बात करें या इन्टरनेट का सहारा लें|
वाह देश के जाने माने भौतिक विज्ञानी और आई आई टी कानपुर में भौतिकी के प्रोफेसर रहे हैं और सेवा निवृत्ति के बाद भी भौतिकी के क्षेत्र में महती भूमिका निभा रहे हैं, मई 2026 में उत्तराखंड के द्वारहाट के एक विद्यालय में उनसे मिलना और उन्हे सुनना हुआ|
प्रस्तुत हैं कुछ बातें आपके लिए, ज्यादा जानकारी के लिए सर की "बेहतरीन किताब भौतिकी की समझ" पढ़ी जा सकती है और उनके youtube एवं वेबसाइट ( https://hcverma.in/books ) पर विजिट किया जा सकता है|
पूरा लेख पढ़ने के लिए विजिट करें https://kumarchetna.in/article.php?id=917

“बड़े वैज्ञानिक शोध के लिए यदि हम जुझारू शोधार्थियों और बेहतरीन अवसंरचना के लिए उत्कृष्ट इंजीनियरों का पर्याप्त संख्याबल चाहते हैं, तो हमें सुनिश्चित करना होगा कि शुरुआत से ही बच्चों में विज्ञान के प्रति प्रेम पैदा हो, डर नहीं। उसी प्रयास में बतकही के अंदाज में प्रस्तुत है यह पुस्तक।”
अपने ग्रेजुएशन के दिनों से बच्चों को पढ़ाते और मार्गदर्शन करते समय, फिर स्वतंत्र रूप से बच्चों के डाउट्स हल करते हुए मैंने गौर किया कि अलग-अलग स्तर के बच्चों को कई तरह की दिक्कतें आ रही हैं—भौतिकी के सिद्धांत समझने में, आंकिक प्रश्नों को हल करने के लिए सही दिशा (अप्रोच) में आगे बढ़ने में। यहाँ तक कि कई ऐसे छात्र-छात्राएँ मिले जो आंकिक प्रश्नों में दी गई राशियों और प्रतीकों को पहचान पाने में ही सक्षम नहीं हो पाते। जब उन्हें नोटेशन (प्रतीक) ही समझ नहीं आ रहा, तो किस सूत्र को लगाएँ, इसका निर्णय भी बहुत मुश्किल हो जाता है। थोड़ी भिन्नता के साथ एक जैसे दिखने वाले प्रश्नों में कौन-सा सूत्र लगना है, यह नहीं जान पाते। इस तरह की दिक्कतों के साथ कुछ छात्रों से गणना में ही गलतियाँ हो जाती हैं (अभ्यास की कमी के चलते)। इन दिक्कतों का समाधान करने के उद्देश्य से ही “ओके फिजिक्स शृंखला” की पुस्तकों में सही प्रक्रिया को ध्यान में रखकर कई स्तर के प्रश्न और समुचित मार्गदर्शन उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।
बाजार में मौजूद पुस्तकों को पढ़कर ऐसा लगता है कि उन पुस्तकों को लिखते समय यह धारणा मन में रही है कि पाठक/विद्यार्थी दसवीं में बहुत अच्छे होंगे। जबकि वास्तविकता यह है कि कई कारणों—व्यक्तिगत दिक्कतों, शिक्षण या अभ्यास की अपर्याप्तता—के चलते बहुत से विद्यार्थियों का दसवीं का आधार ही गड़बड़ हो जाता है या कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक की सामग्री इस तरह निर्मित की गई है कि वे विद्यार्थी जिनका हाई स्कूल अच्छा नहीं रहा, या फिर भौतिकी में अपेक्षाकृत कमजोर रह गए, या जिन्हें भौतिकी से डर लगता है, उन्हें भी भौतिकी में दिक्कत न आए। वे सैद्धांतिक के साथ-साथ आंकिक प्रश्नों में भी माहिर हो सकें, जिससे बोर्ड में तो अच्छा कर पाएँगे ही, प्रतियोगी परीक्षाओं में ज्यादा सवाल हल करके बेहतर प्रदर्शन कर पाएँगे और विज्ञान/तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ पाएँगे।
बाजार में पहले ही भौतिकी पर बहुत सी किताबें हैं, जिनमें छोटे-से-छोटे टॉपिक पर लेख हैं और अभ्यास के लिए प्रश्नावली भी हैं। लेकिन कुछ कमी जरूर है, जो छात्रों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों से परिलक्षित होती है। मेरे अपने कुछ साल के chegg.com और toppr.com जैसे प्लेटफॉर्म के लिए “सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट, कंटेंट राइटर” के काम के साथ, अपने शिक्षक बन चुके साथियों के फीडबैक से जाना कि काफी छात्र ऐसे हैं जो भौतिकी को समझने के बजाय रटने वाला विषय मानते हैं। नतीजा यह होता है कि नए सवाल, जिनमें सोचने और तर्क की जरूरत होती है, उनसे नहीं हो पाते। काफी बच्चे तो गणित की मामूली बारीकियों से अनभिज्ञ रहने के चलते अपनी डॉक्टर या इंजीनियर बनने की इच्छा पूरी नहीं कर पाते, क्योंकि भौतिकी के मूलभूत आंकिक प्रश्न भी हल नहीं कर पाते।
समाधान के एक प्रयास के रूप में इस पुस्तक को लिखा गया है, जिसमें कई टिप्स और तरीकों पर बात हुई है, विश्लेषण क्षमता बढ़ाने पर बात हुई है, किसी भी अध्याय/टॉपिक के मूलभूत बिंदुओं को पकड़ने पर बात हुई है। इससे पाठक भौतिकी के तार्किक प्रश्नों को भी स्टेप-बाय-स्टेप हल करना सीख पाएँगे और आंकिक प्रश्न भी—वे कितने भी नए क्यों न हों—हल कर पाएँगे। साथ ही वे वे तरीके भी सीख/समझ पाएँगे, जिनसे तथ्य, सूत्र या अवधारणा याद रखना और समझना आसान हो।
