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बेरोजगारी की जंजीरें और समाज (कविता) - गरिमा जोशी

हाय! यह बेरोज़गारी की जंजीरें
बड़ी कस के पकड़ लेती हैं,
लड़का हो चाहे लड़की,
ये जंजीरें सबको जकड़ लेती हैं!
एक बिन ब्याही लड़की, जो सबको खटकती है,
तैयारी का हवाला देकर वो मर-मर के जीती है।
“बस कुछ साल का मौका है तेरे पास”, यह कहकर बख्श दी जाती है!
दुनिया की आँखों में वो बस चुभती चली जाती है।
वहीं, दूसरी ओर, एक लड़का है; अब वो भी सबको खटकता है।
“कौन तुझे अपनी लड़की देगा?” यह कहकर आँखों में बड़ा चटकता है।
“तेरे पास लड़की से ज्यादा मौके हैं”, यह कहकर बख्श दिया जाता है,
पर दुनिया की नज़रों में तू थोड़ा कम सबको चुभता है।
एक लड़की, जो शादी से बचने के लिए पढ़ रही है,
वहीं वो लड़का शादी हो जाने के लिए पढ़ता है।
दोनों का मुद्दा एक ही है, वो है ‘बेरोज़गारी’,
पर दोनों की परिस्थिति अलग हैं, वो हैं खुद की लाचारी!
मैं तो कहती हूँ, लोग परिस्थिति देख कर हमें सम्मान देते हैं,
मानो एक साँप को शिवलिंग पर स्थान देते हैं।
शिवलिंग पर साँप दिखते ही लोग उस पर दूध और फूल चढ़ाते हैं,
वहीं साँप अगर घर में घुस जाए, लाठी-डंडों से उसे भगाते हैं।
था दोनों जगह साँप ही...
पर परिस्थिति ने रुतबा उसका बदल दिया।
मानो शिवलिंग पर चढ़ा साँप ‘रोज़गार’ में था,
और घर में आया साँप ‘बेरोज़गार’ बन गया।
बेरोज़गारी थी दोनों के लिए एक-सी,
मायने उसके सबने बदल दिए।
किसी के लिए वह अच्छी, तो किसी के लिए नासूर-सी बन गई।
हाय! यह बेरोज़गारी की जंजीरें
बड़ी कस के पकड़ लेती हैं,
लड़का हो चाहे लड़की,
ये जंजीरें सबको जकड़ लेती हैं!
- गरिमा जोशी

संपादकीय टिप्पणी - "कविता में प्रयुक्त शब्द प्रतीकात्मक हैं और समाज की दोहरी मानसिकता की तरफ ध्यान खींचने के प्रयोजन से उपयोग में लिए गए हैं, किसी भी इंसान की किसी भी भावना को आहत करने का कतई प्रयोजन नहीं है।" - लवकुश कुमार 


युवा रचनाकार गरिमा जोशी जी की लेखन शैली सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित होती है और वह समाज में मौजूद रूढ़िवादी सोच पर सवाल उठाती हैं। 

आप एक ऐसे न्यायपूर्ण और समानता वाले समाज का सपना देखती हैं जहाँ लिंग, जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो। 

कवयित्री से garimaji0814@gmail.com के जरिए संपर्क साधा जा सकता

है। रचनाकार के बारे में और जानने के लिए यहां पर क्लिक करें


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पितृसत्ता (कविता) - सौम्या

पुरुषों ने नहीं रहने दिया इंसान किसी को 

स्त्री को बनाया देवी कि वो सब सह जाए 

किन्नर में कहा कि देवता वास करते हैं इनके हृदय में 

जिससे इस व्यवस्था में रह सके सिर्फ वहीं इंसान 

और बने रहे अन्य सभी लिंगों के स्वामी 

क्योंकि इंसान बने रहना ही था सबसे अच्छा 

इसीलिए उन्होंने अपने लिए चुना इंसान रहना 

पुरुषत्व पर भी रखा सिर्फ अपना वर्चस्व 

सारे कल्याण के काम खुद ही करने लगे 

स्त्रियों की सुरक्षा से पालन पोषण तक 

उसके तन से लेकर मन तक 

किया अपना ही अधिकार 

पर इस वर्चस्व से सबसे ज्यादा मुसीबत में पड़ा भी पुरुष 

महिला तो दासी बनी ही 

पर पुरुष ने भी महिला को इतना दुर्लभ बनाया 

कि वो भी उसका दास हो गया 

कभी मानसिक तौर पर तो कभी शारीरिक

 

-सौम्या 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 

सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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शुभकामनाएं

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संघर्ष की अनिच्छा और समाज में गिरते मूल्य! अवलोकन शृंखला | लेख सं - 003

हम अक्सर अपने से बड़ों के मुँह से सुनते हैं कि आजकल के बच्चों में जीवन-मूल्य, सामाजिक मूल्य या नैतिक मूल्य कम होते जा रहे हैं। झूठ का बोलबाला है, ईमानदारी कम हो रही है और लोगों में संवेदनशीलता भी घटती जा रही है।

