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प्रोफेसर की डायरी - डॉ लक्ष्मण यादव : पुस्तक परिचय सह समीक्षा (शीतल भट्ट)

प्रोफेसर की डायरी एक जरूरी पढ़ी जाने योग्य पुस्तक है।

यह डायरी एक प्रोफेसर का अनुभव और आप बीती मात्र नहीं बल्कि शिक्षक वर्ग की व्यथा कथा भी है।

एक ईमानदारी के साथ लिखा गया अपना निजी अनुभव,जो उन्होंने महसूस किया है। वह लिखते है कि इस दौर में बोलने की कीमत चुकानी होती है। यह एक तथ्य है कि सवालों से घबराने वाली सत्ताएं चाहती है कि सवाल पैदा करने वाली जगहों को ही कमजोर कर दिया जाए। इसलिए  ऐसी सत्ता की कोशिश रहती है कि शिक्षक हमेशा डर में रहें क्योंकि एक डरा हुआ शिक्षक अपनी कक्षाओं में रीढ़ विहीन विद्यार्थी तैयार करता है, जो समाज में जाकर मुर्दा नागारिक में तब्दील हो जाता है।"

यह पंक्ति ऐसी सच्चाई है, जो कहीं भीतर तक सोचने को मजबूर कर देती है। यह पुस्तक बहुत से भावावेगों से भर देती है। गुस्सा उस सिस्टम के खिलाफ जो छात्रों की उम्मीदों का गला घोंटने में लगा है। इसके साथ ही पुस्तक हमें प्रश्न पूछने का साहस, लड़ने का साहस, बोलने का साहस देती है।

यह डायरी मन को बहुत विचलित कर देती है। हमारी उच्च शिक्षा में सीनियर शिक्षकों द्वारा अपने जूनियरों से किस तरह बर्ताव किया जाता है, इसका उदाहरण है वह "लाइन" जब वहीं काम करने वाले कर्मचारी से पूछा जाता है कि कमरे में कौन है तो वह जवाब देता है कि कमरे में 2आदमी है और 3 एडहॉक है।यह पक्ति अपने आप में बहुत कुछ कह देती है।

प्रोफेसर लक्ष्मण को दिल्ली विश्वविद्याल जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्याल में 14साल पढ़ाने के बाद एक दिन उन्हें बताया जाता है कि अब आपकी जरूरत नहीं है। उन्हें अंदेशा था कि उन्हें बोलने की कीमत चुकानी होगी,उनके बहुत से सीनियरों ने उन्हें पहले ही आगाह कर दिया था कि आप ऐसे परमानेंट नहीं हो पाएंगें।

बार बार उन्हें ही नहीं उनकी तरह बहुत से शिक्षकों को प्रताड़ित किया जाता है। उन्हें 3 महीने के अस्थाई समय के लिए रखा जाता है, अगली बार उन्हें नियुक्ति मिलेगी या नहीं यह उनके द्वारा की गई या ना की गई जी हुजूरी पर निर्भर करता है।

वह शिक्षा जिससे उम्मीद की जाती है कि वह समाज में सभी के लिए समानता का वातावरण तैयार करेगी, सभी को समान अवसर देगीं। लेकिन यह संस्थान भी जातिवाद भाई-भतीजावाद, सामंतवाद का केंद्र बनते जा रहे हैं|

यह पुस्तक रोहित वेमुला जैसे तमाम छात्रों की कहानी है जो सिस्टम की भेंट चढ़ गए। जिनके सामने ऐसी परिस्थितियां तैयार करी गई, जिससे वह पूरी तरह टूट गए और अपनी लड़ाई अधूरी छोड़ गए।

अंत में पुस्तक में उनके द्वारा लिखी लाइन " मेरे लहजे में जी - हुजूर न था, और मेरा कोई कसूर न था।उनकी हिम्मत साहस और दृढ़संकल्प को दिखाता है। उनके पास परमानेंट होने के बहुत अवसर थे,लेकिन उन्होंने अपनी ईमानदारी को चुना और अंत तक लड़ते रहें। यह पुस्तक आज मूक हो चुकी आवाजों को स्वर देती है।उस साहस को जगाती है,जो भीतर कहीं दब गया है।

सच ही लिखते है "आज हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था वेंटिलेटर पर है, जिसे अस्थाई शिक्षकों के जरिए ऑक्सीजन दिया जा रहा है।"

एक बहुत जरूरी और खोखली होती शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई को सामने रखती पुस्तक, जो हमें भी अपनी आवाज बुलंद करने का साहस देती है, और हर हाल में अपने अधिकारों के लिए बोलने और लड़ने की हिम्मत देती है।

 

- शीतल भट्ट


शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


 

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विज्ञान केवल पढ़ाया नहीं गया, जिया गया: वैज्ञानिक चेतना, स्वतंत्र सोच और रुचिकर कक्षाओं की खोज में पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा की 21 दिवसीय उत्तराखंड विज्ञान यात्रा- एक विस्तृत रिपोर्ट

"विज्ञान जब समाज की सेवा करेगा, तभी चमकेगा भारत का भविष्य।"
— पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा

क्या आपके मन में भी कभी ये सवाल आए हैं?

  • बच्चों का ध्यान कक्षा में कैसे लगाया जाए?

  • क्या विज्ञान केवल अंकों और परीक्षाओं का विषय है?

  • क्या बिना महँगी प्रयोगशाला के भी विज्ञान रोचक बनाया जा सकता है?

  • क्या हम बच्चों को उत्तर याद करवाने के बजाय प्रश्न पूछना सिखा रहे हैं?

  • क्या आज की शिक्षा बच्चों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार कर रही है?

यदि इन प्रश्नों ने कभी आपको भी परेशान किया है, तो उत्तराखंड में 12 मई से 1 जून 2026 तक चली यह विज्ञान यात्रा आपके लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है।

एक यात्रा, जो केवल विज्ञान यात्रा नहीं थी

देश के सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी, पद्मश्री सम्मानित शिक्षाविद एवं आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर डॉ. हरीश चंद्र वर्मा (एचसीवी सर) ने अपने वैज्ञानिक जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर "साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी" और "सोपान आश्रम" के सहयोग से उत्तराखंड के छह जिलों में 21 दिवसीय विज्ञान यात्रा का नेतृत्व किया।

इस यात्रा का नाम था—

"प्रयोग-यात्रा सरिता : प्रयास"

12 मई से प्रारम्भ हुई यह यात्रा विभिन्न विद्यालयों, डीआईईटी संस्थानों और शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्रों से होती हुई 27 मई से 1 जून तक आयोजित छह दिवसीय राष्ट्रीय आवासीय कार्यशाला (NWUPT 2026) के साथ सम्पन्न हुई।

इस दौरान—

  • 480 से अधिक भौतिक विज्ञान शिक्षक

  • 208 शिक्षक प्रशिक्षक

  • 410 शिक्षक प्रशिक्षु

  • 3000 से अधिक विद्यार्थी

प्रत्यक्ष रूप से इस अभियान से जुड़े।

आवश्यकता क्यों थी?

आज अधिकांश शिक्षक एक समान चुनौती का सामना कर रहे हैं—

बच्चे सुनते कम हैं, प्रश्न कम पूछते हैं, विज्ञान को कठिन मानते हैं और परीक्षा के बाद अधिकांश बातें भूल जाते हैं।

दूसरी ओर समाज बच्चों से लगातार अधिक अंक, अधिक प्रतिस्पर्धा और अधिक उपलब्धियों की अपेक्षा करता है।

परन्तु एचसीवी सर का प्रश्न अलग था—

"क्या हम बच्चों को सोचने के लिए तैयार कर रहे हैं?"

यात्रा का मूल उद्देश्य बच्चों और शिक्षकों में वैज्ञानिक चेतनास्वतंत्र सोचअवलोकन क्षमतातार्किक विश्लेषण और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करना था।

विज्ञान की शुरुआत प्रयोग से नहीं, संवाद से हुई

इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी भी सत्र की शुरुआत सूत्रों या परिभाषाओं से नहीं हुई।

शुरुआत हुई—

  • नाम पूछने से

  • मुस्कुराने से

  • पहेली से

  • अवलोकन से

  • और छोटे-छोटे सवालों से

उदाहरण के लिए—

"धागा किस रंग का है?"

"अंधेरे में कैसा दिखाई देगा?"

"काला धागा कभी लाल दिखता है क्या?"

"हम स्कूल पढ़ने आते हैं या खेलने भी?"

ऐसे सरल प्रश्न बच्चों को चर्चा में शामिल कर लेते थे।

शिक्षकों ने अनुभव किया कि बच्चों से संवाद स्थापित करना किसी भी शिक्षण प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।


ध्यान खींचने का अनोखा तरीका: Puzzle Method

कार्यशालाओं में बार-बार यह दिखाई दिया कि किसी भी अवधारणा को सीधे बताने के बजाय पहले एक ऐसी स्थिति बनाई जाती थी जिससे बच्चे चौंक जाएँ।

यानी—

पहले जिज्ञासा, फिर प्रयोग, फिर चर्चा और अंत में निष्कर्ष।

एचसीवी सर बार-बार कहते रहे—

"Attention create करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।"

यही कारण था कि कई घंटे चलने वाले सत्रों में भी बच्चों और शिक्षकों का ध्यान बना रहा।

कबाड़ से प्रयोगशाला

यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष था कि अधिकांश प्रयोग अत्यंत सामान्य वस्तुओं से किए गए—

  • डेटॉल की खाली बोतल

  • प्लास्टिक डिब्बा

  • रिंग चुंबक

  • सिरिंज

  • कागज

  • लेजर पॉइंटर

  • पानी का गिलास

  • गुब्बारा

  • सिक्का

इनसे अपवर्तन, वायुदाब, जड़त्व, बल, परावर्तन, मृगमरीचिका, बॉयल का नियम, ऊर्जा तथा प्रकाश जैसी अवधारणाएँ समझाई गईं।

इससे शिक्षकों को यह संदेश मिला कि विज्ञान पढ़ाने के लिए महँगी प्रयोगशालाएँ अनिवार्य नहीं हैं।


स्वतंत्र सोच: पूरी यात्रा का केंद्रीय विचार

कार्यशाला में बार-बार एक बात दोहराई गई—

"नई परिस्थितियों के लिए बच्चों को तैयार करना है तो उनमें स्वतंत्र सोच विकसित करनी होगी।"

बच्चों को उत्तर देना नहीं, उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना आवश्यक है।

प्रयोग के बाद 15-20 मिनट की खुली चर्चा इसी उद्देश्य से होती थी।

कई बार एक ही प्रयोग के अलग-अलग उत्तर सामने आते थे।

यहीं से बच्चों को समझ आता था कि विज्ञान रटने की नहीं, सोचने की प्रक्रिया है।


शिक्षकों ने क्या सीखा?