यह पुस्तक उनको भी मदद करेगी जिन्हें भौतिकी से डर लगता है और उन्हें भी जो भौतिकी से दोस्ती करके, इससे संवाद करके अपने डॉक्टर/वैज्ञानिक या इंजीनियर बनने का सपना पूरा करना चाहते हैं। बायो स्ट्रीम के वे छात्र जो केवल गणित में हाथ तंग होने के चलते फिजिक्स में स्कोर नहीं कर पाते, उनके लिए इस पुस्तक में कुछ सामग्री शामिल करने का प्रयास किया गया है, ताकि डर दोस्ती में तब्दील हो सके।
यह किताब पाठ्यपुस्तक नहीं है और न उसका विकल्प। यह तो एक निर्देशिका है, आपको यह बताने की कि फिजिक्स बेहतर तरीके से कैसे पढ़ सकते हैं। आपके सिलेबस के ही टॉपिक्स, सूत्र, प्रश्न और आंकिक प्रश्नों को आधार बनाकर इस किताब में सवाल भी हैं, लेकिन इतनी संख्या में नहीं कि आपको देखकर ही हिम्मत जुटानी पड़े। जो भी सवाल हैं, उनके स्टेप-बाय-स्टेप हल हैं, पीछे की बारीकियों के साथ जिक्र भी है। इस किताब को इस तरह लिखा गया है ताकि छात्रों को लगे कि बड़ा भाई या बहन या कोई बड़ा, कोई प्यारा शिक्षक पास में बैठकर समझा रहा हो। छात्रों के मन में उठने वाली बहुत सी जिज्ञासाओं और भ्रमों को पहले ही संबोधित किया गया है, ताकि पाठक को ऐसा लगे कि जैसे यह किताब उसी के लिए लिखी गई है।
अगर विस्तार से कहें तो ओके फिजिक्स शृंखला के उद्देश्य में निम्नलिखित समस्याओं/दिक्कतों को संबोधित करने का प्रयास शामिल है—
पुनः इस बात को रेखांकित करता हूँ कि मेरी पुस्तकों का उद्देश्य केवल भौतिकी सीखाना/समझना ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में Analytical and Reasoning-Based Approach विकसित करना है। यह अप्रोच आ जाने पर कोई भी नया टॉपिक समझना और सीखना आसान हो जाता है। इसीलिए बहुत से संख्यात्मक (Numerical) प्रश्नों से पुस्तक भरने के बजाय चुनिंदा प्रश्न शामिल किए गए हैं, लेकिन विस्तृत (स्टेप-बाय-स्टेप) हल के साथ, ताकि समझ स्पष्ट हो सके।
यह पुस्तक पाठ्यक्रम (Curriculum) पूरा कराने के लिए नहीं, बल्कि भौतिकी को समझने (Understanding) के लिए लिखी गई है। विद्यार्थियों में समझ (Comprehension) विकसित करना इसका उद्देश्य है। इसलिए इसमें वही विषय और उदाहरण शामिल किए गए हैं जो विद्यार्थियों की सोचने की क्षमता को विकसित करें और उन्हें नए प्रश्नों को स्वयं हल करने योग्य बनाएँ।
मेरा मानना है कि विश्लेषणात्मक (Analytical) और तर्कपूर्ण (Reasoning-Based) सोच विकसित हो जाने और सही दिशा मिल जाने पर विद्यार्थी काफी कुछ स्वयं भी समझने लगते हैं।
यदि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद विद्यार्थी अपने विद्यालय या प्रतियोगी परीक्षा की किसी भी पुस्तक को अधिक आत्मविश्वास और समझ के साथ पढ़ने लगें, तो यही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी।
मैं अपने उद्देश्य में कितना सफल रहा, यह आप पाठकों की प्रतिक्रिया से ही जान पाऊँगा। आपकी फिजिक्स बेहतर हो, इसी आशा के साथ ढेरों शुभकामनाएँ।
“कोई सवाल हो या हो डाउट, जरूर साझा करें”
ईमेल— KCPHYQA@gmail.com अथवा
वेब— kumarChetna.in/physics

क्या आपको भी दरकार है उन टिप्स की जिनसे आप भौतिकी के साथ सहज हो सकें ताकि इससे डरने के बजाय, इससे दोस्ती कर इसे आसानी से समझ सकें ?
फिर यह किताब आपके लिए है|
यह पुस्तक पाठ्यपुस्तक नहीं है और न ही उसका विकल्प। यह एक सहायक पुस्तक है जो इस प्रयास के साथ लिखी गई है कि आपके लिए भौतिकी को समझना और उसके साथ सहज होना आसान हो सके, ताकि नए प्रश्नों को अप्रोच कर उन्हें हल करना भी आसान हो सके। इससे आप परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकें और भौतिकी को आगे अपने विषय के रूप में लेकर चलने के लिए कॉन्फिडेंट हो सकें।
इस प्रयास के अंतर्गत मैंने अपने उन तरीकों और अप्रोच को साझा किया है, जो मेरी पढ़ाई के दौरान काम आए। साथ ही उन डाउट्स और दिक्कतों पर भी बात की गई है तथा उनके समाधान दिए गए हैं, जिनका सामना अक्सर विद्यार्थी करते हैं।
इस पुस्तक की तुलना पाठ्यपुस्तक से न की जाए। इससे अधिकतम लाभ लेने के लिए इसमें दिए गए उदाहरणों को समझते हुए अपने अंदर एक तार्किक अप्रोच विकसित करें, ताकि वह अप्रोच न केवल उस प्रश्न में, बल्कि अन्य प्रश्नों में भी काम आए।
इस पुस्तक में चुनिंदा उदाहरणों, टॉपिक्स और प्रश्नों के माध्यम से विद्यार्थियों में तार्किक अप्रोच विकसित करने का प्रयास किया गया है। साथ ही कुछ सीमित प्रश्न भी दिए गए हैं, जो उन्हें इस बात के लिए अभ्यस्त करेंगे कि किसी भी पाठ को किस तरह विभिन्न प्रश्न-शृंखलाओं में तोड़कर आसानी से पढ़ा जा सकता है। एक बार यह तरीका आदत में आ गया, तो कितने भी पाठ आसानी से पढ़े और समझे जा सकते हैं।