लेकिन यहाँ मैं इसकी जड़ तक जाने की कोशिश कर रहा हूँ।

ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, साहस, दया और उदारता—ये केवल अच्छी बातें या किताबों में लिखे आदर्श नहीं हैं। इन्हें अपने जीवन में बनाए रखने के लिए कई बार मेहनत करनी पड़ती है, धैर्य रखना पड़ता है और यहाँ तक कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष भी करना पड़ सकता है।

मसलन, ईमानदार रहना हमेशा आसान रास्ता नहीं होता। सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ सकती है। किसी के साथ खड़े होने के लिए अपनी सुविधा छोड़नी पड़ सकती है। सही बात पर टिके रहने के लिए अकेले खड़ा होना पड़ सकता है।

लेकिन अगर हमारी जीवनशैली का उद्देश्य ही यह हो जाए कि सब कुछ आराम से मिले, तुरंत मिले और हमें किसी तरह का संघर्ष न करना पड़े, तो धीरे-धीरे हम उस संघर्ष के लिए आवश्यक क्षमता विकसित करना ही बंद कर देंगे।

और शायद यहीं से मूल्यों का क्षरण शुरू होता है।

क्योंकि मूल्य केवल सिखाए नहीं जाते, उन्हें परिस्थितियों में निभाया जाता है।
और उन्हें निभाने के लिए कभी-कभी असुविधा, धैर्य और संघर्ष—तीनों को स्वीकार करना पड़ता है।

इसलिए शायद सवाल केवल यह नहीं है कि “आज की पीढ़ी में मूल्य क्यों कम हो रहे हैं?”

एक सवाल यह भी होना चाहिए—

“क्या हमने उन्हें उन मूल्यों के लिए संघर्ष करना सिखाया है?”

 

प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा 

धन्यवाद

-लवकुश कुमार  

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और अपने कार्यालयी दायित्व से इत्तर संवेदनशीलता के प्रवाह हेतु साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु प्रयासरत हैं| 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना अपने जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट। वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


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सुविधाओं की राह की लंबी डगर! अवलोकन शृंखला | लेख सं - 002

जब भी किसी से बात होती है कि अमुक क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं है, या जनता को किसी तरह की असुविधा हो रही है—तो अक्सर तुरंत कई सुझाव आने लगते हैं:

“इसे ऐसे कर देना चाहिए था…”
“वैसे कर देते तो समस्या ही नहीं होती…”

ऐसी बातें सुनकर कभी-कभी लगता है कि लोगों की नज़र में उस काम के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को शायद तरीका ही नहीं पता!

लेकिन मुझे बात कुछ और लगती है।

मैं अभी इसके कारणों में नहीं जाना चाहता। बस एक सवाल की तरफ ध्यान खींचना चाहता हूँ—

जब एक आम आदमी के पास किसी काम को पूरा करने के लिए कई तरह के उपाय, तरकीबें और रास्ते हो सकते हैं, तो वही रास्ते उन लोगों को क्यों नहीं सूझते जिन्हें उस काम को करने की जिम्मेदारी दी गई है?

और अगर सचमुच कोई रास्ता नहीं सूझ रहा, तो फिर उस क्षेत्र की जनता से ही क्यों न पूछ लिया जाए?

आख़िर जिस व्यक्ति को रोज़ उस असुविधा से गुजरना पड़ रहा है, संभव है उसके पास समस्या का कोई सरल और व्यावहारिक समाधान हो।

यहीं से एक असहज सवाल खड़ा होता है—

कहीं ऐसा तो नहीं कि बहाने ऊपर की बात हों, और फिलहाल सुविधा को पंक्ति में खड़े आख़िरी इंसान तक पहुँचाने की नीयत ही नीचे हो?

क्योंकि किसी सुविधा का होना और उसका वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुँच जाना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं और इसमें समय और नियत दोनों चाहिए|

-लवकुश कुमार  

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और अपने कार्यालयी दायित्व से इत्तर संवेदनशीलता के प्रवाह हेतु साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु प्रयासरत हैं| 

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रचनात्मकता अपेक्षाकृत कम लोगों में क्यों दिखती है? अवलोकन शृंखला | लेख सं - 001

अगर आपको भी लगता है कि हमारे आसपास की चीज़ें बहुत ज़्यादा एक जैसी होती जा रही हैं—वही विचार, वही तरीके, वही पसंद और वही तरह के काम—तो एक सवाल स्वाभाविक है:

आख़िर रचनात्मकता या कुछ नया करने की कोशिश हमें इतनी कम क्यों दिखाई देती है?

