
बच्चों का ध्यान कक्षा में कैसे लगाया जाए?
क्या विज्ञान केवल अंकों और परीक्षाओं का विषय है?
क्या बिना महँगी प्रयोगशाला के भी विज्ञान रोचक बनाया जा सकता है?
क्या हम बच्चों को उत्तर याद करवाने के बजाय प्रश्न पूछना सिखा रहे हैं?
क्या आज की शिक्षा बच्चों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार कर रही है?
यदि इन प्रश्नों ने कभी आपको भी परेशान किया है, तो उत्तराखंड में 12 मई से 1 जून 2026 तक चली यह विज्ञान यात्रा आपके लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है।

देश के सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी, पद्मश्री सम्मानित शिक्षाविद एवं आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर डॉ. हरीश चंद्र वर्मा (एचसीवी सर) ने अपने वैज्ञानिक जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर "साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी" और "सोपान आश्रम" के सहयोग से उत्तराखंड के छह जिलों में 21 दिवसीय विज्ञान यात्रा का नेतृत्व किया।
इस यात्रा का नाम था—
12 मई से प्रारम्भ हुई यह यात्रा विभिन्न विद्यालयों, डीआईईटी संस्थानों और शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्रों से होती हुई 27 मई से 1 जून तक आयोजित छह दिवसीय राष्ट्रीय आवासीय कार्यशाला (NWUPT 2026) के साथ सम्पन्न हुई।
इस दौरान—
480 से अधिक भौतिक विज्ञान शिक्षक
208 शिक्षक प्रशिक्षक
410 शिक्षक प्रशिक्षु
3000 से अधिक विद्यार्थी
प्रत्यक्ष रूप से इस अभियान से जुड़े।

आज अधिकांश शिक्षक एक समान चुनौती का सामना कर रहे हैं—
बच्चे सुनते कम हैं, प्रश्न कम पूछते हैं, विज्ञान को कठिन मानते हैं और परीक्षा के बाद अधिकांश बातें भूल जाते हैं।
दूसरी ओर समाज बच्चों से लगातार अधिक अंक, अधिक प्रतिस्पर्धा और अधिक उपलब्धियों की अपेक्षा करता है।
परन्तु एचसीवी सर का प्रश्न अलग था—
"क्या हम बच्चों को सोचने के लिए तैयार कर रहे हैं?"
यात्रा का मूल उद्देश्य बच्चों और शिक्षकों में वैज्ञानिक चेतना, स्वतंत्र सोच, अवलोकन क्षमता, तार्किक विश्लेषण और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करना था।

इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी भी सत्र की शुरुआत सूत्रों या परिभाषाओं से नहीं हुई।
शुरुआत हुई—
नाम पूछने से
मुस्कुराने से
पहेली से
अवलोकन से
और छोटे-छोटे सवालों से
उदाहरण के लिए—
"धागा किस रंग का है?"
"अंधेरे में कैसा दिखाई देगा?"
"काला धागा कभी लाल दिखता है क्या?"
"हम स्कूल पढ़ने आते हैं या खेलने भी?"