ज्यादा-से-ज्यादा टॉपिक कवर करने के बजाय, इस पुस्तक में चुनिंदा टॉपिक्स के विभिन्न पहलुओं पर बात करने का प्रयास किया गया है। इससे विद्यार्थियों में वह दृष्टि विकसित हो सके कि वे प्रश्न पढ़ते ही उसमें छिपे इशारे और दिए गए मानों को प्रासंगिक राशियों से जोड़कर देख सकें तथा उसे हल करने के लिए सही सूत्र या कॉन्सेप्ट की पहचान कर सकें। एक बार यह दृष्टि विकसित हो जाए, तो अलग-अलग टॉपिक्स के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। वे भी आसान लगने लगेंगे। जैसे आप देखते होंगे कि कुछ विद्यार्थियों के लिए कोई भी विषय या टॉपिक मुश्किल नहीं लगता — सारा कमाल अप्रोच (तरीके) और एनालिटिकल विजन का होता है।
पुस्तक के साहित्यिक अंश में व्यक्त विचार लेखक के अपने(व्यक्तिगत) विचार हैं, इन्हे किसी(उनके) विभाग या संगठन के विचार न माना जाए| साथ ही पुस्तक के लेखन और प्रकाशन में यथासंभव सावधानी बरती गयी है फिर भी यदि कोई त्रुटि छूट गयी हो तब उस अवस्था में उस त्रुटि के कारण पाठक को होने वाली किसी भी प्रकार की क्षति की ज़िम्मेदारी लेखक या प्रकाशक की नहीं होगी|
विश्वास है कि पुस्तक में जो कुछ भी मैं अपने अध्ययन के तरीकों से शामिल कर सका हूँ, आप उसका अधिकतम लाभ उठाएँगे। क्या नहीं मिला, इसके आक्षेप के बजाय जो कुछ भी आपको दे सका हूँ, उसे सराहेंगे, इस्तेमाल करेंगे और अपने दोस्तों से साझा करेंगे, ताकि वे भी सीखने के अनुभव को बेहतर बना सकें और खुशी से आपसे मुस्कुराकर बात कर सकें।
आपको बहुत कुछ देने का मन है, जो आपके काम आएगा और आपको और अधिक मजबूत तथा कॉन्फिडेंट बनाएगा। लेकिन फिलहाल इतना ही शामिल कर सका हूँ। बाकी फिर कभी — या तो इसी पुस्तक के अगले संस्करण में या किसी अन्य पुस्तक में। तब तक यदि कोई कमी लगे तो लिख भेजें। फिलहाल जो कुछ इस पुस्तक में शामिल किया जा सका है, उसका अधिकतम उपयोग करते हुए अपने सपनों और सीखने की दुनिया में उन्नति करें।
बढ़िया किया जो यह किताब खरीद ली! अब अच्छे से जाना जा सकता है कि विज्ञान की कोई किताब ऐसी भी हो सकती है। चलो, फिर मुलाकात करवाते हैं भौतिकी के अध्यायों से — पहले मुलाकात, फिर बात, फिर कुछ वक्त का साथ और आखिर में दोस्ती।
ठीक है न?
शुभकामनाएं
आपका
लवकुश कुमार



लगभग हर दौर में दो तरह के लेखक रहे हैं—एक वे जो भाषा की अंतिम चमक-दमक और शिल्प पर वर्षों काम करते हैं, और दूसरे वे जो समय की पुकार सुनकर तत्काल बोलते हैं। समाज को दोनों की आवश्यकता होती है।
मेरी पुस्तक "अंतस – ज़रा ठहरिए" पर पिछले कुछ दिनों में अनेक प्रतिक्रियाएँ मिलीं। इन प्रतिक्रियाओं में एक रोचक अंतर दिखाई दिया।
किशोर और युवा पाठकों का एक बड़ा वर्ग कह रहा है—
"सर, यही तो हम ढूँढ़ रहे थे।"
"बहुत से ऐसे सवाल पहली बार पढ़ने को मिले जिन पर हमने कभी सोचा ही नहीं था, या इस तरह से नहीं सोचा था।"
"यह किताब जैसे हमारी पीढ़ी के लिए ही लिखी गई है।"
इन प्रतिक्रियाओं को पढ़कर संतोष होता है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य भी यही था—युवाओं/किशोरों को कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर ले जाना।
लेकिन दूसरी ओर कुछ वरिष्ठ और गंभीर पाठकों ने भाषा, शैली, संपादन, टाइपिंग तथा अभिव्यक्ति की कमियों/विस्तार/गहराई की ओर भी ध्यान दिलाया है। मैं उनका भी उतना ही आभारी हूँ।
वास्तव में, दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए मूल्यवान हैं।
फिर भी, इस अवसर पर मैं अपनी लेखकीय दृष्टि स्पष्ट करना चाहता हूँ।
मैंने यह पुस्तक भाषा का चमत्कार दिखाने के लिए नहीं लिखी।
मैंने यह पुस्तक इसलिए लिखी क्योंकि मुझे लगा कि आज का किशोर और युवा बहुत सारी सूचनाओं के बीच रहकर भी बहुत से बुनियादी प्रश्नों से दूर होता जा रहा है।
मुझे ऐसा लगता है, या कहिए कि मैंने अपनी सीमित दृष्टि में ऐसा देखा है कि:
वह करियर पर बात करता है,
लेकिन जीवन पर कम।
वह सफलता पर चर्चा करता है,
लेकिन संतोष पर नहीं।
वह प्रतियोगिता समझता है,
लेकिन स्वयं को कम समझता है।
वह दुनिया को बदलना चाहता है,
लेकिन अपने भीतर झाँकने का समय नहीं निकाल पाता।
यदि यह पुस्तक उसे थोड़ी देर रुककर सोचने पर विवश करती है, तो मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाता है।
निश्चित रूप से हैं।
मैं यह दावा कभी नहीं करूँगा कि यह एक परिपूर्ण पुस्तक है।
भाषा की सीमाएँ हो सकती हैं।
संपादन में त्रुटियाँ हो सकती हैं।