इसका एक कारण शायद यह है कि हम बतौर इंसान भीड़ में रहना सुरक्षित महसूस करते हैं। वही काम करना आसान लगता है, जो दूसरे कर रहे हैं। जिस रास्ते पर पहले से लोग चल रहे हों, वहाँ जोखिम कम महसूस होता है और समाज से validation भी जल्दी मिल जाता है।

इसके उलट, कुछ नया करने का मतलब अक्सर अनिश्चितता को स्वीकार करना होता है। आपको यह भी पता नहीं होता कि लोग आपके विचार को समझेंगे या नहीं, पसंद करेंगे या उसका मज़ाक उड़ाएँगे।

विडंबना यह है कि इसकी शुरुआत कई बार समाज से भी पहले हमारे अपने परिवारों से होती है। अगर परिवार में कोई व्यक्ति सामान्य रास्ते से अलग कुछ करने लगे, तो उसे प्रोत्साहित करने के बजाय अक्सर सवाल, संदेह या मज़ाक का सामना करना पड़ता है—
“इससे क्या मिलेगा?”
“लोग क्या कहेंगे?”
“सब यही कर रहे हैं, तुम भी वही करो।”

शायद इसी वजह से बहुत-से नए विचार जन्म लेने से पहले ही दब जाते हैं।

रचनात्मकता केवल प्रतिभा का मामला नहीं है। इसके लिए अलग सोचने की आज़ादी, असफल होने की गुंजाइश और थोड़ी-सी सामाजिक असहमति सहने का साहस भी चाहिए।

और शायद इसी कारण रचनात्मक लोग कम नहीं होते—बस उनमें से बहुत-से लोग अपनी रचनात्मकता को सुरक्षित रहने के लिए छिपा लेते हैं।

-लवकुश कुमार  

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आधुनिक समाज की सच्चाई (कविता) - विजयीप्रिया शर्मा

हम इतने सभ्य हो चुके हैं,

इतने सभ्य कि अब इंसान इंसान को देखकर मुस्कुराना भूल रहा है,

और कुछ यूं हुआ है

चारों तरफ उजाला है, पर अधिकतर अपनी अपनी स्क्रीन के अंधेरे में डूबे हुए हैं।

अंगूठे चल रहे हैं लगातार......

लाइक शेयर और स्क्रोल की अंधी दौड़ में, हम औंधे मुंह व्यस्त हैं फोन चलाने में,

बिना यह जाने कि .....

सामने बैठी बूढ़ी आंखें बात करना चाहती हैं,

वो अपना बुढ़ापा खोना चाहती हैं,

हमारी खिलती जवानी के साथ, 

पर हम रील के पंद्रह सेकंड के क्षणिक सुख में व्यस्त हैं।

रिश्तों के धागे अब वाई-फाई से जुड़ते हैं,

नेटवर्क कमजोर होते ही टूट जाते हैं। 

हजारों फ्रेंड्स है वर्चुअल दुनिया में, 

पर आधी रात को उदास दिल एक कंधा, दिल की सुनने वाला एक इंसान ढूंढने के लिए तरस जाता है।

यहां मशीनें इंसानों की तरह सोच रही है,

और इंसान रोबोट की तरह बिना सोचे जी रहा है। 

यह हमारी सबसे बड़ी प्रगति है। 

हमने चांद पर कदम रख दिया, 

पर जमीन पर अपनों का हाथ छोड़ दिया।

हम चालाक हो गए हैं। 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बात कर लेते हैं,

मगर पड़ोस के घर का हाल नहीं जानते हैं।

हम पत्थरों के दौर से निकल कर कांच और सिलिकॉन के नए पाषाण युग में आ खड़े हुए हैं,

पर उनमें अब कोई आहट नहीं होती है।

यह तरक्की का शिकार है यह संवेदनाओं का पतन?

हमारा चरित्र अब प्रोफाइल पिक्चर करती है,

और हमारी योग्यता.....

लाइक और कॉमेंट्स की गिनती।

 

- विजयीप्रिया शर्मा 


विजयीप्रिया जी स्नातक में मानविकी की छात्रा हैं और सामाजिक विषयों पर लिखती रहती हैं, वह वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं और पढ़ने लिखने की संस्कृति को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं| उनका मानना है कि पढ़ने लिखने वालों को एक मंच पर लाकर हम अपने विचार और जीवन/दुनिया को लेकर अपने अवलोकन ज्यादा से ज्यादा लोगों से साझा कर पाएंगे और इस तरह दुनिया और स्वयं को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण बना पाएंगे, महान लेखिका महादेवी वर्मा जी की रचनाएँ और व्यक्तित्व उन्हे खास पसंद हैं|


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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विज्ञान केवल पढ़ाया नहीं गया, जिया गया: वैज्ञानिक चेतना, स्वतंत्र सोच और रुचिकर कक्षाओं की खोज में पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा की 21 दिवसीय उत्तराखंड विज्ञान यात्रा- एक विस्तृत रिपोर्ट

"विज्ञान जब समाज की सेवा करेगा, तभी चमकेगा भारत का भविष्य।"
— पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा

क्या आपके मन में भी कभी ये सवाल आए हैं?

  • बच्चों का ध्यान कक्षा में कैसे लगाया जाए?

  • क्या विज्ञान केवल अंकों और परीक्षाओं का विषय है?

  • क्या बिना महँगी प्रयोगशाला के भी विज्ञान रोचक बनाया जा सकता है?

  • क्या हम बच्चों को उत्तर याद करवाने के बजाय प्रश्न पूछना सिखा रहे हैं?

  • क्या आज की शिक्षा बच्चों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार कर रही है?