शिक्षकों के अनुभवों से कुछ प्रमुख निष्कर्ष सामने आए—

1. कक्षा को जीवंत कैसे बनाया जाए

छोटे प्रश्नों और गतिविधियों से।

2. बच्चों को विषय से कैसे जोड़ा जाए

उनके अनुभवों और परिवेश से।

3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण कैसे विकसित हो

अवलोकन, तर्क और प्रयोग के संयोजन से।

4. कम संसाधनों में प्रयोग कैसे कराए जाएँ

स्थानीय और बेकार पड़ी वस्तुओं के उपयोग से।

5. प्रश्न पूछने का साहस कैसे विकसित हो

ऐसा वातावरण बनाकर जहाँ गलत उत्तर देने का भय न हो।


विज्ञान से आगे की सीख

यह यात्रा केवल भौतिकी तक सीमित नहीं रही।

इसने समाज, पर्यावरण और जीवन मूल्यों पर भी चर्चा की।

प्लास्टिक मुक्त कार्यशालाएँ

डायट अल्मोड़ा और डायट बागेश्वर में एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक पर रोक लगाने की घोषणा की गई।

VIP संस्कृति को चुनौती

सभी प्रतिभागियों ने अपने बर्तन स्वयं धोए।

यह संदेश था—

श्रम का सम्मान भी शिक्षा का हिस्सा है।


विज्ञान और समाज का रिश्ता

एचसीवी सर बार-बार इस बात पर जोर देते रहे कि विज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल तकनीक बनाना नहीं, बल्कि समाज की सेवा करना है।

उन्होंने कहा—

"धरती मेरी है, तो इसे बचाने की जिम्मेदारी भी मेरी है।"

यात्रा में पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, हिमालय संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषय भी समान रूप से शामिल रहे।


NAEST: जिज्ञासा और प्रयोग की राष्ट्रीय प्रयोगशाला

कार्यशालाओं के दौरान राष्ट्रीय प्रयोगात्मक परीक्षा NAEST (National Anveshika Experimental Skill Test) की भी चर्चा हुई।

यह भारत की एक अनूठी परीक्षा है—

  • 9वीं से MSc तक सभी के लिए एक ही प्रश्नपत्र

  • घर पर प्रयोग

  • स्वयं रीडिंग लेना

  • मौलिक सोच पर आधारित मूल्यांकन

  • चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम में तीन दिन का प्रशिक्षण

  • 50,000 रुपये तक की छात्रवृत्ति

यह परीक्षा इस विचार को मजबूत करती है कि विज्ञान का वास्तविक मूल्य प्रयोग और जिज्ञासा में है, न कि केवल अंकों में।

 

देहरादून में राष्ट्रीय संगम

27 मई से 1 जून तक आयोजित National Workshop for Utsahi Physics Teachers (NWUPT 2026) इस पूरी यात्रा का शिखर बिंदु रही।

देश भर से आए चुनिंदा शिक्षकों ने छह दिनों तक प्रयोग, चर्चा, चिंतन और नवाचार के माध्यम से विज्ञान शिक्षण के नए आयामों पर कार्य किया।

सोपान आश्रम द्वारा आयोजित यह 23वीं राष्ट्रीय कार्यशाला थी।


यह यात्रा क्यों याद रखी जाएगी?

क्योंकि इसने शिक्षकों को याद दिलाया—

  • विज्ञान सूत्रों से पहले सवाल है।

  • प्रयोगशाला भवन नहीं, सोच है।

  • शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक नहीं है।

  • सीखना आनंददायक होना चाहिए।

  • बच्चों को उत्तर नहीं, खोज की प्रक्रिया देनी चाहिए।

  • वैज्ञानिक चेतना लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद है।

कार्यशाला से मिली 21 प्रमुख सीख

  1. विज्ञान उत्तर याद करने का नहीं, प्रश्न पूछने का विषय है।

  2. जिज्ञासा सीखने का सबसे बड़ा ईंधन है।

  3. कक्षा की शुरुआत सरल और उत्तर देने योग्य प्रश्नों से होनी चाहिए।

  4. बच्चों का ध्यान आकर्षित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।

  5. Puzzle Method विद्यार्थियों को सक्रिय बनाती है।

  6. वैज्ञानिक चेतना अवलोकन से शुरू होती है।

  7. हर प्रयोग के पीछे "क्यों?" सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

  8. सीखने की प्रक्रिया परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण है।

  9. कम लागत की सामग्री भी उत्कृष्ट प्रयोगशाला बन सकती है।

  10. विज्ञान को जीवन से जोड़ना जरूरी है।

  11. बच्चे तब बेहतर सीखते हैं जब वे चर्चा का हिस्सा बनते हैं।

  12. स्वतंत्र सोच भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण क्षमता है।

  13. प्रयोग डर को कम करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।

  14. प्रश्न पूछने वाला वातावरण रचनात्मकता को जन्म देता है।

  15. विज्ञान का उद्देश्य केवल परीक्षा नहीं, जीवन को समझना है।

  16. वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामाजिक समस्याओं को समझने में भी मदद करता है।

  17. पर्यावरण संरक्षण भी वैज्ञानिक चेतना का हिस्सा है।

  18. शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर दे तो कक्षा भी ठहर जाती है।

  19. समान परिस्थितियों में भी परिणामों की जांच आवश्यक है।

  20. सीखना आनंददायक होना चाहिए।

  21. बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना।


शिक्षकों की आवाज़ : कार्यशाला का प्रभाव

प्रकाश चन्द्र जोशी

"विज्ञान केवल सिद्धांत नहीं है। प्रयोगों के माध्यम से किसी विचार को परखना ही वास्तविक विज्ञान है।"

मदन मोहन सुंदरियाल

"जब मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है, तब वास्तविक सीख शुरू होती है।"

प्रीति राणा

"Puzzle Method बच्चों को केवल सुनने वाला नहीं, सोचने वाला बनाती है।"

सुरभि पंत

"भौतिकी को संगीत से जोड़कर देखने का नया दृष्टिकोण मिला।"


NAEST : जहाँ अंकों से अधिक महत्व जिज्ञासा का है

कल्पना कीजिए—

  • कक्षा 9 से लेकर MSc तक के विद्यार्थियों के लिए एक ही प्रश्नपत्र।

  • घर पर प्रयोग करने की स्वतंत्रता।

  • स्वयं उपकरण बनाना।

  • स्वयं रीडिंग लेना।

  • कोई कोचिंग नहीं।

  • कोई रटंत नहीं।

यही है National Anveshika Experimental Skill Test (NAEST)।

इस अनूठी परीक्षा का उद्देश्य प्रतिभा नहीं, जिज्ञासा को पहचानना है। चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम, कानपुर में पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा के सानिध्य में कार्य करने का अवसर भी मिलता है।


एक सामाजिक संदेश : विज्ञान, पर्यावरण और समानता

इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि विज्ञान की चर्चा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही।

  • प्लास्टिक और डिस्पोज़ल के प्रयोग पर रोक

  • सभी प्रतिभागियों द्वारा स्वयं अपने बर्तन धोना

  • श्रम के सम्मान का संदेश

  • VIP संस्कृति को चुनौती

  • पर्यावरण संरक्षण की प्रतिज्ञा

यह बताता है कि वैज्ञानिक चेतना केवल भौतिकी नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी है।


आगे की राह

उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके द्वारा उठाए गए प्रश्न अभी भी हमारे सामने हैं—

क्या हमारी कक्षाएँ बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित कर रही हैं?

क्या हम विज्ञान को जीवन से जोड़ पा रहे हैं?

क्या हम बच्चों में स्वतंत्र सोच विकसित कर रहे हैं?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तो यह यात्रा अपने उद्देश्य में सफल कही जाएगी।

क्योंकि अंततः—

"विज्ञान का सबसे बड़ा प्रयोग मानव मस्तिष्क है, और शिक्षा का सबसे बड़ा लक्ष्य उसे स्वतंत्र रूप से सोचने योग्य बनाना है।"

निष्कर्ष

उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 केवल कार्यशालाओं की श्रृंखला नहीं थी।

यह एक विचार था।

एक निमंत्रण था।

एक आग्रह था कि हम अपने विद्यालयों में ऐसी कक्षाएँ बनाएं जहाँ बच्चे केवल पढ़ें नहीं, सोचें; केवल सुनें नहीं, प्रश्न पूछें; केवल अंक न जुटाएँ, बल्कि जीवन को समझें।

यदि इस यात्रा से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश एक वाक्य में कहा जाए, तो शायद वह यह होगा—

"बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें प्रश्न पूछना सिखाना।"

और संभवतः यही वैज्ञानिक चेतना की पहली सीढ़ी है।

 

 

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बारहवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 24-05-2026

बीते रविवार (24-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से बारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

अकार - पत्रिका  (दिलरस प्रियंवद द्वारा संपादित)

चीफ़ की दावत – भीष्म साहनी

The Trial Weeka wellness Programme

12 Week Fitness Project

The autobiography of Paramhansh Yoganand

  • शिक्षा के उद्देश्य में एक है सीखने और समझने की ललक को जिंदा रखना
  • जानकारी भरना और पढ़ाना मूल उद्देश्य नहीं
  • ज्ञान का निर्माण और सृजन स्वयं कर सकें विद्यार्थी यह है अंतिम उद्देश्य
  • बच्चे बचपन से स्वाभाविक रूप से ही सीखने की पृवत्ति रखते हैं, जिज्ञासा रखते हैं
  • बीज को हम खींचकर नहीं बढ़ाते वरन उसे अंकुरित और पोषित होने का उचित माहौल देते हैं वैसे ही हो बच्चों की शिक्षा व्यवस्था भी
  • अभिभावक तो सबसे पहले अध्यापक हैं

  • जो लोग साहित्य अध्ययन की शुरुआत करना चाहते हैं और उन्हे यदि मोटी किताबें डराती हैं तो वह पत्रिका से शुरुआत कर सकते हैं|
  • पत्रिका का सुझाव इसलिए क्योंकि हर पाठक की अपनी रुचि होती है, किसी को कहानी तो किसी को कविताएं और किसी को संस्मरण या यात्रा वृत्तान्त पसंद आते हैं, पत्रिकाओं में इस तरह कई विधाओं पर रचनाएँ होती हैं|  दूसरा कि एक रचना मन को न भाने पर आगे बढ़ा जा सकता और कोई दूसरी रचना पर ध्यान दिया जा सकता है| इस तरह एक रचना ही सही लेकिन मुकम्मल पढ़ा जा सकता है |
  • अकार संगमम – 3 दिन का आयोजन, जहां पर साहित्यकारों के बीच चर्चा
  • यह एक वैचारिक पत्रिका इसीलिए इससे भी आसान के लिए पाखी, हंस, मधुमती और आजकल जैसी कुछ बेहतरीन पत्रिकाओं से शुरुआत की जा सकती है|
  • यदि आप कुछ लिखती/लिखते हैं तो रचनाएँ प्रेषित की जा सकती हैं पत्रिकाओं को इस तरह आपका एक पाठक वर्ग तैयार हो सकता है जो भविष्य में आपके द्वारा किसी पुस्तक के लिखे जाने पर, पाठकों तक उसकी पहुँच सुनिश्चित करने में मददगार हो सकता है|