टाइपिंग की गलतियाँ भी हो सकती हैं।
जो मित्र इन कमियों की ओर संकेत कर रहे हैं, वे वास्तव में मेरी सहायता कर रहे हैं। अगली आवृत्तियों में इन्हें सुधारना मेरी जिम्मेदारी है।
लेकिन मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा—
हर प्रकार की त्रुटि समान महत्व की नहीं होती।
एक त्रुटि भाषा में हो सकती है।
दूसरी त्रुटि समय पर न बोलने की हो सकती है।
मेरे लिए दूसरी त्रुटि अधिक गंभीर है।
मै मानता हूँ कि, समय पर कही गई अपूर्ण बात, देर से कही गई परिपूर्ण बात से अधिक उपयोगी हो सकती है।
दूसरा यदि मेरे द्वारा उठाए गए किसी प्रश्न पर गहराई से नहीं भी लिखा गया तो उसका कारण, एक ही किताब में कई सारे जरूरी प्रश्न शामिल करना था, कहते हैं समझदार के लिए इशारा काफी होता है, वैसे जिज्ञासु पाठक के लिए इच्छित विषय पर गहनता से जानने के लिए वरिष्ठ लेखकों का साहित्य भी मौजूद है, इसी के दृष्टिगत ही तो मैंने पुस्तकों की एक सूची भी दे रखी है मेरी पुस्तक के अंत में|
आज का समय तेजी से बदल रहा है।
बच्चे और युवा प्रतिदिन हजारों संदेशों, वीडियो और विचारों से घिरे हैं।
ऐसे समय में यदि कोई लेखक यह सोचकर वर्षों तक चुप रहे कि अभी भाषा और बेहतर हो जाए, शैली और निखर जाए, प्रत्येक वाक्य पूर्ण हो जाए, तब तक शायद जिन प्रश्नों पर बात करनी थी, वे और अधिक जटिल हो चुके होंगे।
मैं पूर्णता का विरोध नहीं करता।
बल्कि मैं स्वयं उसे पाने की दिशा में उन्मुख हूँ।
लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि जरूरी बात समय पर कही जानी चाहिए।
पूर्णता की यात्रा चलती रह सकती है।
मौन की भरपाई बाद में नहीं हो सकती।
अक्सर हम मान लेते हैं कि लेखक पुस्तक लिखने के बाद पूर्ण हो जाता है।
मेरा अनुभव इससे बिल्कुल अलग है।
मेरे लिए हर पाठक एक शिक्षक है।
कोई भाषा सिखाता है।
कोई विचारों की गहराई दिखाता है।
कोई संपादन की आवश्यकता बताता है।
कोई यह विश्वास दिलाता है कि पुस्तक ने उसके जीवन में कुछ बदल दिया।
इन सभी से मैं सीख रहा हूँ।
तो मेरे लिए यह उपलब्धि किसी भी भाषाई प्रशंसा से कम नहीं है।
साहित्य का अंतिम उद्देश्य केवल भाषा का सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चेतना जगाना भी है।
मैं अपने सभी आलोचकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।
जो कमियाँ बता रहे हैं, वे भी मेरी यात्रा के साथी हैं।
जो पुस्तक के उद्देश्य को समझ रहे हैं, वे भी।
मैं भविष्य में भाषा, शिल्प और संपादन—सभी पर अधिक मेहनत करूँगा।
लेकिन यदि मुझे फिर कभी चुनाव करना पड़े कि एक जरूरी बात आज कहूँ या उसे पूर्ण बनाने के लिए वर्षों तक रोककर रखूँ, तो संभवतः मैं फिर वही करूँगा जो इस पुस्तक के साथ किया—
समय की पुकार को प्राथमिकता दूँगा।
क्योंकि मेरा विश्वास है—
पूर्णता एक सतत यात्रा है, पर समय पर की गई सार्थक अभिव्यक्ति कभी-कभी एक पूरी पीढ़ी की दिशा बदल सकती है।
मैं आलोचना को स्वीकार करता हूँ, सुधार के लिए प्रतिबद्ध हूँ, लेकिन समय पर आवश्यक संवाद को पूर्णता की प्रतीक्षा में स्थगित करना उचित नहीं मानता।
सादर धन्यवाद
लवकुश कुमार
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पुस्तक- अंतस : ज़रा ठहरिए
लेखक- लवकुश कुमार
प्रकाशक- Notion Press
आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में ठहरना लगभग भूल चुके हैं हम। ऐसे समय में "अंतस" एक ऐसी पुस्तक बनकर सामने आती है, जो न सिर्फ हमें रुकने के लिए कहती है साथ ही भीतर झांकने का साहस भी देती है।
इस पुस्तक को पढ़ने से पहले मुझे लगा था कि यह एक सामान्य सेल्फ हेल्प किताब जैसी होगी लेकिन जैसे-जैसे मैं इसके पन्नों में आगे बढ़ता गया। यह अनुभव कहीं अधिक व्यक्तिगत और गहरा होता चला गया। लेखक ने रोज़मर्रा की साधारण लगने वाली घटनाओं के माध्यम से जीवन के बड़े सवालों को बेहद सहजता से उठाया है।
लेखक की सबसे बड़ी ताकत उनकी संवेदनशीलता है। वह किताबों और लेखकों के महत्व को जिस आत्मीयता से प्रस्तुत करते हैं। वह कहीं न कहीं सीधे दिल तक पहुंचती है। पुस्तक में विभिन्न किताबों, फिल्मों और विचारों का ज़िक्र न केवल पाठक की जिज्ञासा बढ़ाता है बल्कि उसकी सोच के दायरे को भी विस्तृत करता है।
इस पुस्तक की एक और खासियत इसके छोटे-छोटे प्रसंग और उद्धरण हैं। जो कम शब्दों में गहरी बात कह जाते हैं। एक जगह लेखक एक चिड़िया का उदाहरण देते हैं जो जंगल में लगी आग को बुझाने के लिए अपनी चोंच में पानी भरकर लाती है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि छोटी-छोटी कोशिशें भी बड़े बदलाव का हिस्सा बन सकती हैं। सिर्फ दर्शक बनकर रहने से बेहतर है कुछ करना।