यदि इन प्रश्नों ने कभी आपको भी परेशान किया है, तो उत्तराखंड में 12 मई से 1 जून 2026 तक चली यह विज्ञान यात्रा आपके लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है।

एक यात्रा, जो केवल विज्ञान यात्रा नहीं थी

देश के सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी, पद्मश्री सम्मानित शिक्षाविद एवं आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर डॉ. हरीश चंद्र वर्मा (एचसीवी सर) ने अपने वैज्ञानिक जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर "साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी" और "सोपान आश्रम" के सहयोग से उत्तराखंड के छह जिलों में 21 दिवसीय विज्ञान यात्रा का नेतृत्व किया।

इस यात्रा का नाम था—

"प्रयोग-यात्रा सरिता : प्रयास"

12 मई से प्रारम्भ हुई यह यात्रा विभिन्न विद्यालयों, डीआईईटी संस्थानों और शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्रों से होती हुई 27 मई से 1 जून तक आयोजित छह दिवसीय राष्ट्रीय आवासीय कार्यशाला (NWUPT 2026) के साथ सम्पन्न हुई।

इस दौरान—

  • 480 से अधिक भौतिक विज्ञान शिक्षक

  • 208 शिक्षक प्रशिक्षक

  • 410 शिक्षक प्रशिक्षु

  • 3000 से अधिक विद्यार्थी

प्रत्यक्ष रूप से इस अभियान से जुड़े।

आवश्यकता क्यों थी?

आज अधिकांश शिक्षक एक समान चुनौती का सामना कर रहे हैं—

बच्चे सुनते कम हैं, प्रश्न कम पूछते हैं, विज्ञान को कठिन मानते हैं और परीक्षा के बाद अधिकांश बातें भूल जाते हैं।

दूसरी ओर समाज बच्चों से लगातार अधिक अंक, अधिक प्रतिस्पर्धा और अधिक उपलब्धियों की अपेक्षा करता है।

परन्तु एचसीवी सर का प्रश्न अलग था—

"क्या हम बच्चों को सोचने के लिए तैयार कर रहे हैं?"

यात्रा का मूल उद्देश्य बच्चों और शिक्षकों में वैज्ञानिक चेतनास्वतंत्र सोचअवलोकन क्षमतातार्किक विश्लेषण और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करना था।

विज्ञान की शुरुआत प्रयोग से नहीं, संवाद से हुई

इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी भी सत्र की शुरुआत सूत्रों या परिभाषाओं से नहीं हुई।

शुरुआत हुई—

  • नाम पूछने से

  • मुस्कुराने से

  • पहेली से

  • अवलोकन से

  • और छोटे-छोटे सवालों से

उदाहरण के लिए—

"धागा किस रंग का है?"

"अंधेरे में कैसा दिखाई देगा?"

"काला धागा कभी लाल दिखता है क्या?"

"हम स्कूल पढ़ने आते हैं या खेलने भी?"

ऐसे सरल प्रश्न बच्चों को चर्चा में शामिल कर लेते थे।

शिक्षकों ने अनुभव किया कि बच्चों से संवाद स्थापित करना किसी भी शिक्षण प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।


ध्यान खींचने का अनोखा तरीका: Puzzle Method

कार्यशालाओं में बार-बार यह दिखाई दिया कि किसी भी अवधारणा को सीधे बताने के बजाय पहले एक ऐसी स्थिति बनाई जाती थी जिससे बच्चे चौंक जाएँ।

यानी—

पहले जिज्ञासा, फिर प्रयोग, फिर चर्चा और अंत में निष्कर्ष।

एचसीवी सर बार-बार कहते रहे—

"Attention create करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।"

यही कारण था कि कई घंटे चलने वाले सत्रों में भी बच्चों और शिक्षकों का ध्यान बना रहा।

कबाड़ से प्रयोगशाला

यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष था कि अधिकांश प्रयोग अत्यंत सामान्य वस्तुओं से किए गए—

  • डेटॉल की खाली बोतल

  • प्लास्टिक डिब्बा

  • रिंग चुंबक

  • सिरिंज

  • कागज

  • लेजर पॉइंटर

  • पानी का गिलास

  • गुब्बारा

  • सिक्का

इनसे अपवर्तन, वायुदाब, जड़त्व, बल, परावर्तन, मृगमरीचिका, बॉयल का नियम, ऊर्जा तथा प्रकाश जैसी अवधारणाएँ समझाई गईं।

इससे शिक्षकों को यह संदेश मिला कि विज्ञान पढ़ाने के लिए महँगी प्रयोगशालाएँ अनिवार्य नहीं हैं।


स्वतंत्र सोच: पूरी यात्रा का केंद्रीय विचार

कार्यशाला में बार-बार एक बात दोहराई गई—

"नई परिस्थितियों के लिए बच्चों को तैयार करना है तो उनमें स्वतंत्र सोच विकसित करनी होगी।"

बच्चों को उत्तर देना नहीं, उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना आवश्यक है।

प्रयोग के बाद 15-20 मिनट की खुली चर्चा इसी उद्देश्य से होती थी।

कई बार एक ही प्रयोग के अलग-अलग उत्तर सामने आते थे।

यहीं से बच्चों को समझ आता था कि विज्ञान रटने की नहीं, सोचने की प्रक्रिया है।


शिक्षकों ने क्या सीखा?