  •  आज की जो भी हालत है हमारी उसे स्वीकार करना चाहिए और बेहतरी के लिए प्रयास लेकिन उस हालत को अपने साथ के लोगों से छिपाकर उनके सामने बेहतर होने का ढोंग इंसान को अपनी ही खूबियाँ भूल जाने की तरफ धकेल देता है, आपकी भाषा और आपका पहनावा जैसी भी हो उसके लिए खुद को कभी हीन न समझें और इस बात को समझें की जीवन की सफलता, आंतरिक सच्चाई, करुणामय हृदय और चीजों की समझ के साथ जीने में है नाकी बाहरी दिखावे में|
  • जब तक हम अपनी कमियों को छिपाते रहेंगे, उन्हे दूर करना मुश्किल ही रहेगा
  • हम सबमें अपार संभावनाएं हैं, किसी इंसान को कमतर बोलकर उसे छिपा देना उसकी मानवीय गरिमा के खिलाफ है, जैसा की चीफ की दावत में दिखाया गया है|
  • व्यायाम में, पूर्णता हो, केवल शाम का टहलना पर्याप्त नहीं
  • पढ़ाई भी तब ही होगी जब शरीर स्वस्थ हो, स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मष्तिस्क का निवास होता है |
  • औरतों के लिए तो उचित व्यायाम बहुत ही जरूरी है|
  • आपकी छवि दूसरों के मन मे कैसी है, इसका अगर दबाव रहेगा तो इंसान अपनी सहजता खो देता है, सभ्य दिखने के दबाव में सहजता न खोएँ और पूर्वाग्रह में न रहें|
  • स्वयं को खुलकर व्यक्त करना, यह सुनिश्चित करता है कि लोग आपको लेकर कम से कम भ्रम मे रहेंगे|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम, गुंजन त्यागी मैम, सौम्या मैम, अरविंद कुमार, रंजीत ठाकुर,  प्रिया शर्मा, अनुपम जायसवाल, प्रीति जायसवाल, गायत्री जायसवाल, अंकित जायसवाल, रंजीत कुमार, प्रिया कश्यप,विशाल जायसवाल, c सिंह और लवकुश कुमार|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 06 जून (शनिवार रात 08:30 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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द्वाराहाट चैप्टर - प्रयोग यात्रा सरिता : उत्तराखंड विज्ञान यात्रा - पद्मश्री प्रो० डॉ हरीश चन्द्र वर्मा सर, साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी और सोपान आश्रम कानपुर की संयुक्त पहल @PM SRI GGIC Dwarahat

बीते शनिवार (23 मई 2026) को सुंदर उत्तराखंड के सुंदर अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट ब्लॉक में स्थित पीएम श्री राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में आयोजित विज्ञान यात्रा- प्रयोग यात्रा सरिता – प्रयास 2026 के अंतर्गत एक कार्यशाला का आयोजन किया गया, यह कार्यक्रम साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी और सोपान आश्रम कानपुर की संयुक्त पहल से आयोजित 21 दिवसीय उत्तराखंड विज्ञान यात्रा के अंतर्गत सम्पन्न हुआ, जिसमें मुझे एक एक विज्ञान प्रेमी के तौर पर शामिल होने का अवसर मिला|

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पदम्श्री अवकाश प्राप्त सम्मानित प्रो० डॉ हरीश चन्द्र वर्मा (आईआईटी कानपुर) और साथ में साइन्स इन सर्विस ऑफ सोसाइटी के कुमाऊं संयोजक भवानी शंकर कांडपाल सर रहे, कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यालय की प्रधानाचार्य, आदरणीय सोनिका नेगी मैम ने की|

साथ ही सहयोगी , हेमंत उपाध्याय , सोपान आश्रम कानपुर के अनुभव अवस्थी, साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी के कार्यकर्ता विनोद कुमार जोशी ,सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद त्रिभुवन जोशी तथा केंद्रीय विद्यलाय हल्द्वानी से मोहित शर्मा सर पूरी यात्रा में साथ रहे| इस यात्रा का अंत देहारादून में उत्साही फ़िज़िक्स teachers की workshop के साथ होगा, वैबसाइट से कुछ पुरानी छवियाँ - National Workshop of Utsahi Physics Teachers (NWUPT)



कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों के स्वागत और सम्मान के साथ, संगीत शिक्षिका सुरभि पंत मैम और उनकी कुशल छात्राओं द्वारा प्रस्तुत संगीतमय वंदना द्वारा हुयी|

जीवंत और कुशल मंच संचालन, एल टी, गणित शिक्षिका भावना जोशी मैम ने किया जिसमें एल. टी विज्ञान की शिक्षिका रेनु तिवारी मैम एवं प्रवक्ता भौतिकी किरन बिष्ट मैम का विशेष योगदान रहा|

विद्यार्थियों को एक यादगार प्रयोगिक और वैज्ञानिक एक्सपोजर मिला साथ ही कार्यशाला बच्चों और शिक्षकों सबके लिए मन बांधने वाली और यादगार रही|  


मै अगर अपनी बात करूँ तो सबसे पहले आभार विद्यालय प्रबंधन का, इतनी बेहतर व्यवस्था और आयोजन के लिए, सभी समर्पित और संबन्धित शैक्षिक और गैर-शैक्षिक स्टाफ का आभार क्योंकि "ऐसे आयोजन में सबका अपना योगदान" होता है|

आभारी हूँ साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी उत्तराखंड (विशेष आभार आदरणीय भवानी शंकर कांडपाल सर का जो कुमाऊँ समन्वयक हैं ) और सोपान आश्रम कानपुर का जिनकी संयुक्त पहल के अंतर्गत यह कार्यशाला हुयी, जिसमें न केवल HC वर्मा सर और उनकी टीम से मिलने का मौका मिला वरन वैज्ञानिक चेतना का माहौल कैसे बने, विद्यार्थियों और शिक्षकों में स्वतंत्र सोच कैसे विकसित हो और कैसे बच्चों को विज्ञान और विषयवस्तु से जोड़ा जा सके, इसके गुर सीखने का भी अवसर मिला|

मैंने सीखा कि कैसे कोई भी अध्याय या बात शुरू करने से पहले कैसे विद्यार्थियों/पाठकों के साथ कम्युनिकेशन स्थापित किया जाये ताकि आगे वह हमारी बात को और अच्छे से सुन/पढ़ सकें- यह सीख न केवल विद्यार्थियों/युवाओं को कुछ समझाने में मददगार होगी वरन पुस्तक लेखन में भी लाइटर नोट से बात शुरू करने का तरीका पाठकों का मन बांधने में उपयोगी होगा|

विद्यार्थियों को विषयवस्तु से जोड़ना-

मैंने देखा कि कैसे वर्मा सर और उनकी टीम द्वारा विद्यार्थियों से छोटे-छोटे आसान सवाल (अवलोकन पर आधारित जैसे की धागा किस रंग का है, लाल धागा अंधेरे मे किस रंग का दिखेगा इत्यादि) करके न केवल उनका हौसला बढ़ाया बल्कि उन्हे विषय वस्तु से जोड़ लिया और भवानी सर द्वारा बच्चों के नाम पूछकर, उनके नाम को भी उस चर्चा का हिस्सा बना लेना ये साबित करता है कि शिक्षक यदि हाजिरजवाब है तो बच्चों के साथ संवाद स्थापित करना और उन्हे इन्वाल्व करना कितना आसान हो जाता है जैसे कांडपाल सर ने एक प्रयोग के दौरान एक बिटिया से उसका नाम पूछा, जवाब आया, “हितैषी” तुरंत कांडपाल सर कहते हैं कि अरे वाह देखो हरीश सर भी हमारे कितने हितैषी हैं जो आज हमारे बीच आए हैं |

विद्यार्थियों और शिक्षकों की तन मन से उपस्थिति सुनिश्चित करना- 

अपने सवालों द्वारा (puzzle method द्वारा attention ensure करना) वर्मा सर और उनकी टीम ने सभी श्रोताओं को कार्यशाल से जोड़े रखा| 

कई बार ऐसा होता है कि हम कहीं बैठे होते हैं और मन कहीं होता है, यह हमारे और विद्यार्थियों सबके साथ होता है, सोचिए कि यदि ऐसा हो कि हम हर काम को इन्वाल्व होकर करना अपनी आदत मे लाएँ तो न केवल हमारी मन स्थिति बेहतर होगी साथ ही बच्चे हम से सीखकर यही आदत ला पाएंगे और फिर रिवीजन क्लास लेने की जरूरत, या बार बार समझाने की जरूरत न पड़ेगी|

इस तरह की कार्यशाला में टाइम कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता, इस तरह का इन्वाल्व्मेंत न केवल हमे और बच्चों को बेहतर अवलोकन मे मदद करता है बल्कि वर्तमान मे भी रखता है| यदि इस तरह का इनवल्वमेंट हम अपने हर काम मे सुनिश्चित कर सकें तो ये मन पास्ट और फ्युचर के चक्र से बाहर निकम हमे वर्तमान मे जीने मे मदद कर पाएगा और हमे चीजों को ढंग से अवलोकित कर पाएंगे|

सबसे महत्वपूर्ण कि कभी कभी ऐसा होता है कि विद्यालय मे लैब बनाने के साधन बहुत सीमित और कभी कभी न के बराबर होते हैं, उस अवस्था में भी कैसे बहुत आधारभूत और आसानी से मिलने वाले सामान से कुछ ऐसे प्रयोग किए जा सकते हैं जो बच्चों मे वैज्ञानिक चेतना जागा सकें, जैसे इस कार्यशाला में, "सामान्य लेजर पोइंटर, समतल दर्पण, पानी की बोतल, काँच का गिलास, सिक्का, रिंग चुंबक, इंजेक्शन वाली सिरिन्ज आदि" चीजों से बच्चों को प्रयोग कराये आगे, माने जैसा बजट हो वैसी व्यवस्था की जा सकती है|     