ऐसे सरल प्रश्न बच्चों को चर्चा में शामिल कर लेते थे।
शिक्षकों ने अनुभव किया कि बच्चों से संवाद स्थापित करना किसी भी शिक्षण प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
कार्यशालाओं में बार-बार यह दिखाई दिया कि किसी भी अवधारणा को सीधे बताने के बजाय पहले एक ऐसी स्थिति बनाई जाती थी जिससे बच्चे चौंक जाएँ।
यानी—
पहले जिज्ञासा, फिर प्रयोग, फिर चर्चा और अंत में निष्कर्ष।
एचसीवी सर बार-बार कहते रहे—
"Attention create करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।"
यही कारण था कि कई घंटे चलने वाले सत्रों में भी बच्चों और शिक्षकों का ध्यान बना रहा।

यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष था कि अधिकांश प्रयोग अत्यंत सामान्य वस्तुओं से किए गए—
डेटॉल की खाली बोतल
प्लास्टिक डिब्बा
रिंग चुंबक
सिरिंज
कागज
लेजर पॉइंटर
पानी का गिलास
गुब्बारा
सिक्का
इनसे अपवर्तन, वायुदाब, जड़त्व, बल, परावर्तन, मृगमरीचिका, बॉयल का नियम, ऊर्जा तथा प्रकाश जैसी अवधारणाएँ समझाई गईं।
इससे शिक्षकों को यह संदेश मिला कि विज्ञान पढ़ाने के लिए महँगी प्रयोगशालाएँ अनिवार्य नहीं हैं।
कार्यशाला में बार-बार एक बात दोहराई गई—
"नई परिस्थितियों के लिए बच्चों को तैयार करना है तो उनमें स्वतंत्र सोच विकसित करनी होगी।"
बच्चों को उत्तर देना नहीं, उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना आवश्यक है।
प्रयोग के बाद 15-20 मिनट की खुली चर्चा इसी उद्देश्य से होती थी।
कई बार एक ही प्रयोग के अलग-अलग उत्तर सामने आते थे।
यहीं से बच्चों को समझ आता था कि विज्ञान रटने की नहीं, सोचने की प्रक्रिया है।
शिक्षकों के अनुभवों से कुछ प्रमुख निष्कर्ष सामने आए—
छोटे प्रश्नों और गतिविधियों से।
उनके अनुभवों और परिवेश से।
अवलोकन, तर्क और प्रयोग के संयोजन से।
स्थानीय और बेकार पड़ी वस्तुओं के उपयोग से।
ऐसा वातावरण बनाकर जहाँ गलत उत्तर देने का भय न हो।
यह यात्रा केवल भौतिकी तक सीमित नहीं रही।
इसने समाज, पर्यावरण और जीवन मूल्यों पर भी चर्चा की।
डायट अल्मोड़ा और डायट बागेश्वर में एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक पर रोक लगाने की घोषणा की गई।
सभी प्रतिभागियों ने अपने बर्तन स्वयं धोए।
यह संदेश था—
श्रम का सम्मान भी शिक्षा का हिस्सा है।
एचसीवी सर बार-बार इस बात पर जोर देते रहे कि विज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल तकनीक बनाना नहीं, बल्कि समाज की सेवा करना है।
उन्होंने कहा—
"धरती मेरी है, तो इसे बचाने की जिम्मेदारी भी मेरी है।"
यात्रा में पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, हिमालय संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषय भी समान रूप से शामिल रहे।
कार्यशालाओं के दौरान राष्ट्रीय प्रयोगात्मक परीक्षा NAEST (National Anveshika Experimental Skill Test) की भी चर्चा हुई।
यह भारत की एक अनूठी परीक्षा है—
9वीं से MSc तक सभी के लिए एक ही प्रश्नपत्र
घर पर प्रयोग
स्वयं रीडिंग लेना
मौलिक सोच पर आधारित मूल्यांकन
चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम में तीन दिन का प्रशिक्षण
50,000 रुपये तक की छात्रवृत्ति
यह परीक्षा इस विचार को मजबूत करती है कि विज्ञान का वास्तविक मूल्य प्रयोग और जिज्ञासा में है, न कि केवल अंकों में।


27 मई से 1 जून तक आयोजित National Workshop for Utsahi Physics Teachers (NWUPT 2026) इस पूरी यात्रा का शिखर बिंदु रही।
देश भर से आए चुनिंदा शिक्षकों ने छह दिनों तक प्रयोग, चर्चा, चिंतन और नवाचार के माध्यम से विज्ञान शिक्षण के नए आयामों पर कार्य किया।