शिक्षकों के अनुभवों से कुछ प्रमुख निष्कर्ष सामने आए—

1. कक्षा को जीवंत कैसे बनाया जाए

छोटे प्रश्नों और गतिविधियों से।

2. बच्चों को विषय से कैसे जोड़ा जाए

उनके अनुभवों और परिवेश से।

3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण कैसे विकसित हो

अवलोकन, तर्क और प्रयोग के संयोजन से।

4. कम संसाधनों में प्रयोग कैसे कराए जाएँ

स्थानीय और बेकार पड़ी वस्तुओं के उपयोग से।

5. प्रश्न पूछने का साहस कैसे विकसित हो

ऐसा वातावरण बनाकर जहाँ गलत उत्तर देने का भय न हो।


विज्ञान से आगे की सीख

यह यात्रा केवल भौतिकी तक सीमित नहीं रही।

इसने समाज, पर्यावरण और जीवन मूल्यों पर भी चर्चा की।

प्लास्टिक मुक्त कार्यशालाएँ

डायट अल्मोड़ा और डायट बागेश्वर में एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक पर रोक लगाने की घोषणा की गई।

VIP संस्कृति को चुनौती

सभी प्रतिभागियों ने अपने बर्तन स्वयं धोए।

यह संदेश था—

श्रम का सम्मान भी शिक्षा का हिस्सा है।


विज्ञान और समाज का रिश्ता

एचसीवी सर बार-बार इस बात पर जोर देते रहे कि विज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल तकनीक बनाना नहीं, बल्कि समाज की सेवा करना है।

उन्होंने कहा—

"धरती मेरी है, तो इसे बचाने की जिम्मेदारी भी मेरी है।"

यात्रा में पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, हिमालय संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषय भी समान रूप से शामिल रहे।


NAEST: जिज्ञासा और प्रयोग की राष्ट्रीय प्रयोगशाला

कार्यशालाओं के दौरान राष्ट्रीय प्रयोगात्मक परीक्षा NAEST (National Anveshika Experimental Skill Test) की भी चर्चा हुई।

यह भारत की एक अनूठी परीक्षा है—

  • 9वीं से MSc तक सभी के लिए एक ही प्रश्नपत्र

  • घर पर प्रयोग

  • स्वयं रीडिंग लेना

  • मौलिक सोच पर आधारित मूल्यांकन

  • चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम में तीन दिन का प्रशिक्षण

  • 50,000 रुपये तक की छात्रवृत्ति

यह परीक्षा इस विचार को मजबूत करती है कि विज्ञान का वास्तविक मूल्य प्रयोग और जिज्ञासा में है, न कि केवल अंकों में।

 

देहरादून में राष्ट्रीय संगम

27 मई से 1 जून तक आयोजित National Workshop for Utsahi Physics Teachers (NWUPT 2026) इस पूरी यात्रा का शिखर बिंदु रही।

देश भर से आए चुनिंदा शिक्षकों ने छह दिनों तक प्रयोग, चर्चा, चिंतन और नवाचार के माध्यम से विज्ञान शिक्षण के नए आयामों पर कार्य किया।

सोपान आश्रम द्वारा आयोजित यह 23वीं राष्ट्रीय कार्यशाला थी।


यह यात्रा क्यों याद रखी जाएगी?

क्योंकि इसने शिक्षकों को याद दिलाया—

  • विज्ञान सूत्रों से पहले सवाल है।

  • प्रयोगशाला भवन नहीं, सोच है।

  • शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक नहीं है।

  • सीखना आनंददायक होना चाहिए।

  • बच्चों को उत्तर नहीं, खोज की प्रक्रिया देनी चाहिए।

  • वैज्ञानिक चेतना लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद है।

कार्यशाला से मिली 21 प्रमुख सीख

  1. विज्ञान उत्तर याद करने का नहीं, प्रश्न पूछने का विषय है।

  2. जिज्ञासा सीखने का सबसे बड़ा ईंधन है।

  3. कक्षा की शुरुआत सरल और उत्तर देने योग्य प्रश्नों से होनी चाहिए।

  4. बच्चों का ध्यान आकर्षित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।

  5. Puzzle Method विद्यार्थियों को सक्रिय बनाती है।

  6. वैज्ञानिक चेतना अवलोकन से शुरू होती है।

  7. हर प्रयोग के पीछे "क्यों?" सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

  8. सीखने की प्रक्रिया परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण है।

  9. कम लागत की सामग्री भी उत्कृष्ट प्रयोगशाला बन सकती है।

  10. विज्ञान को जीवन से जोड़ना जरूरी है।

  11. बच्चे तब बेहतर सीखते हैं जब वे चर्चा का हिस्सा बनते हैं।

  12. स्वतंत्र सोच भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण क्षमता है।