ऐसी ही सामग्री के साथ प्रयोग के लिए आदरणीय वर्मा सर की वैबसाइट का अवलोकन किया जा सकता है, संदर्भ के लिए कुछ लिंक दिये जा रहे हैं: 

https://hcverma.in/

https://www.shiksha-sopan.org/

Common Misconceptions of Physics PGTs in topics based on quantum Physics

Learning Physics through Simple experiments

Developing equations of light path in Mirage-like situations

कार्यशाल इतनी इनवोलविंग थी कि कार्यशाला पूरी होने के बाद बहुत ही अच्छा महसूस हो रहा था, मै दावे से कह सकता हूँ कि कार्यशाल में मौजूद ज़्यादातर शिक्षकों का अध्यापन का तरीका बदलेगा और बहुत से बच्चे आगे विज्ञान के क्षेत्र में बेहतर करने का मन बना चुके होंगे, एक ऐसी कार्यशाला जिसमें हम शुरू से अंत तक शामिल रहे तन और मन दोनों से, बच्चों के लिए तो यह ताउम्र याद रखने वाला अनुभव होगा, ऐसा विश्वास है|


प्रस्तुत हैं उपस्थित कुछ शिक्षकों के अनुभव -

डा0 एच0 सी0 वर्मा जी जो एक milestone और icon है उनके द्वारा जो आसानी से उपलब्ध और कम लागत वाली सामग्री से प्रयोग कराए गए, सही मायने में “ उन्होंने बताया कि केवल सिद्धांत पढ़ लेना विज्ञान नहीं है, बल्कि उसे प्रयोग द्वारा परखना ही वास्तविक विज्ञान है। तर्क हमें सोचने की दिशा देता है और प्रयोग उस तर्क की सत्यता सिद्ध करता है।”

 -प्रकाश चन्द्र जोशी सर, सहायक अध्यापक विज्ञान, राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ईरा चौधार द्वाराहाट अल्मोड़ा


कार्यशाला ने हमें यह महसूस कराया कि किस प्रकार सरल प्रयोग, उनसे जुड़े प्रश्नों की श्रृंखला और विचारपूर्ण चर्चाएँ एक बेहतर शिक्षण वातावरण का निर्माण करती हैं तथा रचनात्मक सोच को बढ़ावा देती हैं।

जब हम प्रयोगों का अवलोकन कर रहे थे, तब हम यह समझने का प्रयास कर रहे थे कि ऐसा क्यों हो रहा है। कार्यशाला से मिली एक महत्वपूर्ण सीख यह रही कि सबसे अधिक सीख तब होती है जब हमारा मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है। उसके बाद मन स्वयं उत्तर खोजने के लिए सक्रिय हो जाता है, और इस प्रकार प्राप्त ज्ञान लंबे समय तक स्मरण रहता है।

इसके अतिरिक्त, कार्यशाला में हमने यह भी अनुभव किया कि सीखने की "प्रक्रिया" अंतिम परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण होती है। जीवन में भी मंज़िल से अधिक महत्वपूर्ण उसकी यात्रा होती है।

-मदन मोहन सुंदरियाल सर, प्रवक्ता भौतिक विज्ञान रा इ का बिन्ताएवं विज्ञान समन्वयक ब्लॉक द्वाराहाट


सबसे अच्छी बात जो मुझे सीखने को मिली वो यह है कि अपने विषय को पढ़ाने के तरीके को Puzzle Method द्वारा बनायें, जिससे ज्यादा से ज्यादा बच्चे उसमें involve हों और actively participate कर अपने ideas दें।

ये भी सीखा कि हमारे आस-पास हर वस्तु और घटना के पीछे विज्ञान है, इसलिए वो नज़रिया विकसित करना होगा, जिससे हम उन घटनाओं को विज्ञान के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर, बच्चों में विज्ञान के प्रति सहजता उत्पन्न कर सकें।

- प्रीति राणा मैम, LT GIC Asgoli, Almora


आइए कुछ विस्तार मे समझते हैं -

कुछ बातें जो इस कार्यशाला में अवलोकन मे आयीं सीधे उनको उद्धृत करता हूँ:

विद्यार्थियों से संवाद स्थापित करने का तरीका, कुछ वाक्य जिन्होने ने केवल बच्चों के मन को बांध लिया बल्कि उपस्थित शिक्षकों और अन्य लोगों के चेहरे पर मुस्कान और बीच बीच में हंसी लाकर माहौल को जीवंत बनाये रखा: -

  • अलंकृत और गैर अलंकृत शिक्षक और प्यारे बच्चों, सबको मेरा.... मेरा क्या ? सबको मेरा नमस्कार - HCV सर

  • अच्छा आपका नाम हितैषी है, देखो वर्मा सर भी हमारे हितैषी हैं जो आज हमारे बीच आए हैं - भवानी शंकर कांडपाल सर

  • भवानी सर ने इस बात से शुरुआत की कि गणित कैसा लगता है आप सबको?

  • ऐसे वर्मा सर ने बच्चों से पूछा कि सबसे खराब विषय कौन सा लगता है आपको?

अवलोकन करना सिखाया:

  • धागा किस रंग का है?

    अच्छा लाल है

    क्या अंधेरे में भी लाल ही रहेगा?

    अच्छा अंधेरे में काला दिखेगा

    लेकिन काला धागा क्या कभी लाल दिखता है!

    और क्या है यहाँ आइए देखते हैं?

  • अच्छा, ये मैगनेट है, इसके बीच में छेंद क्यों

  • ये क्या है ? मिरर, अरे वाह पीछे से ही पहचान लिया

    अच्छा शीशे में अपना चेहरा देख पा रहे ?

    शीशे में कहाँ हो ? खंभे के अंदर (शीशे को खंभे से  सटाकर रखते हुये)

  • हम स्कूल क्यों आते हैं ? पढ़ने

  • खेलने नहीं आते ? आते हैं
  • तो आज हम खेलेंगे

  • कौन कौन डॉ बनना चाहता है

  • ये सिरिन्ज इसीलिए नहीं चल रही है क्योंकि ये कह रही की कांडपाल सर ने जो इसके छेंद पर अंगूठा रख रखा है तो अब यह नहीं चलेगी

  • अच्छा किसने कहा की इसके कान खराब हैं, चलो इसे ही बुलाओ आँख और कान के समन्वय वाले प्रयोग के लिए 

कुछ प्रयोग जिन्हे शामिल किया गया: (कुछ विडियो यूट्यूब पर उपलब्ध हैं, लिंक लेख में आगे उपलब्ध कराये गए हैं)

  • कान और आँख का समन्वय
  • Hand eye coordination
  • लेजर का उपयोग करके परावर्तन को समझाने का प्रयास
  • रुमाल को झटकने पर पाउडर झड़ जाता है, क्यों ? नहीं जड़त्व नहीं, बात कुछ और है|
  • सिक्के को एक बोतल के मुह पर रखकर, हाथ से ऊष्मा देकर हवा की ऊष्मीय गति बढ़ाने का प्रयोग
  • तीन पोल वाले मैगनेट से जुड़ा बेहतरीन प्रयोग|
  • एक छड़ एक एक सिरे पर एक बस्ता टाँगकर ये बताना की बस्ता भले ही नीचे को गिरने की टेंडेंसी रखता हो, आघूर्ण को संतुलित करने के लिए हमें छड़ कोअंगूठे से  नीचे की ओर दबाना भी पड़ता है|
  • छवि देखने के लिए हमरे दिमाग का अभ्यास कैसा है, पानी से भरे गिलास के पीछे का तीर या पेन हमे एक दूरी पर उल्टा तो एक दूरी पर सीधा क्यों दिखाई देता है|
  • इंजेक्शन वाली सिरिन्ज की कार्यविधि से निर्वात की अवधारणा समझाई गयी जिसमें बच्चों को खूब मज़ा आया, एक सिरिंज ली, जिसकी नोजल टूटा हुआ था फिर उससे निर्वात की अवधारणा को समझाने का प्रयास किया गया

कुछ बातें जो सीधे शिक्षकों से कही गयीं-

  • प्रयोग से नियमित जीवन में डर खत्म होगा, कम होगा
  •  वैज्ञानिक गढ़ने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी शिक्षकों और फिर अभिभावकों की होती है ताकि वैज्ञानिक चेतना, सवाल करने का, स्वतंत्र सोच का माहौल बन सके
  • तकनीकों को अपनी कार्यशाला में जीवंत करें
  • कक्षा की शुरुआत के लिए ऐसे टॉपिक से शुरू करें जिस पर कमेंट करना या जवाब देना बच्चों के लिए अपेक्षाकृत आसान हो
  • सूक्ष्म अवलोकन के लिए तैयार करें विद्यार्थियों को
  • कान्सैप्ट को हमारे दैनिक जीवन से संबन्धित करते हुए समझाने का प्रयास करें 
  • बच्चों में जिज्ञासा होती है, जरूरत है उसे पोषण देने की, जोकि उन्हे सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करने से मिलेगा 
  • बच्चे आपसे बेहतर सीख पाते हैं जब वो जुड़ाव महसूस करते हैं इसलिए जरूरी है शिक्षक कम्युनिकेशन में भी उस्ताद हो ताकि संवाद स्थापित करने में कम से कम समय लगे|
  • उपदेशों का अमूमन पालन नहीं होता है इसीलिए जरूरी है कि पहले अपने व्यवहार मे लाओ सवाल पूछना, नयी नयी परिस्थितियाँ उत्पन्न करना 
  • सोचने पर ज़ोर देने वाली गतिविधियां शामिल हों शिक्षण में|
  • जीवन की सफलता ही है स्वतंत्र सोच के विकास में| 
  • यदि बच्चों को नयी स्थितियों के लिए तैयार करना है तो उनमे स्वतंत्र सोच विकसित करने पर काम करना होगा और साथ में कम करना होगा, बंद करना होगा परीक्षा मे उनके द्वारा हासिल किए गए अंकों का महिमामंडन |
  • कार्य कारण सिद्धान्त में प्रक्रिया मायने रखती है, अगर प्रक्रिया के सारे चरण पता हैं तो किसी भी बदलाव को पकड़ा जा सकता है, और उसे समझाया भी जा सकता है |
  • सवाल पूछना सीखो और सिखाओ भी
  • जिज्ञासा जगाना भी आपका काम
  • Situations create करो और फिर discuss करो,
  • इस तरह के कुछ सवाल पेपर मे भी शामिल करो और साथ ही उनकी परंपरागत परीक्षा में जो कुछ आता है उसके लिए भी उन्हे तैयार करो, एक अनुपात निर्धारित करो
  • Identical experiments in identical situations may produce different results.
  • लर्निंग must be joyful.
  • भ्रम की अवस्था में प्रयोग को दोहराया जाना चाहिए
  • एकसमान अवस्थाओं में और विभिन्न परिस्थितियों में प्रयोग को दोहराकर हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं
  • Inertia का concept qualitative है
  • मेरा बोलना मेरे अधिकार मे है, और उनका सुनना या समझना उनके अधिकार में
  • Attention create करना आपकी ज़िम्मेदारी है
  • Puzzle वाली स्थिति उत्पन्न करके विद्यार्थियों का ध्यान खींचिए कि अरे ये क्या हो गया ?