सोपान आश्रम द्वारा आयोजित यह 23वीं राष्ट्रीय कार्यशाला थी।
क्योंकि इसने शिक्षकों को याद दिलाया—
विज्ञान सूत्रों से पहले सवाल है।
प्रयोगशाला भवन नहीं, सोच है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक नहीं है।
सीखना आनंददायक होना चाहिए।
बच्चों को उत्तर नहीं, खोज की प्रक्रिया देनी चाहिए।
वैज्ञानिक चेतना लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद है।
विज्ञान उत्तर याद करने का नहीं, प्रश्न पूछने का विषय है।
जिज्ञासा सीखने का सबसे बड़ा ईंधन है।
कक्षा की शुरुआत सरल और उत्तर देने योग्य प्रश्नों से होनी चाहिए।
बच्चों का ध्यान आकर्षित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।
Puzzle Method विद्यार्थियों को सक्रिय बनाती है।
वैज्ञानिक चेतना अवलोकन से शुरू होती है।
हर प्रयोग के पीछे "क्यों?" सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सीखने की प्रक्रिया परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण है।
कम लागत की सामग्री भी उत्कृष्ट प्रयोगशाला बन सकती है।
विज्ञान को जीवन से जोड़ना जरूरी है।
बच्चे तब बेहतर सीखते हैं जब वे चर्चा का हिस्सा बनते हैं।
स्वतंत्र सोच भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण क्षमता है।
प्रयोग डर को कम करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।
प्रश्न पूछने वाला वातावरण रचनात्मकता को जन्म देता है।
विज्ञान का उद्देश्य केवल परीक्षा नहीं, जीवन को समझना है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामाजिक समस्याओं को समझने में भी मदद करता है।
पर्यावरण संरक्षण भी वैज्ञानिक चेतना का हिस्सा है।
शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर दे तो कक्षा भी ठहर जाती है।
समान परिस्थितियों में भी परिणामों की जांच आवश्यक है।
सीखना आनंददायक होना चाहिए।
बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना।
"विज्ञान केवल सिद्धांत नहीं है। प्रयोगों के माध्यम से किसी विचार को परखना ही वास्तविक विज्ञान है।"
"जब मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है, तब वास्तविक सीख शुरू होती है।"
"Puzzle Method बच्चों को केवल सुनने वाला नहीं, सोचने वाला बनाती है।"
"भौतिकी को संगीत से जोड़कर देखने का नया दृष्टिकोण मिला।"
कल्पना कीजिए—
कक्षा 9 से लेकर MSc तक के विद्यार्थियों के लिए एक ही प्रश्नपत्र।
घर पर प्रयोग करने की स्वतंत्रता।
स्वयं उपकरण बनाना।
स्वयं रीडिंग लेना।
कोई कोचिंग नहीं।
कोई रटंत नहीं।
यही है National Anveshika Experimental Skill Test (NAEST)।
इस अनूठी परीक्षा का उद्देश्य प्रतिभा नहीं, जिज्ञासा को पहचानना है। चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम, कानपुर में पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा के सानिध्य में कार्य करने का अवसर भी मिलता है।
इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि विज्ञान की चर्चा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही।
प्लास्टिक और डिस्पोज़ल के प्रयोग पर रोक
सभी प्रतिभागियों द्वारा स्वयं अपने बर्तन धोना
श्रम के सम्मान का संदेश
VIP संस्कृति को चुनौती
पर्यावरण संरक्षण की प्रतिज्ञा
यह बताता है कि वैज्ञानिक चेतना केवल भौतिकी नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी है।
उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके द्वारा उठाए गए प्रश्न अभी भी हमारे सामने हैं—
क्या हमारी कक्षाएँ बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित कर रही हैं?
क्या हम विज्ञान को जीवन से जोड़ पा रहे हैं?