संक्षेप में -
पुस्तक से कुछ उद्धरण -
" वह हर इंसान सम्मान के योग्य है जो अपना कार्य
ज़िम्मेदारी और ईमानदारी से कर रहा है भले ही आपको उससे कोई
व्यक्तिगत फायदा न हो, इसकी परिणति ऐसे होती है कि सम्मान की
चाह में अन्य लोग भी ज़िम्मेदारी से अपना काम करने को प्रेरित होते हैं"
"अपने संसाधनो / धन / समय का एक हिस्सा परोपकार मे जरूर
लगाएँ, आपकी आय कम हो या ज्यादा उसमे दूसरों के लिए कुछ
कर पाने की गुंजाइश जरूर रखें, ये न हो कि पूरा वक़्त तथाकथित
अपनों के लिए चीजें और सुरक्षा खरीदने मे या उसकी तैयारी में लगा
दिया, एक-एक दिन को सार्थक करें, जिसमे व्यायाम, अध्ययन, और
जरूरतमन्द की मदद जरूर से शामिल हों, आप कितना भी वंचित
महसूस कर लें, ऐसे लोग भी हैं जो आपसे भी ज्यादा वंचित हैं, उनके
लिए कुछ काम करके, एक जरूरी उदाहरण बनें।"
"जब जीवन मे कोई उद्देश्य न दिखे तब एक काम किया जा सकता है,
है, जरूरतमन्द लोगों की निस्वार्थ सेवा, उनमे सबसे ऊपर जिस बात को
मैं रखता हूँ, वह है लोगों को शिक्षित करना, उन्हे लोगों की तकलीफों
को लेकर संवेदित करना, उनकी समझ पर काम करना, उन्हे मेहनत,
उत्कृष्टता और हुनर के लिए तैयार करना, उन तक बड़े बड़े लोगों की
जीवनियाँ और प्रेरक प्रसंग पहुंचाना, उन तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाना"
"सबसे बड़ा पाप अन्याय को देखकर भी चुप रहना है।"
- महात्मा गांधी
"जो इंसान अपनी समझ और आकांक्षाएं साझा नहीं करना चाहता वो
समाज से अपनी सहूलियत की दिशा की अपेक्षा कैसे कर सकता है! बिना
किसी पूर्वाग्रह के और बिना इस बात की चिंता किए कि लोग मेरे बारे में
क्या सोचेंगे बेधड़क होकर अपनी बात रखिए और दूसरों को भी हिम्मत
दीजिए, जो कुछ महसूस कर रहें उसे सामने व्यक्त करने का |
आपका एक लाइन का इनपुट भी मायने रखता है।"
#opinion_matters
"एक उपाय बाहर के प्रभाव को न्यूट्रल करने का, वह है अपने घर मे
अपनी क्षमता में एक पुस्तकालय का निर्माण करना जिसमे देश दुनिया
का उत्कृष्ट साहित्य हो और हो जीवनियाँ दुनिया के महान लोगों की,
जिन्होने आजादी और गरिमा के लिए जीवन भर संघर्ष किया, और
दुनिया को एक बेहतर जगह बनाया, अपने जीवन मे उत्कृष्ट कार्य करके
आनंद प्राप्त किया, ईमानदारी, बहादुरी और करुणा का जीवन जिया,
ताकि बच्चों को जीवन के लिए सही आदर्श मिल सकें |"
उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas
विशाल चन्द @reading_owl.3
https://www.facebook.com/vishal.chandji
https://www.instagram.com/reading_owl.3
विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।

"अंतस - जरा ठहरिए"
लेखक - लवकुश कुमार
प्रकाशक - नोशन (Notion) प्रेस चेन्नई
"अंतस - जरा ठहरिए" लवकुश कुमार जी द्वारा लिखी गई पहली साहित्यिक पुस्तक है,जो हॉल ही में प्रकाशित हुई है।
यह सरल शब्दों में जीवन मूल्यों की तरफ़ पाठक का ध्यान खींचती है। जो बहुत ही संवेदनशील तरीके से लिखी गई है।
जो किसी क्षेत्र या किसी एक विषय के बारे में भले ही आपको पूर्ण ज्ञान न दे सकें। लेकिन आम जीवन में छोटी छोटी चीजों का क्या महत्व है, उस ओर आपको जरा देर खींचकर रोक देती है।
बहुत सामान्य से विषय है,जहां सूक्ष्म चीजों को लेकर उन्होंने अपना लेखन किया है। एक तरह से यह पुस्तक मन में उठते तूफान को शांत कर देती है, खुद के लिए अपराधबोध, समाज के लिए ईर्ष्या,खुद के ही आगे बढ़ने की लालसा को ठहर कर सोचने को कहती है। उनका मुख्य चिंतन समाज के लिए है जो यह कहते हैं कि अपनी एक जिम्मेदारी समाज के लिए भी रखो।अपनी जिंदगी में इतने परेशान रहने की जरूरत नहीं है, किसी जरूरत मंद इंसान की मदद करो वह किसी भी तरह से की जा सकती है। दूसरों की मदद करने से बड़ा कोई सुख नहीं है।
आज जब जिंदगी बहुत तेजी से भाग रही है, आए दिन तरह-तरह की घटनाएं हमें सुनाई देती है, जब मानव सभ्यता को एक अलग दिशा में प्रवाहित किया जा रहा है।मनुष्य के लालच और भोग विलास को ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है, ऐसे में लवकुश जी बहुत से उदाहरण देकर जीवन का उद्देश्य समझाते है।
जब मनुष्य, मनुष्य होने के नाते कुछ न कर पाने के अपराधबोध से खुद को दबाएं हुए है, ऐसे में आज के वातावरण का सूक्ष्म अवलोकन के लिए मानो कोई जगह ही नहीं रह गई है और परिणामतः हम कोई कार्य इसलिए नहीं कर रहे कि उससे हमें आनंद की प्राप्ति हो।