HCV सर की कुछ कविताओं का संग्रह -  https://hcverma.in/Poems

एक शिक्षक के सवाल पर कि यदि कोई विद्यार्थी पूछे कि अमुक कान्सैप्ट का जीवन में क्या इस्तेमाल? प्रस्तुत HCV सर का जवाब:

इस पर वर्मा सर ने बताया कि, “सब कुछ brain driven है और यह शिक्षा हमारे दिमाग़ को विकसित करने का एक साधन है , हम जो कुछ भी विषय आज पढ़ रहे’ हैं वह सीधे तौर पर भले ही हमारे पेशे में काम न आए लेकिन उस विषय को समझते हुये जो तार्किक क्षमता विकसित होती है हमारे भीतर, वह क्षमता ही आगे चलकर हमे चीजों को समझने, समझाने, सृजन करने और निर्णय लेने में मदद करती है| यह तार्किक क्षमता हमे नयी नयी परिस्थितियों से निपटने में मदद करती है|”

समाज को लेकर कुछ बातें जो कार्यशाल में सामने आयीं:

  • धरती मेरी है तो इसे बचाने की ज़िम्मेदारी भी मेरी 
  • आज के समाज में बहुत दिक्कतें बढ़ गई हैं क्योंकि सफलता के मापदंड बढ़ गए हैं और सच्चाई के ऊपर दिखावे और झूठी प्रतिष्ठा को मान मिल रहा है| 
  • आनंद सबसे आगे नहीं, सबके साथ चलने मे है| 
  • जैसे हम खुद के लिए पौष्टिक आहार तलाशते हैं वैसे ही हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम बच्चों को सही और संतुलित शिक्षा दें|
  • कोचिंग और ट्यूशन का महत्व बढ़ा हुआ है क्योंकि आज सफलता/प्रतिष्ठा का मापदंड अंक बने हुये हैं|
  • ये अन्याय है बच्चों के साथ कि हम उन्हे अधिक से अधिक अंक लाने की ओर धकेल रहे हैं और उनकी स्वतंत्र सोच पर काम नहीं कर रहे
  • आप ऐसे ही समझिए कि शुरुआत में बच्चों का दिमाग़ कितना तेज होता है कि वह एक भाषा सीख लेते हैं हजारों शब्द याद कर लेते हैं,  लेकिन अंक लाने की अपेक्षाओं का दबाव उनके विकाश की प्रकृतिक प्रक्रिया को बाधित कर देता है|
  • एआई के चलते निर्णय लेने और सोचने-समझने की क्षमता की जरूरत और बढ़ जाएगी
  • कांडपाल सर ने बताया कि त्रिभुवन सर का योगदान है हजारों पौधे लगाने में
  • अगर हम इस हवा इस माहौल इस पर्यावरण को स्वच्छ रखेंगे तो उसमें हमारे ही अपनों को सहजता और सुविधा होगी
  • स्वाभाविक रूप तो simple ही होता है

केएन जोशी सर ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अध्ययन में लेखन कौशल और गणनात्मक कौशल बहुत जरूरी

कार्यशाला का हिस्सा शिक्षकों के प्रश्नोत्तर का भी रहा|

कार्यशाला का प्रभाव ऐसा रहा कि संगीत शिक्षिका सुरभि पंत मैम ने भी कहा कि वाकई भौतिकी को हम जीवन के कई क्षेत्रों से जोड़ सकते हैं जैसे कि संगीत में, कंपन्न, आवृति और अनुनाद से|

कार्यशाला से जुड़े कुछ विडियो नीचे दिये गए लिंक से देखे जा सकते हैं 

पीएमश्री रा०क०इं०का० द्वाराहाट की छात्राओं द्वारा मन को सुकून देने लेने वाला गायन| https://www.youtube.com/watch?v=XOrKWeNIMIA
पानी से भरे गिलास या पारदर्शी बोतल के उस तरफ कलम की निब का उल्टा और सीधा दिखाई देना https://www.youtube.com/watch?v=Y9uzBinRul4&pp=0gcJCQoLAYcqIYzv
वायुदाब, घनत्व और तापमान पर HC वर्मा सर के विचार और विश्लेषण और साथ में उदाहरण प्रैशर कुकर का| https://www.youtube.com/watch?v=7dafkrhKUl8
छड़, उस पर टंगा झोला, बल और बल आघूर्ण, संतुलन के लिए विभिन्न बल और मांसपेशियों में तनाव https://www.youtube.com/watch?v=v7Z9SyvachY
ऊष्मीय गति या तापमान के बढ्ने से बढ़ता वायुदाब- अनुभव जी और मोहित सर https://www.youtube.com/watch?v=oD1yeAwIxOM
गिलास, सिक्का और कार्ड बोर्ड: जड़त्व या कुछ और? एक समीक्षा, एक एप्रोच- HC Verma सर https://www.youtube.com/watch?v=gWcPqAwL450
रुमाल से पाउडर के कण झड़ने का कारण जड़त्व से अलग- HC Verma सर https://www.youtube.com/watch?v=hDFvhuLTNzE
जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे- गायन सुरभि पंत मैम https://www.youtube.com/shorts/bf_QC6SEcKY

साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी के बारे में और जानने या सदस्य बनने के लिए ईमेल करें- sss.dbu@gmail.com  या संपर्क करें - 9528237575

पता- Kashmiri Colony, Niranjanpur, dehradun

कार्यशाला का समापन शामिल शिक्षकों को सहभागिता का प्रमाण पत्र उपलब्ध कराकर, धन्यवाद ज्ञापन और समूह फोटो से किया गया|


कई शिक्षकों ने कहा कि ऐसी कार्यशालाएँ होती रहें ताकि उनके अध्यापन और शिक्षण के तरीके मे बेहतरी होती रहे|

कार्यशाला से संबन्धित कुछ समाचार: 

https://www.thetoptennews.com/archives/32605

 

 

  • विज्ञान के साथ पर्यावरण भी

IAPT और Shiksha Sopaan की एक और पहल ( https://naest.shiksha-sopan.org/ ) - जिसके बारे में कार्यशाल में बात हुई, विद्यार्थियों को इसका लाभ जरूर लेना चाहिए:


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-लवकुश कुमार

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प्रस्फुटन (कहानी) - शीतल भट्ट

"एक मजेदार कक्षा के साथ, सीखने, खुलने, निखरने और बेहतरी के सफर पर एक संकोची लड़की के एक मुखर व्यक्ति बनने की कहानी" 

 

शालिनी बहुत ही चुपचुप रहने वाली लड़की है। पहले वह स्कूल में अक्सर अपना सिर नीचे ही रखती,वह कभी सवाल नहीं करती थी। समझ न आने में सर को बताती नहीं थी कि उसे समझ नहीं आ रहा है। उसके लिए स्कूल जाना सबसे बोझिल कामों में से एक था। स्कूल और वहां के माहौल ने उसकी तरफ कभी कोमल हाथ नहीं बढ़ाया, बचपन से ही टीचर के लिए डर और अपने साथियों द्वारा उसका मजाक बनाए जाने का ऐसा असर हुआ कि स्कूल उसके लिए किसी यातना शिविर सा बन गया।

वह हमेशा दबाव में रहती, डर उसके ऊपर इतना हावी हो गया था कि वह हमेशा डरी-डरी रहती। ऐसा करते-करते शालिनी ने आठवीं पास कर लिया। वह घर में बहुत खुश रहती, वहां वह सहज हो पाती। मां के साथ घर के काम में हाथ बटाती। स्कूल से आते ही मां को खोजते हुए खेतों में पहुंच जाती थी।

शालिनी को लगता स्कूल जाने से अच्छा यह होता कि वह अपनी मां के साथ घर और खेतों का काम कर पाती। लेकिन स्कूल तो जाना ही था,उससे बचना नामुमकिन सा था। अब उसका दाखिला बड़े स्कूल में हो गया। वह नौवीं में पहुंच गई थी। तमाम तरह की शंकाएं और उस स्कूल के बारे में सुनी बातें उसे रह रहकर डराती। वही डर में वह खुद को फिर से सहमा हुआ पाती जहां से वह अभी अच्छी से निकली भी नहीं थी। नया स्कूल सच में बड़ा था ,वहां बहुत सारे बच्चे थे। टीचर भी बहुत सारे।यह नजारा उसके लिए आश्चर्यजनक करने वाला रहा।

एक दिन उन्हें कक्षा में एक अध्यापक पढ़ाने आएं। सोमेश सर ,जो उन्हें सामाजिक विज्ञान पढ़ाते थे। पहली बार तो वह सर के व्यवहार को देखकर अचंभित हो गई कि कोई अध्यापक ऐसा भी हो सकता है। वह बच्चों से लगातार प्रश्न पूछने को कह रहे थे। बिना किसी डर के वह पहली कक्षा थी जहां शालिनी को राहत सी महसूस हुई।

सोमेश सर ने बहुत सारी बातें बताई। किताबें,समाज और साथ में स्कूल के पुस्तकालय की भी। शालिनी ने आज तक अपने जीवन में पुस्तकालय नहीं देखा था। सच बात तो यह थी कि पाठयपुस्तक के अलावा उसने कोई किताब देखी ही नहीं थी। सोमेश सर के मृदु और बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार का यह असर होने लगा कि शालिनी दबे पांव पुस्तकालय का रुख करने लग गई। वह सहमी सी जाती थी,एक कोने में जाकर बैठ जाती थी। उसके लिए वह पुस्तकालय किसी अजूबे से कम न था।टेबल पर बहुत सारी पत्रिकाएं बिखरी हुई थी। अलमारियों में बहुत करीने से किताबें लगी थी

दीवारों में बच्चों के हाथों से लिखे हुई कुछ लंबे से पोस्टर टंगे हुए थे। बाद में सर ने बताया कि यह दीवार पत्रिका है। जो वहां के बच्चों ने स्वयं बनाई है। इसमें कुछ भी लिख सकते हो,जिसे किसी किताब से नहीं उतारना बल्कि अपने भीतर की दुनिया में जो चल रहा है उसे कागज में उतारना है,बिना किसी संकोच के। उसे पहली बार महसूस हुआ कि बच्चों को भी स्कूल में सम्मान दिया जाता है। यहां कुछ न आने पर सिर्फ उन्हें मारा या डांट नहीं लगाई जाती बल्कि उनके हिस्से की दुनिया रचने की आजादी भी दी जाती है।