  13. प्रयोग डर को कम करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।

  14. प्रश्न पूछने वाला वातावरण रचनात्मकता को जन्म देता है।

  15. विज्ञान का उद्देश्य केवल परीक्षा नहीं, जीवन को समझना है।

  16. वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामाजिक समस्याओं को समझने में भी मदद करता है।

  17. पर्यावरण संरक्षण भी वैज्ञानिक चेतना का हिस्सा है।

  18. शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर दे तो कक्षा भी ठहर जाती है।

  19. समान परिस्थितियों में भी परिणामों की जांच आवश्यक है।

  20. सीखना आनंददायक होना चाहिए।

  21. बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना।


शिक्षकों की आवाज़ : कार्यशाला का प्रभाव

प्रकाश चन्द्र जोशी

"विज्ञान केवल सिद्धांत नहीं है। प्रयोगों के माध्यम से किसी विचार को परखना ही वास्तविक विज्ञान है।"

मदन मोहन सुंदरियाल

"जब मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है, तब वास्तविक सीख शुरू होती है।"

प्रीति राणा

"Puzzle Method बच्चों को केवल सुनने वाला नहीं, सोचने वाला बनाती है।"

सुरभि पंत

"भौतिकी को संगीत से जोड़कर देखने का नया दृष्टिकोण मिला।"


NAEST : जहाँ अंकों से अधिक महत्व जिज्ञासा का है

कल्पना कीजिए—

  • कक्षा 9 से लेकर MSc तक के विद्यार्थियों के लिए एक ही प्रश्नपत्र।

  • घर पर प्रयोग करने की स्वतंत्रता।

  • स्वयं उपकरण बनाना।

  • स्वयं रीडिंग लेना।

  • कोई कोचिंग नहीं।

  • कोई रटंत नहीं।

यही है National Anveshika Experimental Skill Test (NAEST)।

इस अनूठी परीक्षा का उद्देश्य प्रतिभा नहीं, जिज्ञासा को पहचानना है। चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम, कानपुर में पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा के सानिध्य में कार्य करने का अवसर भी मिलता है।


एक सामाजिक संदेश : विज्ञान, पर्यावरण और समानता

इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि विज्ञान की चर्चा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही।

  • प्लास्टिक और डिस्पोज़ल के प्रयोग पर रोक

  • सभी प्रतिभागियों द्वारा स्वयं अपने बर्तन धोना

  • श्रम के सम्मान का संदेश

  • VIP संस्कृति को चुनौती

  • पर्यावरण संरक्षण की प्रतिज्ञा

यह बताता है कि वैज्ञानिक चेतना केवल भौतिकी नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी है।


आगे की राह

उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके द्वारा उठाए गए प्रश्न अभी भी हमारे सामने हैं—

क्या हमारी कक्षाएँ बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित कर रही हैं?

क्या हम विज्ञान को जीवन से जोड़ पा रहे हैं?

क्या हम बच्चों में स्वतंत्र सोच विकसित कर रहे हैं?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तो यह यात्रा अपने उद्देश्य में सफल कही जाएगी।

क्योंकि अंततः—

"विज्ञान का सबसे बड़ा प्रयोग मानव मस्तिष्क है, और शिक्षा का सबसे बड़ा लक्ष्य उसे स्वतंत्र रूप से सोचने योग्य बनाना है।"

निष्कर्ष

उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 केवल कार्यशालाओं की श्रृंखला नहीं थी।

यह एक विचार था।

एक निमंत्रण था।

एक आग्रह था कि हम अपने विद्यालयों में ऐसी कक्षाएँ बनाएं जहाँ बच्चे केवल पढ़ें नहीं, सोचें; केवल सुनें नहीं, प्रश्न पूछें; केवल अंक न जुटाएँ, बल्कि जीवन को समझें।

यदि इस यात्रा से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश एक वाक्य में कहा जाए, तो शायद वह यह होगा—

"बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें प्रश्न पूछना सिखाना।"

और संभवतः यही वैज्ञानिक चेतना की पहली सीढ़ी है।

 

 

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ताल :फिल्म समीक्षा - सौम्या गुप्ता

हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, बातें की जाती हैं पर एक समय तक एक ऐसा समूह जिसे न स्त्री माना जाता है न पुरुष अर्थात् किन्नर उनके विषय में उस स्तर पर न समाज में कुछ बात हुयी और न ही कानून में।

      हमें संविधान में समानता का अधिकार दिया गया पर ये कैसी समानता थी जिसमें एक दौर तक पूरे एक तबके को डेथ सर्टिफिकेट लेने के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ा|

गौरी सावंत जी के जीवन पर बनी फिल्म ताली संवेदनाओं और जोश का अद्‌भुत मिश्रण है। कैसे एक किन्नर अपनी कम्युनिटी के लिए लड़ती है। जिसे अपने घर से निकलना पड़ता है क्योंकि उसके पिता उसकी अलग पहचान को समाज के सामने स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।

गणेश जिसे पता था कि गौरी बनने का सफर कितना दर्द देने वाला हो सकता है फिर भी उसने यह सफर तय किया। खाने के लिए और रहने के लिए संघर्ष किया।