क्या हम बच्चों में स्वतंत्र सोच विकसित कर रहे हैं?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तो यह यात्रा अपने उद्देश्य में सफल कही जाएगी।
क्योंकि अंततः—
"विज्ञान का सबसे बड़ा प्रयोग मानव मस्तिष्क है, और शिक्षा का सबसे बड़ा लक्ष्य उसे स्वतंत्र रूप से सोचने योग्य बनाना है।"
उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 केवल कार्यशालाओं की श्रृंखला नहीं थी।
यह एक विचार था।
एक निमंत्रण था।
एक आग्रह था कि हम अपने विद्यालयों में ऐसी कक्षाएँ बनाएं जहाँ बच्चे केवल पढ़ें नहीं, सोचें; केवल सुनें नहीं, प्रश्न पूछें; केवल अंक न जुटाएँ, बल्कि जीवन को समझें।
यदि इस यात्रा से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश एक वाक्य में कहा जाए, तो शायद वह यह होगा—
"बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें प्रश्न पूछना सिखाना।"
और संभवतः यही वैज्ञानिक चेतना की पहली सीढ़ी है।
हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, बातें की जाती हैं पर एक समय तक एक ऐसा समूह जिसे न स्त्री माना जाता है न पुरुष अर्थात् किन्नर उनके विषय में उस स्तर पर न समाज में कुछ बात हुयी और न ही कानून में।
हमें संविधान में समानता का अधिकार दिया गया पर ये कैसी समानता थी जिसमें एक दौर तक पूरे एक तबके को डेथ सर्टिफिकेट लेने के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ा|
गौरी सावंत जी के जीवन पर बनी फिल्म ताली संवेदनाओं और जोश का अद्भुत मिश्रण है। कैसे एक किन्नर अपनी कम्युनिटी के लिए लड़ती है। जिसे अपने घर से निकलना पड़ता है क्योंकि उसके पिता उसकी अलग पहचान को समाज के सामने स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।
गणेश जिसे पता था कि गौरी बनने का सफर कितना दर्द देने वाला हो सकता है फिर भी उसने यह सफर तय किया। खाने के लिए और रहने के लिए संघर्ष किया।
अपनी कम्युनिटी में पूरी तरह उसे अपना समझा जाने लगे इसके लिए उसने जान जोखिम में डालकर ऑपरेशन कराया। फिर उसकी ही कम्युनिटी का एक मेंबर उसकी जान लेना चाहता था क्योंकि वो एक शिक्षिका बन गई थी।
गौरी जी ने किन्नर समुदाय के लिए ही नहीं काम नहीं किया, बल्कि वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के बच्चों को भी अपना माना। गणेश को गौरी बनना था क्योंकि उसे माँ बनना अच्छा लगता था।
गौरी जी कहती हैं कि इस देश में यशोदा की बहुत जरूरत है। उन्होंने शिक्षा भी ली और शिक्षिका भी बनीं।
शिक्षिका बनने तक का सफर भी आसान नहीं रहा होगा। वो ऐसी शिक्षिका बनी कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा इन्हें सम्मानित किया गया। उनकी एक दोस्त की जान जाने पर शरीर को नीचे रखने पर उन्होंने धरना प्रदर्शन कर दिया | साम-दाम-दण्ड की नीति के द्वारा उनको पूरा सम्मान दिलाया।
सुप्रीम कोर्ट में अपनी कम्युनिटी को तीसरे लिंग की पहचान दिलाई।
उन्होंने राह के काले पत्थरों या मुँह पर पड़ी काली स्याही से रुकना सीखा ही नहीं था। इसीलिए तो चाहे अपनों का साथ छूटना हो या इस समुदाय के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का पता चलना हो, ऑपरेशन के लिए जान जोखिम में डालना हो या अपने ही लोगों द्वारा मारने कोशिश, उन्होंने रुकना नहीं आगे बढ़ना स्वीकार किया।
ताली बजाना नहीं, बजवाना स्वीकार किया।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
प्रस्तुत है, कवयित्री सौम्या जी की एक कविता, जो महिलाओं की बदलते हुए सामाजिक भूमिकाओं के बारे में है। यह प्रश्न उठाती है कि क्या समाज इस बदलाव के लिए तैयार है, और यह परंपरागत मान्यताओं और पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं पर भी सवाल उठाती है।
मैंने सुना है एक प्रश्न जिसमें पूछा जाता है
कि जब आज स्त्रियां बदल रही हैं,
वो अब दूसरों से पहले स्वयं को चुन रही हैं
वो अब रसोईघर से पहले अपने अन्य हुनर को चुन रही हैं
अब वो खुद का अलग अस्तित्व भी ढूंढ रही हैं
बेबाक होकर बोल रही हैं, खेल रही है, उड़ भी रही हैं
क्या समाज इस परिवर्तन के लिए तैयार है?