इस तरह से शालिनी सर के साथ धीरे धीरे घुलने मिलने लग गई। अब वह सर के सामने वाली बेंच में बैठी रहती। इंटरवल होते ही पुस्तकालय आ जाती। पत्रिकाएं पढ़ती। यह उसका पसंदीदा काम होने लगा। सोमेश सर के पढ़ाने का अंदाज सबसे निराला था। उनके कक्षा में सन्नाटा कभी भी जगह नहीं ले पाया,वहां बच्चों की हंसी, बच्चों के प्रश्न और विषय से संबंधी किसी बात पर अपनी बात रखते बच्चों का शोर कक्षा को जीवन्त बनाएं रखता था।हर किसी की बात सुनी जाती, बहुत बार तो ऐसा होता कि बच्चे सर की बात से सहमत नहीं होते, उसके एवज में स्वयं तर्क करने लगते, फिर भी पूरा माहौल खुशनुमा बना रहता। यह सब शालिनी को भीतर ही भीतर गुदगुदाता । उसने आज तक ऐसा दृश्य न देखा था न कभी कल्पना की थी। उसने एक ऐसे अध्यापक की कल्पना किसी सपने में भी नहीं की थी। उसका बालमन सर की तरफ आकर्षित होता जा रहा था। वह सोमेश सर ही थे जो उसे हर वक्त लाइब्रेरी में मिलते। शालिनी का यह पहला परिचय था पुस्तकों से। उसे किताबों की रंग बिरंगी दुनिया अपनी सी लगती। वहां कोई उसे उसकी कमजोरी से नहीं आंकता था, बल्कि अपनी क्षमताओं से मिलाता।सोमेश सर बच्चों के विचार व्यक्त करने और पढ़ने के बहुत पक्ष में रहते,यही कारण था कि बच्चों की चहलकदमी सर के आस पास बनी रहती।

एक दिन शालिनी इंटरवल में लाइब्रेरी में बैठी थी, तब ही स्कूल में बनने वाली दीवार पत्रिका के लिए नए संपादक मंडल का चुनाव हो रहा था। सर ने शालिनी से भी पूछा कि क्या वह भी संपादक मंडल की सदस्य बनना चाहेगी।सर के सामने वह सिर्फ हां बोल पाई थी। लेकिन उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे लगा हां यही तो चाहती थी वो। उसके बाद उसका लेखन शुरू हो गया। जिसे सोमेश सर ने काफी सराहना शुरू किया। इसका असर यह होने लगा कि सर की कक्षा में उसका डर निकलने लगा। वह सभी चीजों में बढ़ चढ़ के प्रतिभाग करने लगी। सर के सिखाने का ही तरीका था कि उसके भीतर कभी गौरवबोध नहीं आया। सोमेश सर सभी बच्चों को एक समान मानते। किसी को सिर्फ इसलिए तवज्जो नहीं देते थे कि वह अच्छा बोलता है या पढ़ने में अच्छा है। वह बच्चों की तरफ से आने वाली शिकायत में भी तटस्थ बने रहते। उन्हें कभी शालिनी ने किसी की तरफदारी करते नहीं सुना। हालांकि वह बच्चों के लेखन को सार्वजनिक रूप से सराहते। शालिनी को अब पढ़ने में आनंद आने लगा,सामाजिक विषय उसका पसंदीदा विषय बन गया। उसे सोमेश सर के पढ़ाने का बेसब्री से इंतजार रहता।वह एक दिन भी घर में नहीं रहती,रोज स्कूल में जाती,अब वह पहले से ज्यादा चीजों को सीखने की कोशिश करती।

शालिनी धीरे धीरे आत्मविश्वास से भरने लगी थी। वह किसी न किसी बहाने से सर के आस पास रहती,उनसे बातें करती। सर का स्नेह ही था जो उसे सीखने को प्रेरित कर रहा था।अब उसने अपने आस पास समाज को ज्यादा  बारीकी से देखना शुरू कर दिया। सर ने उसकी यह भ्रांति भी तोड़ी कि सिर्फ स्कूल की चारदीवारों के भीतर और पाठयपुस्तकों से ही सीखा जाता है। वह किताब को समाज से जोड़कर पढ़ाया करते थे। उनमें अक्सर गांव के गरीब व्यक्ति की कहानी, सस्ते गल्ले की दुकान वाले का इंटरव्यू , अगर आप प्रधानमंत्री बन गए तो क्या करोगे, इस तरह के विषय शामिल रहते। इन सबको वह बड़ी ईमानदारी से करती।

उसे सर को दिखाने का उतावलापन रहता, उसने कैसा लिखा है करके। स्कूल पहुंचकर वह सबसे पहले लाइब्रेरी की ओर देखती कि सर आएं हैं या नहीं। जो विषय आज तक उसे रटने वाला और उबाऊ लगता था उसे सोमेश सर ने सबसे मजेदार बना दिया था। स्कूल अब उसके लिए दबाव नहीं बल्कि उत्सुकता का केंद्र बन गया। सोमेश सर उसकी जिंदगी में न आएं होते तो उसके जीवन में जो यह बदलाव आ रहे थे ,वह कभी नहीं आ पाते। उसने अब लोगों की बातों को नजरअंदाज करना सीख लिया था। वह बाकी विषयों में भी ध्यान लगाने लगी थी। 10वीं में वह अच्छे अंकों से पास हो गई थी। जबकि उसके घर वालों को यह डर था कि कहीं वह फेल न हो जाएं। विषय में रुचि बढ़ने के कारण उसने 11वीं में भी मानविकी विषय लिए। जिसके लिए उसे घर में भी काफी संघर्ष करना पड़ा। घर वाले चाहते थे लड़की साइंस ले, लेकिन दिल तो मानविकी विषयों में अटक गया था।

जबरदस्ती वो विज्ञान पढ़ भी नहीं पाती। फिर भी कुछ दिन विज्ञान पढ़ने गई, एकदम वह उदास पड़ने लग गई। सोमेश सर की कक्षा उसे रह रहकर याद आती,उसका वहां न होने का विचार उसे उदास कर जाता। उसने किसी से बात करना छोड़ दिया था। घर में भी किसी से बात नहीं करती थी। एक दिन हताश होकर वह स्कूल से जाते ही बिस्तर में जाकर सो गई, कंबल के अंदर मुंह छिपाकर रोती रही। उस रात घर वालों के बहुत मनाने पर भी उसने खाना नहीं खाया। उसकी जिद्द के आगे घर वालों को हार माननी पड़ी। दूसरे दिन सुबह स्कूल जाते वक्त पापा ने उसे मानविकी पढ़ने की इजाजत दे दी। वह दिन उसके लिए किसी उपलब्धि की तरह था। मानो उसने अपनी कोई जरूरी मांग मनवाई हो। इस तरह उसने मानविकी में अपना एडमिशन लिया। वह खुश तो थी, लेकिन उसके सभी साथियों ने विज्ञान विषय ले लिए थे। वह अकेली पड़ गई थी। बाकी जो थे वह अभी उसके लिए नए थे। पूरे स्कूल में एक तरह की हवा फैल गई कि शालिनी ने मानविकी ले ली। वह भी सोमेश सर के विषय के कारण। घर जाते वक्त उसके कुछ साथियों ने कहा भी था यह पागल हो गई है, सोमेश सर ने इसमें काला जादू कर लिया है।

जहां सब विज्ञान पढ़ रहे हैं और यह कला वर्ग में जा रही है। पहले पहले उसे यह बताने में शर्म सी आती या संकोच होता की वह कला वर्ग की छात्रा है।लोग भी उसे शक की नजरों से देखते। बाकी धीरे धीरे उसे वहां वहीं सुकून मिलने लगा था, जिसके लिए उसने संघर्ष किया था। सोमेश सर राजनीति विज्ञान पढ़ाते। वह लाइब्रेरी जाने लगी। लिखना,पढ़ना दोनों साथ साथ चलता रहा। उसे याद है एक बार सर ने उसे "आजादी मेरा ब्रांड" पुस्तक पढ़ने को दी,जो अनुराधा बेनीवाल का यात्रा वृतांत है। उसे पढ़कर उसे बहुत आजादी का अनुभव हुआ। जहां पहले वह कहीं भी अकेले जाने से डरती थी,अब उसने अकेले चलना शुरू कर दिया। उसने इस पुस्तक की समीक्षा भी लिखी। जिसे काफी सराहना मिली।

इस तरह पढ़ना लिखना उसकी आदतों का हिस्सा बन गया। 12वीं तक वह लगातार सोमेश सर से पढ़ती रहीं और चीजों को जानती रही। लिखना पढ़ना उसके पसंदीदा कामों में एक बन गया।सोमेश सर का ही असर था कि शालिनी के व्यवहार में बहुत सकारात्मक परिवर्तन आएं। बाकी विषयों में भी उसने मन लगाकर पढ़ना शुरू किया।

एक बार जब वह इंटरवल के बाद होने वाली क्लास में थोड़ी देरी से पहुंची तो इंग्लिश के अध्यापक ने उसे बुरी तरह डांटते हुए कहा कि तुम्हारा यही रवैया रहा तो तुम इंग्लिश में फेल हो जाओगी। यह सुनकर वह सहम गई और चुपचाप अपनी जगह में जाकर बैठ गई। जब 12वीं का रिजल्ट आया तो शालिनी न सिर्फ अंग्रेजी में उत्तीर्ण हुई थी बल्कि बहुत अच्छे नंबर लेकर आई। यह देखकर उसके आंखों में आंसू आ गए । यह पल उसके लिए भावुक करने वाला था। यह सिर्फ परीक्षा का ही रिजल्ट नहीं था , शालिनी के टूटने, बिखरने बनने, सीखने, अपने डर से लड़ने, खुद को लेकर हीन भावना से निकलने का सफर था। उन सभी लोगों की उपेक्षाओं के बावजूद सोमेश सर की अपेक्षाओं ने उसे बचा लिया था। सोमेश सर ने अपने प्रेम और मृदु स्वभाव से न सिर्फ पढ़ने को रुचि में बदल दिया बल्कि कभी भी किसी प्रश्न का जवाब नहीं बताते थे, बल्कि स्वयं खोज लाने को कहते थे। जिससे बच्चों को स्वयं जूझना पड़ता। इसी ने शालिनी को मजबूत और स्वयं कुछ खोजने सीखने को उत्साहित किया।

 

-शीतल भट्ट


 

शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


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गणतंत्र दिवस और संविधान के मायने (एक समीक्षा) - सौम्या गुप्ता

पहले जब छोटी थी तो 26 जनवरी मुझे सिर्फ लड्डू खाने का दिन लगता था और यह पता था कि संविधान इस दिन लागू हुआ था, लेकिन जब बड़ी हुई और मैंने संविधान को कुछ हद तक समझा और यह जाना कि संविधान बनाने के पीछे कितने लोगों की मेहनत लगी है और उससे भी पहले कितने लोगों को इसके लिए कितना बलिदान करना पड़ा है और इसके पीछे कई  दार्शनिक मूल्य हैं तब यह जानकर मेरे लिए संविधान के प्रति बहुत आदर बढ़ गया है।