अपनी कम्युनिटी में पूरी तरह उसे अपना समझा जाने लगे इसके लिए उसने जान जोखिम में डालकर ऑपरेशन कराया। फिर उसकी ही कम्युनिटी का एक मेंबर उसकी जान लेना चाहता था क्योंकि वो एक शिक्षिका बन गई थी।

गौरी जी ने किन्नर समुदाय के लिए ही नहीं काम नहीं किया, बल्कि वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के बच्चों को भी अपना माना। गणेश को गौरी बनना था क्योंकि उसे माँ बनना अच्छा लगता था।

गौरी जी कहती हैं कि इस देश में यशोदा की बहुत जरूरत है। उन्होंने शिक्षा भी ली और शिक्षिका भी बनीं।

शिक्षिका बनने तक का सफर भी आसान नहीं रहा होगा। वो ऐसी शिक्षिका बनी कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा इन्हें सम्मानित किया गया। उनकी एक दोस्त की जान जाने पर शरीर को नीचे रखने पर उन्होंने धरना प्रदर्शन कर दिया | साम-दाम-दण्ड की नीति के द्वारा उनको पूरा सम्मान दिलाया।

सुप्रीम कोर्ट में अपनी कम्युनिटी को तीसरे लिंग की पहचान दिलाई

उन्होंने राह के काले पत्थरों या मुँह पर पड़ी काली स्याही से रुकना सीखा ही नहीं था। इसीलिए तो चाहे अपनों का साथ छूटना हो या इस समुदाय के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का पता चलना हो, ऑपरेशन के लिए जान जोखिम में डालना हो या अपने ही लोगों द्वारा मारने कोशिश, उन्होंने रुकना नहीं आगे बढ़ना स्वीकार किया।

ताली बजाना नहीं, बजवाना स्वीकार किया

हमें इस मूवी को देखना चाहिए और प्रत्येक समुदाय के प्रति सद्भाव रखना चाहिए आखिर हम सभी में ईश्वर का रूप भिन्न-भिन्न रूपों में साकार होता है। 

           हर समुदाय में कुछ कमियां होती है। हमें जरूरत है कि हम उसकी कमियों को समझें और हर समुदाय को समाज की मुख्यधारा में शामिल करें| जब तक हम उन्हें बराबर का अधिकार नहीं देते, शिक्षा और स्वास्थ्य के समान अवसर नहीं देते, हमें कोई हक नहीं है कि हम उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए किए जाने वाले कामों के लिए उन्हें अपमानित करे। 

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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बदलतीं स्त्रियाँ (कविता)- सौम्या

प्रस्तुत है, कवयित्री सौम्या जी की एक कविता, जो महिलाओं की बदलते हुए सामाजिक भूमिकाओं के बारे में है। यह प्रश्न उठाती  है कि क्या समाज इस बदलाव के लिए तैयार है, और यह परंपरागत मान्यताओं और पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं पर भी सवाल उठाती है।

 

मैंने सुना है एक प्रश्न जिसमें पूछा जाता है

कि जब आज स्त्रियां बदल रही हैं, 

वो अब दूसरों से पहले स्वयं को चुन रही हैं 

वो अब रसोईघर से पहले अपने अन्य हुनर को चुन रही हैं 

अब वो खुद का अलग अस्तित्व भी ढूंढ रही हैं 

बेबाक होकर बोल रही हैं, खेल रही है, उड़ भी रही हैं 

क्या समाज इस परिवर्तन के लिए तैयार है? 

तो मुझे ऐसा लगता है, कि नहीं

समाज का एक वर्ग आज भी इस परिवर्तन को नहीं देखना चाहता 

वह चाहता है वही पुरानी रुढियों में लिपटी स्त्री 

जिसके मुंह में न जुबान हो और न दिमाग़ में अपने कोई विचार 

पिता, पति और पुत्र पर निर्भर स्त्री 

जो एक कदम भी बिना किसी के सहारे के न चल सके 

जो हमेशा चले पुरुषों से एक कदम पीछे 

जो समर्पित कर दे अपने जीवन का एक-एक पल 

पुरुषों के लिए 

चाहे वह पुरुष दो पल भी न निकाल सके औरत के लिए 

चाहे वह पुरुष, औरत का सम्मान भी करना न जानता हो 

पर पुरुषों को आज भी चाहिए गूंगी गुड़िया|

 

-सौम्या 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


आइए कुछ प्रश्नों के माध्यम से कविता के निहित अर्थ को अच्छे से समझने का प्रयास करते हैं:

इस कविता  में महिलाओं के विषय में क्या विचार व्यक्त किए गए हैं?

इस कविता  में महिलाओं के बदलते सामाजिक भूमिकाओं और स्वतंत्रता की खोज पर विचार व्यक्त किए गए हैं। यह उन पुरानी परंपराओं पर सवाल उठाता है जो महिलाओं को पुरुषों पर निर्भर रहने और खुद को सीमित करने के लिए मजबूर करती हैं। कविता  में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि समाज इस बदलाव के लिए तैयार नहीं है और अब भी कुछ लोग महिलाओं को पुरानी रूढ़ियों में देखना चाहते हैं।

इस कविता में समाज के प्रति क्या सवाल उठाया गया है?