तो मुझे ऐसा लगता है, कि नहीं
समाज का एक वर्ग आज भी इस परिवर्तन को नहीं देखना चाहता
वह चाहता है वही पुरानी रुढियों में लिपटी स्त्री
जिसके मुंह में न जुबान हो और न दिमाग़ में अपने कोई विचार
पिता, पति और पुत्र पर निर्भर स्त्री
जो एक कदम भी बिना किसी के सहारे के न चल सके
जो हमेशा चले पुरुषों से एक कदम पीछे
जो समर्पित कर दे अपने जीवन का एक-एक पल
पुरुषों के लिए
चाहे वह पुरुष दो पल भी न निकाल सके औरत के लिए
चाहे वह पुरुष, औरत का सम्मान भी करना न जानता हो
पर पुरुषों को आज भी चाहिए गूंगी गुड़िया|
-सौम्या
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
आइए कुछ प्रश्नों के माध्यम से कविता के निहित अर्थ को अच्छे से समझने का प्रयास करते हैं:
इस कविता में महिलाओं के विषय में क्या विचार व्यक्त किए गए हैं?
इस कविता में महिलाओं के बदलते सामाजिक भूमिकाओं और स्वतंत्रता की खोज पर विचार व्यक्त किए गए हैं। यह उन पुरानी परंपराओं पर सवाल उठाता है जो महिलाओं को पुरुषों पर निर्भर रहने और खुद को सीमित करने के लिए मजबूर करती हैं। कविता में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि समाज इस बदलाव के लिए तैयार नहीं है और अब भी कुछ लोग महिलाओं को पुरानी रूढ़ियों में देखना चाहते हैं।
इस कविता में समाज के प्रति क्या सवाल उठाया गया है?
इस कविता में समाज से यह सवाल पूछा गया है कि क्या वह महिलाओं के इस बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार है। यह सवाल समाज की मानसिकता और महिलाओं के प्रति उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश डालता है। कविता में इस बात पर जोर दिया गया है कि समाज का एक वर्ग अब भी महिलाओं को पुरानी भूमिकाओं में देखना चाहता है, जो उनके विकास और स्वतंत्रता में बाधा डालता है।
कवयित्री महिलाओं के लिए किस प्रकार की स्वतंत्रता की वकालत करती है?
कवयित्री महिलाओं के लिए एक ऐसी स्वतंत्रता की वकालत करती है जिसमें वे अपनी पसंद खुद कर सकें, अपने काम को चुन सकें, और एक अलग अस्तित्व ढूंढ सकें। यह स्वतंत्रता उन्हें बेबाक होकर बोलने, खेलने और उड़ने का अधिकार देती है, जिसका अर्थ है कि वे बिना किसी डर के अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा कर सकें।
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यह लेख पढ़ते समय यदि आपको असहजता महसूस हो, तो यह असहजता व्यर्थ नहीं है, यह वही बेचैनी है, जो तब होती है जब कोई हमें आईना दिखा देता है।
हम अक्सर समाज, व्यवस्था और लोगों को दोष देते हैं, पर यह देखने से बचते हैं कि कहीं हम स्वयं ही उस गलत का हिस्सा तो नहीं बन रहे, जिसका रोना रोज़ रोते हैं।दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो वही पढ़ते हैं जो उन्हें सोचने से बचाए, वही सुनते हैं जो उन्हें हँसाकर टाल दे और वही देखते हैं जो उन्हें ज़िम्मेदारी से दूर रखे। फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि समाज बदल जाए, विचार ऊँचे हो जाएँ और लोग ईमानदार बन जाएँ। यह कैसी उम्मीद है, जो गलत को ताकत देकर सही से की जाती है?