मुझे लगता है  कि यह आदर सिर्फ मेरे मन में ही नहीं होना चाहिए बल्कि जितने भी पढ़े लिखे और जागरूक लोग हैं जिनको संविधान के बारे में पता है उनको चाहिए कि वो दूसरों को इन चीजों के बारे में बताएं कि हमारे संविधान में क्या है? हमारे मूल अधिकार क्या है? हमारे कर्तव्य क्या हैं? इन सभी के बारे में लोगों को जागरूक किया जाए खासकर गांव वासियों और मुख्य धारा से कटे हुए तबके को, जिससे कि हम अपने संविधान के बारे में बेहतर और सूक्षमता से जान सकें और इस तरह से हम अपने संविधान के प्रति और गणतंत्र दिवस के प्रति आदर को व्यक्त करे। 

संविधान के बारे में जानना सिर्फ संविधान के बारे में जानना ही नहीं है, बल्कि उससे कहीं बढ़कर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना है, खुद को और अपने अधिकारों और दायित्यों को समझना है।

हमें पता होना चाहिए कि अगर हम एक गलत वोट कर रहे हैं तो उसका कितना बड़ा असर हमारे देश पर पड़ रहा है या हम वोट न करके क्या कर रहे हैं? उसका क्या असर हमारे देश पर पड़ता है? हमें पता होना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा कहाँ तक होती है? भारतीय संविधान में धर्म क्या है? महिलाओं के लिए क्या अधिकार है? स्वतंत्रता क्या है? हम अपने संविधान के अनुच्छेदों का दुरुपयोग न करें, उनका अच्छे से पालन करें, उनको हम बहुत अच्छे से समझें यह हमारे लिए बहुत ज़रूरी है।

हमारे संविधान निर्माता एक धर्म निरपेक्ष और समानता वाला भारत चाहते थे न कि ऐसा भारत जिसमें साम्प्रदायिक उन्माद हो, जो विज्ञान नहीं अंध विश्वास को महत्व दे, वो भारतवासी होकर नहीं बल्कि किसी क्षेत्र विशेष का होकर बोले।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत में ही है *हम भारत के लोग* और आज सच मे बहुत जरूरी है कि हम सही चीजें समझ पाये क्योंकि यही समझेंगे तो सही लोगों को शक्ति मिलेगी और उसी से ये देश बदलेगा। हमें साथ आने की जरूरत है हमें भारतवासी सबसे पहले होने की जरूरत है। आइए साथ मिलकर एक संकल्प ले कि जिन लोगों को संविधान के बारे में पता है वो दूसरों को समझाएंगे और जिनको नहीं पता वो पढ़ेंगे और समझेंगे।

आइए हम जिम्मेदारी ले अपने भारत को फिर से महान बनाने की, उसकी खोयी हुई प्रतिष्ठा वापस लाने की।

आइए गणतंत्र दिवस कुछ ऐसे मनाए, 

कि हर दिन गणतंत्र दिवस बन जाए। 

गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।


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सोनम वर्मा - लेखिका परिचय

उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया  तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|

आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|

आशा है की आपकी रचनाएँ पाठकों को स्पष्टता देंगी और उन्हें समाज में व्याप्त दिक्कतों के प्रति संवेदनशील बनायेंगी |  

शुभकामनाएं 

सम्पादक


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ICON इंटरनेशनल स्कूल का वार्षिक उत्सव 2025 और एक प्रेरणा, विश्वास और उत्कृष्टता की यात्रा का आगाज

 “एक इंसान कैसा नागरिक बनेगा ये निर्भर करता है उसे मिलने वाले महौल से, ये माहौल घर का भी होता है और उसके स्कूल/कॉलेज  का भी |”

                    (मुख्य अतिथि माननीय विधायक श्री मयूख मेहर जी और निदेशक श्री गिरीश पाठक जी के कर कमलों  से दीप प्रज्वलन)

 

स्कूल या विद्यालय हम विद्या अर्जन के लिए जाते हैं, जहां विद्या अर्जन केवल सैद्धांतिक पक्ष नहीं, यह व्यवहारिक पक्ष भी लिए हुये है, जिसमे स्वयं और दुनिया को समझने, चीज़ें कैसे काम कर रहीं और जीव की वृत्तियाँ क्या हैं इनको समझने के साथ एक तार्किक और उदार सोंच विकसित करना भी शामिल है ताकि हम विभिन्न विषयों मे निपुण होकर रोजगार के काबिल बन सकें |

 

                                                                      (विशिष्ट अतिथि श्री आशीष कुमार, commandant 55 Bn SSB Pithoragarh )

एक सिस्टम को सुचारु रूप से चलाने के लिए और स्थायित्व बनाए रखने के लिए हमे जरूरत होती है, जिम्मेदार, साहसी, उदार और लोगों मे सामंजस्य बैठाकर चलने वाले लोगों (कार्यबल) की, इसके लिए विद्यालय मे विभिन्न गतिविधियों द्वारा बच्चों को जीवन के लिए तैयार किया जा सकता है, सत्यनिष्ठा और संवेदना भी विद्यालय के दिनो से ही विकसित की जाए तो काम आसान हो जाए| न्याय, गरिमा, स्वतन्त्रता और सच्चाई की राह पर चलते रहने के साहस के लिए जरूरी स्पष्टता भी इसी वक़्त से प्रदान की जाए तो बेहतर रहता है |

बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं, दुनिया के  यह बच्चे शारीरिक रूप से स्वस्थ हों, मानसिक रूप से मजबूत, होनहार/काबिल, संवेदनशील, प्रगतिवादी और जुझारू हों, साथ ही वो अपने जीवन की उच्चतम संभावनाओं को पा सकें, अपने अंदर छिपी असीम शक्ति और क्षमता को समझ सकें इसके लिए इन्हें उचित पोषण के साथ सही माहौल, अभ्यास, संगति और ट्रेनिंग की भी जरूरत होती है|   

बच्चे अपनी शुरुआती जीवन का अच्छा खासा समय स्कूल में देते हैं, वह भी बच्चों के साथ, जिसका एक अलग ही महत्व है, क्योंकि हमारे आस पास जब लोग कुछ सीख रहे हों तो, हमारे द्वारा भी सीखने की इच्छा बढ़ जाए, ऐसी काफी संभावनाएं रहती हैं, कुछ विशेष गतिविधियों के द्वारा हम उनमें ऐसे गुण डाल सकते हैं जो उन्हें भविष्य के अवसरों और संघर्षों के लिए तैयार कर सकते हैं और सबसे खास कि उनमें ऐसी आदतें विकसित कर सकते हैं जिससे उनका एक-एक दिन सार्थक हो पाएगा और बेहतर मानवीय संबंधों के साथ उचित प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर वो आनंदमय और उत्कृष्ट जीवन जी पाएंगे|

साथ ही कुछ और गुण जो विद्यालय मे विकसित किए जा सकते हैं, विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा यथा :

साहस, मैत्री भाव, अनुशासन,  नेतृत्व क्षमता, धर्म निरपेक्ष दृष्टिको,  साहसिक कार्य तथा खेल भावना और निःस्वार्थ सेवा का आदर्श, साहचर्य और अनुशासन का विकास, सहिष्णुता, सहभागिता,स्वावलम्बन व स्वदेश-प्रेम, स्वच्छता,पर्यावरण संरक्षण, समानता का भाव, अध्यापकों, सहकर्मियों एवं कनिष्ठों का सम्मान, लैंगिक संवेदीकरण के मूल्य, कमजोर वर्गों के प्रति संग का भाव एवं सहानुभूति (करुणा) इत्यादि,

हाल ही सोर घाटी पिथौरागढ़ के आइकन इंटरनेशनल स्कूल के वार्षिक उत्सव में काफी कुछ ऐसा देखने के लिए मिला कि ऊपर वर्णित उद्देश्यों की पूर्ति के रास्ते पर चलता एक संस्थान मिल गया हो:

जैसा की Icon International School Pithoragarh के निदेशक श्री गिरीश पाठक जी अपने संदेश मे कहते हैं कि

“ हमारा मुख्य उद्देश्य सभी बच्चों के लिए सीखने, बढ़ने और विकसित होने के लिए एक गतिशील वातावरण बनाना है। हम मुख्य रूप से शिक्षण के साथ विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से सीखने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। हमारी विशेषता बेहतर भविष्य के लिए वैश्विक और प्रेरणादायक नागरिक बनाना है। हम बच्चों के सर्वांगीण विकास और आत्म-प्रेरणा, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास पर ध्यान केंद्रित करते हैं। बच्चों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करना हमारे लिए अत्यंत प्रसन्नता का विषय है। हम आपके प्रियजनों के लिए एक सकारात्मक और ऊर्जावान वातावरण बनाते हैं और उन्हें उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए तैयार करते हैं।

हमारे अनुसार प्रत्येक बच्चा एक बीज के समान है जिसमें उचित मार्गदर्शन और स्नेह से पोषित होने पर बढ़ने की क्षमता होती है। आज हम पिथौरागढ़ शहर के एक प्रतिष्ठित और तेजी से विकसित होते शैक्षणिक संस्थान के रूप में स्थापित हैं। वर्ष दर वर्ष हमारे सभी कर्मचारियों और छात्रों के प्रयासों ने विद्यालय को उत्कृष्टता की ओर अग्रसर किया है। हमारे पास एक गतिशील और मेहनती संकाय है जो छात्रों के लाभ के लिए शिक्षा में समर्पित है। हमारा वादा है कि हम आपके बच्चों को न केवल सफल इंसान बनाएंगे बल्कि अच्छे इंसान भी बनाएंगे। अंत में, हम उन सभी अभिभावकों को धन्यवाद देना चाहते हैं जिन्होंने हमारे संस्थान और इसके आदर्शों पर विश्वास जताया है। हम आपको आश्वस्त करते हैं कि आपके प्यारे बच्चे सुरक्षित हाथों में हैं। हमारा संपूर्ण स्टाफ विद्यालय के मूल्यों को समझता है और बच्चों को प्रोत्साहित करने में सहयोग करता है, और हमें विश्वास है कि बच्चे आपको और हमें गौरवान्वित करेंगे। एक बार फिर, आइकॉन परिवार में आपका स्वागत है। ”

बात को और बेहतर तरह से समझने को कुछ गतिविधियों का जिक्र जरूरी है, दर्शकों में से एक, आरती जी बताती हैं कि कार्यक्रम स्थल पर प्रवेश करते ही मेहमानों का स्वागत करने का दायित्व भी बच्चों का ही था, इस बात ने आरती जी को प्रभावित किया और वो चमकती आंखों के साथ प्रसन्नता के भाव के साथ कहती हैं कि इस तरह ये बच्चे अभी से निःसंकोच होकर लोगों का अभिवादन करना सीख पायेंगे और एक उल्लास, उम्मीद, महत्वपूर्ण महसूस कराने वाली और अपनेपन की भावना का संचार करने वाली मुस्कान के साथ मानवीय रिश्तों को वो आधार देना सीख पायेंगे जिस पर टिके रिश्ते में इंसान एक से एक बड़े कार्य कर जाता है और नए रिकार्ड बना डालता है।