इस कविता में समाज से यह सवाल पूछा गया है कि क्या वह महिलाओं के इस बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार है। यह सवाल समाज की मानसिकता और महिलाओं के प्रति उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश डालता है। कविता में इस बात पर जोर दिया गया है कि समाज का एक वर्ग अब भी महिलाओं को पुरानी भूमिकाओं में देखना चाहता है, जो उनके विकास और स्वतंत्रता में बाधा डालता है।

कवयित्री  महिलाओं के लिए किस प्रकार की स्वतंत्रता की वकालत करती है?

कवयित्री महिलाओं के लिए एक ऐसी स्वतंत्रता की वकालत करती  है जिसमें वे अपनी पसंद खुद कर सकें, अपने काम को चुन सकें, और एक अलग अस्तित्व ढूंढ सकें। यह स्वतंत्रता उन्हें बेबाक होकर बोलने, खेलने और उड़ने का अधिकार देती है, जिसका अर्थ है कि वे बिना किसी डर के अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा कर सकें।

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गलत के साथ खड़े होकर सही की उम्मीद! (पुनर्विचार) - सोनम वर्मा

यह लेख पढ़ते समय यदि आपको असहजता महसूस हो, तो यह असहजता व्यर्थ नहीं है, यह वही बेचैनी है, जो तब होती है जब कोई हमें आईना दिखा देता है।

हम अक्सर समाज, व्यवस्था और लोगों को दोष देते हैं, पर यह देखने से बचते हैं कि कहीं हम स्वयं ही उस गलत का हिस्सा तो नहीं बन रहे, जिसका रोना रोज़ रोते हैं।दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो वही पढ़ते हैं जो उन्हें सोचने से बचाए, वही सुनते हैं जो उन्हें हँसाकर टाल दे और वही देखते हैं जो उन्हें ज़िम्मेदारी से दूर रखे। फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि समाज बदल जाए, विचार ऊँचे हो जाएँ और लोग ईमानदार बन जाएँ। यह कैसी उम्मीद है, जो गलत को ताकत देकर सही से की जाती है?

जो लोग सच बोलते हैं, कठिन सवाल उठाते हैं और हमारी सुविधाजनक सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। उन्हें उबाऊ, नकारात्मक या अव्यावहारिक कहकर किनारे कर दिया जाता है, पर जो लोग हमें बहलाते हैं, हमारी सोच को सुन्न करते हैं और भीड़ के स्वाद के अनुसार परोसते हैं, उन्हें हम सर आँखों पर बिठा लेते हैं। क्या यह चयन हमारी मानसिकता को उजागर नहीं करता?

हम शिकायत करते हैं कि आज कोई अच्छा नहीं लिखता, कोई ईमानदार नहीं रहा और कोई बदलाव नहीं चाहता। जबकी इसके ही समान्तर एक और सच्चाई यह है कि जब कोई सच में ईमानदारी से लिखता है या बदलाव की बात करता है, तो उसे पढने वालों कि संख्या कम ही मिलती है, क्योंकि ऐसा लेखन हमें कठघरे में खड़ा करता है, और खुद से सवाल करना हमें सबसे ज़्यादा असहज करता है।

हम गलत लोगों से सही काम की उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसान है। खुद खड़े होना कठिन है, खुद बोलना जोखिम भरा है और खुद कुछ अलग करना असुविधाजनक है। इसलिए हम भीड़ में सुरक्षित रहना पसंद करते हैं।

वही भीड़ जो गलत को लोकप्रिय बना सकती है और फिर कहती है कि नेता खराब हैं, लेखक बिक गए हैं या व्यवस्था में खामियां आ गई हैं|

व्यवस्था की खामियों की तरफ इशारा करने वाले लोगों में अधिकतर, उसी व्यवस्था को रोज़ मज़बूत भी तो कर रहे हैं!

"हम जिन विचारों को समर्थन देते हैं, जिन लोगों को आगे बढ़ाते हैं और जिन बातों पर चुप रहते हैं, वही समाज की दिशा तय करती हैं।"

फिर भी हम अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचते हैं।

हम दोहरे मानक वाला इंसान नहीं कहलाना चाहते, पर सच यह है कि हम में से ज्यादातर सुविधावादी हो चुके हैं। और सुविधावाद धीरे-धीरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है। अमूमन लोग सही का साथ तभी देते हैं, जब उसमें हमें कोई असुविधा न हो।

यदि सच में बदलाव चाहिए, तो पहले यह देखना होगा कि हम किसके साथ खड़े हैं, किसे पढ़ रहे हैं और किस चुप्पी को हम समझदारी समझ रहे हैं।

क्योंकि गलत का साथ देकर सही की उम्मीद करना, समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है।

यदि यह लेख आपको चुभा हो, तो इसे नज़र अंदाज़ मत कीजिए, संभव है, यही चुभन उस बदलाव की शुरुआत हो, जिसकी बात हम हमेशा दूसरों से करते आए हैं।

- सोनम वर्मा

सीतापुर, उत्तर प्रदेश


उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया  तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|

आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|


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