जो लोग सच बोलते हैं, कठिन सवाल उठाते हैं और हमारी सुविधाजनक सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। उन्हें उबाऊ, नकारात्मक या अव्यावहारिक कहकर किनारे कर दिया जाता है, पर जो लोग हमें बहलाते हैं, हमारी सोच को सुन्न करते हैं और भीड़ के स्वाद के अनुसार परोसते हैं, उन्हें हम सर आँखों पर बिठा लेते हैं। क्या यह चयन हमारी मानसिकता को उजागर नहीं करता?
हम शिकायत करते हैं कि आज कोई अच्छा नहीं लिखता, कोई ईमानदार नहीं रहा और कोई बदलाव नहीं चाहता। जबकी इसके ही समान्तर एक और सच्चाई यह है कि जब कोई सच में ईमानदारी से लिखता है या बदलाव की बात करता है, तो उसे पढने वालों कि संख्या कम ही मिलती है, क्योंकि ऐसा लेखन हमें कठघरे में खड़ा करता है, और खुद से सवाल करना हमें सबसे ज़्यादा असहज करता है।
हम गलत लोगों से सही काम की उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसान है। खुद खड़े होना कठिन है, खुद बोलना जोखिम भरा है और खुद कुछ अलग करना असुविधाजनक है। इसलिए हम भीड़ में सुरक्षित रहना पसंद करते हैं।
वही भीड़ जो गलत को लोकप्रिय बना सकती है और फिर कहती है कि नेता खराब हैं, लेखक बिक गए हैं या व्यवस्था में खामियां आ गई हैं|
व्यवस्था की खामियों की तरफ इशारा करने वाले लोगों में अधिकतर, उसी व्यवस्था को रोज़ मज़बूत भी तो कर रहे हैं!
"हम जिन विचारों को समर्थन देते हैं, जिन लोगों को आगे बढ़ाते हैं और जिन बातों पर चुप रहते हैं, वही समाज की दिशा तय करती हैं।"
फिर भी हम अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचते हैं।
हम दोहरे मानक वाला इंसान नहीं कहलाना चाहते, पर सच यह है कि हम में से ज्यादातर सुविधावादी हो चुके हैं। और सुविधावाद धीरे-धीरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है। अमूमन लोग सही का साथ तभी देते हैं, जब उसमें हमें कोई असुविधा न हो।
यदि सच में बदलाव चाहिए, तो पहले यह देखना होगा कि हम किसके साथ खड़े हैं, किसे पढ़ रहे हैं और किस चुप्पी को हम समझदारी समझ रहे हैं।
क्योंकि गलत का साथ देकर सही की उम्मीद करना, समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है।
यदि यह लेख आपको चुभा हो, तो इसे नज़र अंदाज़ मत कीजिए, संभव है, यही चुभन उस बदलाव की शुरुआत हो, जिसकी बात हम हमेशा दूसरों से करते आए हैं।
- सोनम वर्मा
सीतापुर, उत्तर प्रदेश
उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|
आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|
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अक्सर लोगों को बात करते सुना है कि " दान तो हम भी करते हैं लेकिन बताते नहीं फिरते या वाट्सऐप स्टेटस नही लगाते! "
आज के बदलते परिदृश्य में जब आम इंसान स्व केंद्रित होता जा रहा और उसकी व्यक्तिगत चाह और आवश्यकताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि दूसरों की तकलीफ़ या सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए उसके लिए समय, पैसा या अन्य संसाधन निकाल पाना मुश्किल होता जा रहा है, तब ऐसी हालत में किसी इंसान की व्यक्तिगत मदद में उसकी गोपनीयता का सम्मान करते हुए, अन्य संस्थागत मामलों में सामाजिक सरोकार के किए गए कार्यों का निस्वार्थ प्रचार एक निंदनीय नहीं सराहनीय कार्य है, इससे अन्य लोग प्रेरित होंगे और अपने व्यक्तिगत समस्याओं के निवारण के साथ सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए भी प्रयत्न करेंगे, यथा: रक्तदान, श्रमदान, संस्था को वित्तीय मदद, वस्त्रदान इत्यादि।