जीवन के मूलभूत पहलुओं में यह किताब एक मनुष्य को स्पष्टता देती है कि अभी कुछ भी नहीं छूटा, एक तसल्ली देती है कि अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा,अगर किसी कारण से पढ़ाई छूट गई या कुछ परिस्थिति बदल गई तो उसका विकल्प फिर से शुरू करना है न कि आत्मघाती कदम उठा लेना|
जीवन की बारीकियों को समझाती हुई यह पुस्तक जीवन की खूबसूरती से पाठक का परिचय कराती है। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह पुस्तक उनके द्वारा दुनिया और स्वयं को देखे और समझे जाने का प्रतिफल है।
यह पुस्तक पाठक के दिमाग में बहुत प्रभाव डालती है। मुझे स्वयं इसे पढ़ते हुए लग रहा था कि हां मुझे भी जरूरत थी इस तरह की पुस्तक की, जो आपको प्रेरित करें, लिखने को ,पढ़ने को अपने विचार खुल कर रखने को,अपनी असहमति दर्ज करने को और सामने वाले की बातों का सम्मान करने के लिए।
- शीतल
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas
फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |
यह मेरी पहली साहित्यिक पुस्तक है, जो मेरे कुछ पुराने और कुछ नए लेखों का संकलन है और साथ ही इसमें शामिल हैं अतिथि लेखकों की कुछ बेहतरीन रचनाएं |
यह पुस्तक समर्पित है "उन सभी साहसी लोगों को जो सच्चाई का साथ देने और उसे अभिव्यक्त करने की जरूरत को सुविधा से ऊपर रखते हैं |"

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“यह एक ऐसी किताब है जो आपका ध्यान उन बातों की ओर ले जाएगी, जो न केवल आपकी दुविधाओं और भ्रम को दूर करेंगी, बल्कि आपको जीवन, दुनिया और स्वयं के बारे में ऐसी स्पष्टता देंगी कि आप एक साहसी और आत्मविश्वासी इंसान बनकर जीवन को बेहतर ढंग से जी सकें।”
मेरा मानना है कि यह पुस्तक विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी जो निर्णय लेने, जीवन को समझने और दुनिया व उसकी व्यवस्थाओं को समझने में दुविधा या कठिनाइयों का सामना करते हैं।
भारत के अग्रणी शैक्षणिक संस्थानों और कार्यालयों में प्राप्त अनुभवों के साथ-साथ एक पाठक, चिंतक और ब्लॉगर के रूप में लेखक का अनुभव और ज्ञान भी पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
इस पुस्तक में कई विषयों पर समझ को विस्तार देने एवं जरुरी मुद्दों की तरफ ध्यान देते हेतु निम्नलिखित विषयों पर लेख शामिल हैं :
पढ़ने लिखने की संस्कृति पर
आवश्यकता
लेखक के बारे में
स्वीकारोक्ति
प्रस्तावना
भूमिका
पावती (स्वीकृति)
साहित्य और मानविकी अत्यंत जरूरी
मुद्दे और विषय जिन्हे संबोधित करने का प्रयास किया
1.
कार्य को सम्मान और जरूरी श्रेय
2.
कार्य को व्यवहार से ऊपर रखना
3.
आपसी सम्मान की नींव
4.
अभिव्यक्ति के लिए माहौल
5.
शरीर नहीं, कार्य से हो आंकलन और उससे भी पहले मानव
होने की गरिमा
6.
हमारे आदर्श और युवा
7.
क्या हमारे अंदर कोई तानाशाह है ?
8.
ईमानदारी की रक्षा
9.
लिखना, अपना पक्ष रखना, सही बात को आगे बढ़ाना जरूरी
क्यों: एक सोंच
10.
लिखने के फायदे- एक संक्षिप्त समीक्षा
11.
साहित्य जरूरी क्यों?
12.
दोहराव - एक लघुकथा
13.
सड़क हादसों पर एक लघुकथा - थ्रिल
14.
उपदेशक, जरूरत जाँचें
15.
गलतियाँ और तिरस्कार
16.
नवाचार का माहौल
17.
क्या देर हो गयी ? जीवन अर्थहीन लग रहा ?
18.
जीवन में कुछ अच्छा करना चाहते हैं? तरीका ?
19.
मधुरिमा, चेतन और करप्सन - एक लघुकथा
20.
पड़ोसी की दिक्कत आपकी दिक्कत बन सकती है
21.
मेरे सपनों की दुनिया
22.
अपनी बात या अनुभव लिखने/कहने मे संकोच?
23.
कितनों को प्रोत्साहित किया आपने ? और आपको ?
24.
प्रशंसा एक टॉनिक
25.
कठिन परिस्थितियों में चीजों की परीक्षा
26.
युवाओं द्वारा आत्महत्या ! एक पड़ताल, एक नजरिया
27.
सम्यक जीवन और प्राथमिकताएं -1
28.
सम्यक जीवन और प्राथमिकताएं -2
29.
सम्यक जीवन और प्राथमिकताएं -3
30.
सम्यक जीवन और प्राथमिकताएं -4
31.
अध्ययन को लेकर रुझान, बात अंदर की
32.
दूसरों की परवाह या खुद को आराम
33.
मानव व्यवहार और समाज
34.
जिम्मेदारी और जवाबदेही का भाव
35.
Hatsapp स्टेटस
36.
दो टूक और वन लाइनर
37.
नाम में क्या रखा है ! वाकई ?
38.
जिंदगी को अर्थ और एडवेंचर देना चाहते हो- एक विकल्प
39.
ठसक वाला जीवन एक समाज सेवा
40.
सच बोलने वाले लोग कम क्यों दिखते हैं ?
41.
सुकून के पल और सृजन
42.
सियाटिका- एक लघुकथा
43.
पिता – एक लघुकथा
44.
केवल आप ही सही !
45.
केवल मीठा सुनने की आदत है ?
46.
अपनी बात समझना
47.
सड़क दुर्घटना
48.
वादा
49.
कुछ अन्य सवाल
50.
पढ़ने की संस्कृति का अभाव
51.
पुरस्कार न लेने का निर्णय
52.
अंतस से सवाल करती कविताएं
53.