- आरती
लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।
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दिव्यांम के जन्मदिन पर गिफ्ट में आए ढेर से नई तकनीक के इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों में कुछ को दिव्यम चला नहीं पा रहा था घर के अन्य सदस्यों ने भी हाथ आजमाइश की लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिली तभी कामवाली बाई सन्नो का 11 वर्षीय लड़का किसी काम से घर आया सभी को खिलौनों में बेवजह मेहनत करता देख वह बड़े ही धीमे में व संकोची लहजे में बोला -
'आंटी जी ! आप कहें तो मैं इन खिलौनों को चला कर बता दूं' पहले तो मालती उसका चेहरा देखती रही फिर मन ही मन सोच रही थी कि इसे दिया तो निश्चित ही तोड़ देगा फिर भी सन्नो का लिहाज कर बेमन से हां कर दी और देखते ही देखते मुश्किल खिलौनों को उसने एक बार में ही स्टार्ट कर दिया सभी आश्चर्यचकित थे , मालती ने सन्नो को हंसते हुए ताना मारा -
' वाह री सन्नो ! तू तो हमेशा कहती है पगार कम पड़ती है और इतने महंगे खिलौने छोरे को दिलाती है जो मैंने आज तक नहीं खरीदे '
इतना ही सुनते ही सन्नों की आंखें नम हो गई उसने भरे गले से कहा- ' मैडम जी ! यह खिलौनों से खेलता नहीं बल्कि खिलौनों की दुकान पर काम करता है।'
- मीरा जैन
उज्जैन मध्य प्रदेश
अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।
पता
516 साईं नाथ कॉलोनी,सेठीनगर
उज्जैन ,मध्य प्रदेश
पिन-456010
मो.9425918116
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आज से कुछ समय पहले पापा और उनके मित्र धर्म, राजनीति, समाज इन सब विषयों पर कुछ बातें कर रहे थे। उसी समय मैं वहां पहुंची और मैंने एक प्रश्न का उत्तर बहुत ही शानदार तरीके से दिया और कुछ देर तक मैं उन लोगों से बात भी करती रही जिन मुद्दों पर वे लोग बात कर रहे थे। पर मेरा तरीका थोड़ा सा तर्किक और अकादमिक स्तर का था। कुछ देर बाद ही पापा के मित्रों ने मुझे वहां से जाने के लिए कह दिया और कहा कि ये बाते बच्चों को नहीं करनी चाहिए। मुझे राजनीति, धर्म, समाज, दर्शनशास्त्र इन सभी विषयों पर बात करते हुए बहुत अच्छा लगता है और मुझमें इनकी एक स्तर की समझ भी है। मैंने उस समय सोचा कि क्यों मैं इन विषयों पर बात नहीं कर सकती?
शायद आज के समाज का एक हिस्सा लड़कियों को ऐसे मुद्दे जो पुरुषों के लिए ही समझे जाते थे उन पर लड़कियों को बात करने ही नहीं देना चाहता!
ऐसे लोगों को ये समझना चाहिए कि इस तरह वो दुनिया की आधी आबादी की विश्लेषण क्षमता और समझ का लाभ लेने से चूक रहे हैं, अगर न चूके तो दुनिया और बेहतर तथा संवेदनशील हो सकती है।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
मधुरिमा को खिलखिलाते हुए हंसते देखकर
चेष्टा ने चौंक कर पूछा, अरे मधुरिमा तुम तो कह रही थी कि हंसना भूल गई हो, केवल मुस्कुराती हो, यह अचानक बदलाव कहां से आ गया कि इतना खुलकर हंस रही हो ?