बाल विज्ञान खोजशाला
कुछ बेहतरीन पुस्तकें
कुछ बेहतरीन फिल्में
कुछ बेहतरीन कविताएं
उद्धरण - डॉ विजय अग्रवाल
उद्धरण - शिक्षा के सवाल
उक्तियाँ - आचार्य प्रशांत
स्पष्टता और समझ के लिए उक्तियाँ
पुस्तक की शुरुआत होती है - कवि भवानी प्रसाद मिश्र एवं - कवि महेश चन्द्र पुनेठा की कविताओं से जो क्रमशः इस प्रकार हैं
कुछ लिख के सो,
कुछ पढ़ के सो,
तू जिस जगह जागा सवेरे,
उस जगह से बढ़ के सो
- कवि भवानी प्रसाद मिश्र
मैं न लिख पाऊँ एक अच्छी कविता
दुनिया एक इंच इधर से उधर नहीं होगी
गर मैं न जी पाऊँ कविता
दुनिया में अंधेरा कुछ और बढ़ जाएगा
इसलिए मेरी पहली कोशिश है
कि मरने न पाए मेरे भीतर की कविता।
- कवि महेश चन्द्र पुनेठा
देखते हैं
भूमिका
"चाहत है तो उस चाहत को पूरा करने के लिए माहौल
बनाने पर भी काम करना होगा|"
हम सब चाहते हैं ऐसा समाज जिसमे
लोग अपना काम बहुत अच्छे से कर रहे हों
लोग अपने काम से काम रखते हों और एक दूसरे को
परेशान न करते हों
सड़कों पर लोग नियम से चल रहे हों, दुर्घटनाएँ कम से
कम हों
सभी अपना काम ईमानदारी से कर रहे हों
लोग अपने वादों पर खरे उतरते हों
लोग किसी को उसकी जाति, समुदाय, वंश, शारीरिक
सुंदरता से न पहचान उसे उसके काम से पहचानते हों
अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का अवसर सबको मिलता
हो
लोग नयी जगह भी सुरक्षित महसूस करते हों
लोग एक दूसरे से सलीके से और प्रेम के साथ पेश आयें
लोग अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें
लोग अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग न करें
लोग कमजोर पर हसने के बजाय उनके साथ करुणा का
बर्ताव करें
तकलीफ मे फंसे इंसान को यथासंभव मदद मिले नाकि
लोग खड़े होकर बस वीडियो बनाएँ
काम करने वाले को काम का श्रेय दें नकि चापलूसी करने
वाले और बातें बनाने वालों को
सबको उनके हिस्से का श्रेय और प्रतिष्ठा मिले
हिंसा का स्थान न हो, लोगों को आजादी हो "न" कहने की
स्वतन्त्रता हो जबरदस्ती नहीं, सबसे उनका पक्ष या
अनुभव सुना जाए
साझा हितों के कार्यक्रमों मे सभी साझेदारों से उनकी राय
जानी जाये और उसे उचित स्थान भी दिया जाए
शिक्षकों का उचित सम्मान हो
लोग एक दूसरे का आंकलन सतही बातों पर न करें
अपराध कम से कम हों
मजबूत द्वारा कमजोर का शोषण न हो
भेदभाव न हो, परिवारवाद न हो
ज्यादा से ज्यादा लोगों में अपनी गलती स्वीकार करने का
और ज़िम्मेदारी लेने का साहस हो
इत्यादि
आइए देखते हैं कि क्या दिक्कतें हैं कि कई जगहों पर ऐसा
नहीं हो पा रहा और ठहरकर अवलोकन करें कि कहीं हम
स्वयं ही तो अंजाने मे गलत उदाहरण पेश कर उस माहौल को
बिगाड़ रहे हैं, जिसमे जरूरी मानवीय मूल्य फलते फूलते हैं |
स्वयं मे झाँकने का प्रयास, प्रयास विरोधाभासों को
पकड़ने का, अगर दिक्कत को हल करना है तो पहले उसे
समझिए|
भूमिका से एक अनुमान लग सकता है पुस्तक की सामग्री का, अब देखते हैं कुछ लेख जो इसकी भाषा शैली का कलेवर प्रदान करेंगे :
कार्य को व्यवहार से ऊपर रखना
“नम्र व्यवहार और ईमानदार कार्य किसी भी व्यक्ति को
सम्मान दिलाते हैं।”
— डेल कार्नेगी
लोगों से बात करते वक़्त आपको सुनने को मिल सकता है
कि मैंने काम खूब किया लेकिन श्रेय नहीं मिला, श्रेय तो
अमुक इंसान को मिल गया क्योंकि वो अमुक, साहब/रिश्तेदार
के हाँ मे हाँ मिलाते रहता हैं उनका मनोरंजन किया करता है!