मधुरिमा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, हां चेष्टा पहले मैं मुस्कुराती ही थी बस क्योंकि कुछ उत्साह की कमी थी, कुछ निराशा के बादल थे, लेकिन अब कुछ लोगों से मिलकर, उनसे बात करके यह समझ आया है कि संघर्ष और दिक्कतें बहुत लोगों के जीवन में रहती हैं। हमें यह सोचकर निराश नहीं रहना चाहिए कि हमारे पास समय या संसाधन कम हैं, हमारा नजरिया यह होना चाहिए कि कुछ लोगों के पास इतने भी संसाधन नहीं है, तो क्यों ना इतने ही संसाधनों में जो बेहतर हो सके वह करें हम क्यों उस चीज के पीछे भागे जिसके लिए संसाधन नहीं है, फिलहाल जिन चीजों के लिए संसाधन है उनके लिए प्रयास करें, अपने पैरों पर खड़े हों और अपने इन्हीं कम संसाधनों में ही हम अपने से भी कम संसाधनों वाले लोगों की मदद कर सकते हैं और दूसरों के लिए की गई मदद से जो संतुष्टि की अनुभूति होती है वह लाजवाब है। उस अनुभूति ने ही मुझे ये हौसला दिया है कि मैं बहुत बड़ा भले कुछ ना कर पाऊं लेकिन अपने पैरों पर खड़े होकर कुछ लोगों के जीवन में मुस्कान ला सकती हूं और यह स्पष्टता और विश्वास मुझे इस योग्य बनाता है कि मैं अपनी परिस्थितियों पर ही हंस सकूं और यह परिस्थितियां मुझ पर नहीं, मैं इन परिस्थितियों पर हंस सकूं। ये मेरी खिलखिलाहट भरी हंसी इस विजय का प्रतीक है।
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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अक्सर लोगों को बात करते सुना है कि " दान तो हम भी करते हैं लेकिन बताते नहीं फिरते या वाट्सऐप स्टेटस नही लगाते! "
आज के बदलते परिदृश्य में जब आम इंसान स्व केंद्रित होता जा रहा और उसकी व्यक्तिगत चाह और आवश्यकताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि दूसरों की तकलीफ़ या सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए उसके लिए समय पैसा या अन्य संसाधन निकाल पाना मुश्किल होता जा रहा है, तब ऐसी हालत में किसी इंसान की व्यक्तिगत मदद में उसकी गोपनीयता का सम्मान करते हुए, अन्य संस्थागत मामलों में सामाजिक सरोकार के किए गए कार्यों का निस्वार्थ प्रचार एक निंदनीय नहीं सराहनीय कार्य है, इससे अन्य लोग प्रेरित होंगे और अपने व्यक्तिगत समस्याओं के साथ सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए भी प्रयत्न करेंगे, यथा: रक्तदान, श्रमदान, संस्था को वित्तीय मदद, वस्त्रदान इत्यादि।
- आरती
लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।
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"मर गया नालायक! देखो तो, कितना खून पीया था। उड़ भी नहीं पाया, जबकि सम्भव है इसने खतरा महसूस कर लिया होगा।"
"अरे मम्मी, आप दुखी नहीं है अपना ही खून देखकर?"
"नहीं, क्योंकि यह अब मेरा खून नहीं था, इसका हो गया था।"
"आप भी न, उस दिन उँगली कटने पर तो आपके आँसू नहीं रुक रहे थे। और आज अपना ही खून देखकर आप खुश हैं।"
''जो मेरा होता है, उसके नष्ट हो जाने पर कष्ट होता है। पर मेरा होकर भी जो मेरा न रहे, तब उसके नष्ट हो जाने पर मन को संतुष्टि होती है, समझा?''
"बस मम्मी, अब यह मत कहने लगिएगा कि यह खून पीने वाला मोटा मच्छर, कोई ठग व्यापारी या नेता है या फिर कोई भ्रष्ट अफसर! और उससे निकला खून, आपके खून पसीने की कमाई! जिसे पचा पाना सबके बस की बात नहीं!"
"मेरा पुत्तर, कितना समझने लगा है मुझे..! छीन-झपटकर कोई कब तक जिंदा रह सकता है भला। पाप का घड़ा एक न एक दिन तो फूटता ही है।"
© सविता मिश्रा 'अक्षजा'
ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com
अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत हैं| आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|
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