आइए कुछ चीजों पर गौर करते हैं: यदि इसे पिछले
अध्याय से जोड़ें तो हम पाएंगे कि जब इंसान कर्म को उचित
स्थान नही देता अपने जीवन मे, तो वह कर्म करने वाले को
कैसे उसका श्रेय दे सकता है ? दूसरा अगर कोई इंसान
चापलूसी पसंद है, उसे हर वक्त अपने आस पास चापलूसों की
भीड़ चाहिए हो जो उसके अहम को पुष्ट कर उसका मनोरंजन
कर सकें, फिर ऐसे इंसान के लिए अपने चापलूसों को नाराज
कर पाना संभव नही हो पाता, क्योंकि वह उनकी
अनुपस्थिति मे खुद को महत्वहीन और अकेला महसूस करता
है, इसीलिए वह इस भावनात्मक दबाव कि कहीं वह अकेला
न पड़ जाए, किसी के कार्य का श्रेय किसी और को दे देता है |
एक और कारण हो सकता है की कार्य कि गुणवत्ता का
आंकलन कर पाने कि क्षमता का न होना, नतीजतन ऐसे लोग
व्यवहार के आधार पर लोगों का मूल्यांकन करते हैं और यह
भूल जाते हैं कि जो इंसान खूब काम करता हो, उसके लिए
अपने व्यवहार को संयत रखना या मीठी मीठी बातें करना
अपेक्षाकृत मुश्किल होता है, उन लोगों की अपेक्षा जिनकी
दिनचर्या का अधिकतम वक़्त ही मन बहलाने वाली और
टाइम पास बातें करना होता है|
अगर इसकी तह तक जाएँ तो मेरे ध्यान मे दो बातें आती
हैं पहला कि कार्य को और उसकी गुणवत्ता को जीवन मे
उचित स्थान मिले और दूसरा
कार्य पहले और व्यवहार बाद
में का उसूल आपके पास कोई और उपाय हो तो लिख भेजें
काम स्वयं मे पुरस्कार है, नकि पुरस्कार पाने का रास्ता
- डॉ विजय अग्रवाल
अभिव्यक्ति के लिए माहौल
असहमति से असुरक्षा की भावना पैदा होती है, लेकिन
इसे व्यक्त करना जरूरी ताकि इस बार बात हो सके और
एकमत होने की संभावनाओं पर विचार भी |
किसी काम को करने मे कितनी सहजता होगी यह इस
बात पर निर्भर करता है कि काम करने वाला व्यक्ति किस हद
तक उस काम के पीछे के तर्क से सहमत है, यदि कोई
असहमति है तो असहजता भी होगी और उसका प्रतिकूल
प्रभाव कार्य की गुणवत्ता पर पड़ेगा, इसीलिए जरूरी है हम
उस इंसान की असहमति, दिक्कतों को सुनें, उसे अपनी बात,
दृष्टि, समझ और मत को अभिव्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित
करें, और जब वह अपनी बात रख रहा हो तो उसे बिना बीच
मे टोंके, उसकी पूरी बात सुने और जहां पर आप असहमत हों
वहाँ विनम्रतापूर्वक उस असहमति को दर्ज करने और सामने
वाले व्यक्ति से अपनी बात फिर से समझाने का आग्रह करें
और उसकी बातों को उसकी पृष्ठभूमि से जोड़कर समझने का
प्रयास करें, खुद को उसकी जगह रखकर सोंचे|
अभिव्यक्ति का माहौल तब ही बनता है जब हम सामने
वाले इंसान की बातों को इत्मीनान से सुनें और बिना किसी
पूर्वाग्रह के उसकी भावनाओं की कद्र करते हुये, उस इंसान
पर बिना कोई लेबल लगाए, बात की जड़ मे जाकर उससे
अपनेपन के साथ बात करते हैं |
असहमति से असुरक्षा की भावना पैदा होती है अतः इस
पर बात करें और इस बात का ध्यान रखें कि दो लोग साथ
क्यों हैं, माने वो साझा हित क्या हैं या फिर जिन बिन्दुओं पर
पहले ही सहमति है उनका महत्व क्या है आपके जीवन में,
इस तरह असहमतियों पर बात करना सहज होगा|
एक बात और जोड़ना चाहूँगा कि अगर हमे किसी का
सहयोग चाहिए तो उसकी बात और नजरिए को भी उचित
स्थान देना जरूरी है, यदि हमने उसकी बात को सिरे से नकार
दिया तब तो उसे यही लगेगा कि वो उस काम मे हितधारक
ही नहीं, इसीलिए चर्चा जरूरी है
और जब सारे संशय दूर होते हैं तो कार्य हो या उस इंसान
का साथ, हमे पूरा मिलता है और इससे जन्म होता है सुरक्षा
की भावना का|
“जहाँ सम्मान होता है, वहाँ विश्वास भी जन्म लेता है।”
— महात्मा गांधी
आशा है कि पुस्तक अपने अभीष्ट उद्देश्य को पाए, मैं अपने प्रयास में कितना सफल रहा, यह आपकी प्रतिक्रिया से ही पता चलेगा, इंतज़ार रहेगा|
आपका लवकुश
ईमेल आई डी - lovekush@iitdalumni.com
Lovekushchetna@gmail.com
It is a matter of great happiness for me that the book I have been working on for so many months will soon be available to students. Before that, I am presenting an excerpt from the main book to all of you for introduction and your feedback. Please be sure to send your response by email at: KCPHYQA@GMAIL.COM
A name that is in accordance with its purpose:

The author’s introduction is necessary and also relevant for the evaluation of the book’s content.

Why should this book be purchased, and how can it be different from other books? A few points on this:

Since this book is for students, some of the problems faced by students that have been addressed are:


Some reasons that made it necessary to write this book:


Some examples of "step by step solution" from the book


Five point SOP

• To obtain the main book, please fill out the “Pre-booking of Book” query form on the website (Lovekushchetna.in).
• No one can make you feel inferior without your consent.
— E. Roosevelt
• Best wishes in abundance — towards excellence through practice.
• If you have any doubts, please write to KCPHYQA@gmail.com
A phone recharge may last for a month, but a book can last for many years.
Many younger brothers and sisters can read it, and there is no time restriction.
No matter how many times a student reads it, unlike a mobile phone, it does not strain the eyes.
Moreover it does not suggest advertisements or unnecessary short videos.
Please do let me know how well the book lives up to its objectives. Before that, kindly book your copy or submit a demand through your nearest book seller (please fill in the address form for the book - https://kumarchetna.in/pre-booking.php).
Best wishes
Yours,
Lovekush Kumar
The objective is to provide students with solutions to their challenges and mistakes, enabling them to achieve a better understanding of physics and achieve good scores to fulfill their dreams.
Best wishes
- Lovekush Kumar

उद्देश्य - विद्यार्थियों को आने वाली दिक्कतों और उनसे होने वाली चूक के उपाय के तौर पर ताकि वह भौतिकी की बेहतर समझ के साथ अच्छा स्कोर करके अपने सपनों को पंख दे सकें |
शुभकामनाएँ
- लवकुश कुमार

The objective is to provide students with solutions to their challenges and mistakes, enabling them to achieve a better understanding of physics and achieve good scores to fulfill their dreams.
Best wishes
- Lovekush Kumar
उद्देश्य - विद्यार्थियों को आने वाली दिक्कतों और उनसे होने वाली चूक के उपाय के तौर पर ताकि वह भौतिकी की बेहतर समझ के साथ अच्छा स्कोर करके अपने सपनों को पंख दे सकें |
शुभकामनाएँ
- लवकुश कुमार