वह आगे कहती हैं कि कार्यक्रम के मंच संचालन का कार्य भी बच्चों ( छात्र-छात्राओं ) ने ही किया जो मन बांध लेने वाला था, इस तरह सक्रिय भागीदारी से बच्चों में स्पष्टता, आत्मविश्वास, समझ, समन्वय क्षमता, स्थितियों से निपटने, धैर्य, टिके रहने कि क्षमता विकसित होगी, साथ ही वो विभिन्न गतिविधियों के महत्व को समझ पाएंगे और विभिन्न संस्थाओं के महत्व और योगदान को समझ पाएंगे|

एक और गेस्ट (अभिभावक) और पिथौरागढ़ एयरपोर्ट पर अधिकारी श्री सुनील वर्मा जी कहते हैं कि विभिन्न गतिविधियां बच्चों कि समझ को व्यापक करेंगी और साथ ही वह बताते हैं की वार्षिक उत्सव के प्रांगण मे एक विज्ञान के प्रोजेक्ट और किताबों का स्टॉल भी लगा था जहां से बच्चों के लिए साइन्स की किट के साथ साहित्य अध्ययन और पुस्तक पढ़ने कि आदत डालने के लिए आकर्षक और ज्ञानवर्धक पुस्तकों को किफ़ायती कीमत पर खरीदा जा सकता था | साथ हे कर्राटे सरीखी गतिविधियों का प्रशिक्षण बच्चों को आत्म रक्षा के लिए तैयार करेगा और ISRO सरीखी अग्रणी संस्थाओं पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम बच्चों को और जागरूक तथा उत्साहित और प्रेरित करेंगे |

कला और विज्ञान का यह संगम वाकई प्रशंशनीय है |

अभिभावकों मे ही एक श्री संदीप यादव जी जोकि पेशे से पिथौरागढ़ एअरपोर्ट पर एयर ट्रैफिक कंट्रोल अधिकारी हैं, बताते हैं कि बच्चों द्वारा मंच संचालन उनकी झिझक को खत्म कर उन्हे आत्मविश्वास देगा, जो उन्हे जीवन मे आगे चलकर, चाहे वो व्यावसायिक जीवन हो या व्यक्तिगत जीवन, अपनी बात निर्भीक होकर रखने में साथ ही  लोगों से संवाद द्वारा जुड़ने में मदद करेगा | स्टेज पर कार्यक्रम मे प्रतिभाग करना अपने आपमे ही एक झिझक को कम करने वाली और व्यक्तित्व को निखारने वाली गतिविधि है |

विद्यालय प्रबंधन द्वारा समाज के गणमान्य व्यक्तियों को आमंत्रित कर बच्चों को संबोधित किया गया और उन्हे विभिन्न गतिविधियों द्वारा उनकी प्रतिभा के प्रदर्शन का मौका दिया गया, यह विद्यालय के वार्षिक उत्सव को सफल बनाता है और बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए एक बेहतर प्रयास को दिखाता है |

विद्यालय प्रबंधन से निम्नलिखित ईमेल पर संपर्क किया जा सकता है : iconschoolpithoragarh123@gmail.com


 

बच्चे संवेदनशील, साहसी, करूण और काबिल बने इसी अपेक्षा के साथ

ढेरों शुभकामनायें

  • लवकुश कुमार

    बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिकी मे स्नातक और आई आई टी दिल्ली से भौतिकी मे परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं।


    जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

    लेखक के विजन के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


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विद्यालय, महाविद्यालय, बालमन, युवाबल और शिक्षा : उद्देश्य तथा एक बेहतर नागरिक का निर्माण

स्कूल या विद्यालय हम विद्या अर्जन के लिए जाते हैं, जहां विद्या अर्जन केवल सैद्धांतिक पक्ष नहीं, यह व्यावहारिक पक्ष भी लिए हुये है, जिसमे स्वयं और दुनिया को समझने, चीज़ें कैसे काम कर रहीं और जीव की वृत्तियाँ क्या हैं इनको समझने के साथ एक तार्किक और उदार सोंच विकसित करना भी शामिल है ताकि हम विभिन्न विषयों मे निपुण होकर रोजगार के काबिल बन सकें |

एक सिस्टम को सुचारु रूप से चलाने के लिए और स्थायित्व बनाए रखने के लिए हमे जरूरत होती है, जिम्मेदार, साहसी, उदार और लोगों मे सामंजस्य बैठाकर चलने वाले लोगों (कार्यबल) की, इसके लिए विद्यालय मे विभिन्न गतिविधियों द्वारा बच्चों को जीवन के लिए तैयार किया जा सकता है, सत्यनिष्ठा और संवेदना भी विद्यालय के दिनो से ही विकसित की जाए तो काम आसान हो जाए| न्याय, गरिमा, स्वतन्त्रता और सच्चाई की राह पर चलते रहने के साहस के लिए जरूरी स्पष्टता भी इसी वक़्त से प्रदान की जाए तो बेहतर रहता है |

बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं, दुनिया के  यह बच्चे शारीरिक रूप से स्वस्थ हों, मानसिक रूप से मजबूत, होनहार/काबिल, संवेदनशील, प्रगतिवादी और जुझारू हों, साथ ही वो अपने जीवन की उच्चतम संभावनाओं को पा सकें, अपने अंदर छिपी असीम शक्ति और क्षमता को समझ सकें इसके लिए इन्हें उचित पोषण के साथ सही माहौल, अभ्यास, संगति और ट्रेनिंग की भी जरूरत होती है|   

बच्चे अपनी शुरुआती जीवन का अच्छा खासा समय स्कूल में देते हैं, वह भी बच्चों के साथ, जिसका एक अलग ही महत्व है, क्योंकि हमारे आस पास जब लोग कुछ सीख रहे हों तो, हमारे द्वारा भी सीखने की इच्छा बढ़ जाए, ऐसी काफी संभावनाएं रहती हैं, कुछ विशेष गतिविधियों के द्वारा हम उनमें ऐसे गुण डाल सकते हैं जो उन्हें भविष्य के अवसरों और संघर्षों के लिए तैयार कर सकते हैं और सबसे खास कि उनमें ऐसी आदतें विकसित कर सकते हैं जिससे उनका एक-एक दिन सार्थक हो पाएगा और बेहतर मानवीय संबंधों के साथ उचित प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर वो आनंदमय और उत्कृष्ट जीवन जी पाएंगे|

साथ ही कुछ और गुण जो विद्यालय मे विकसित किए जा सकते हैं, विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा यथा राष्ट्रीय सेवा योजना, राष्ट्रीय कैडेट कोर इत्यादि :

राष्ट्रीय कैडेट कोर के उद्‌देश्य

क. युवकों/युवतियों को सुयोग्य नागरिक बनाने के लिये उनमें चरित्र, साहस, मैत्री भाव, अनुशासन - नेतृत्व, धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण साहसिक कार्य तथा खेल भावना और निःस्वार्थ सेवा आदर्शों की विकसित करना।

ख- संगठित प्रशिक्षित और प्रेरित युवकों/युवतियों की एक ऐसी जनशक्ति का निर्माण करना जो सशस्त्र सेना सहित जीवन के क्षेत्र में नेतृत्व प्रदान कर सके और राष्ट्रीय सेवा के लिये सदैव तत्पर रहे।

  • देश के युवाओं में चरित्र, साहचर्य और अनुशासन का विकास
  • नेतृत्व, धर्मनिरपेक्षता, निस्वार्थ सेवा भाव का संचार करना।
  •  युवाओं में नेतृत्व की क्षमता विकरित करना तथा देश की सेवा के लिये सदैव तत्पर रहना ।
  • सशस्त्र सेना में जीविका प्राप्त करना ।

इस उद्देश्य का देश के विकास में क्या योगदान है?

यह उद्देश्य देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह युवाओं को मजबूत चरित्र, अनुशासन, और नेतृत्व गुणों से लैस करता है, जो देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए आवश्यक हैं। इसके साथ ही, यह सशस्त्र सेना में युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करके राष्ट्र की सुरक्षा में भी योगदान देता है।

आइए कुछ सवालों के माध्यम से बेहतर समझते हैं :

राष्ट्रीय कैडेट कोर का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?

राष्ट्रीय कैडेट कोर का प्राथमिक उद्देश्य युवाओं को सुयोग्य नागरिक बनाना, उनमें चरित्र, साहस, मैत्री भाव, अनुशासन, नेतृत्व और निस्वार्थ सेवा की भावना का विकास करना है। इसके अतिरिक्त, कोर सशस्त्र सेना सहित जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम एक जनशक्ति का निर्माण करने का भी प्रयास करता है।

राष्ट्रीय कैडेट कोर युवाओं को किन गुणों का विकास करने के लिए प्रोत्साहित करता है?

राष्ट्रीय कैडेट कोर युवाओं को चरित्र, साहस, मैत्री भाव, अनुशासन, नेतृत्व, धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण, साहसिक कार्य, खेल भावना और निस्वार्थ सेवा जैसे गुणों का विकास करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

राष्ट्रीय कैडेट कोर युवाओं को राष्ट्रीय सेवा के लिए कैसे तैयार करता है?

राष्ट्रीय कैडेट कोर युवाओं को प्रशिक्षित करके और उन्हें प्रेरित करके राष्ट्रीय सेवा के लिए तैयार करता है। यह उन्हें सशस्त्र सेना सहित जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व करने में सक्षम बनाता है, जिससे वे राष्ट्रीय सेवा के लिए सदैव तत्पर रहें।

अनुशासन को पाठ में किस प्रकार परिभाषित किया गया है?

पाठ में अनुशासन को दो तरह से परिभाषित किया गया है: पहला, अपनी अंतरात्मा द्वारा बताए गए ईश्वर के आदेशों का पालन करना, और दूसरा, उचित अधिकार द्वारा दिए गए मानवीय आदेशों का पालन करना। यह स्पष्ट करता है कि अनुशासन आत्म-त्याग की नींव है, जो एक बेहतर उद्देश्य के लिए आवश्यक है।

राष्ट्रीय सेवा योजमा

उद्देश्य - सामाजिक सेवा द्वारा व्यक्तित्व विकास

राष्ट्रीय सेवा योजना छात्र-छात्राओं के व्यक्तित्व में सहिष्णुता, सहभागिता, सेवाभाव, स्वावलम्बन वस्वदेश-प्रेम जैसे गुणों को समाहित करने का प्रयास करती है।

राष्ट्रीय सेवा योजना का सिद्धान्त वाक्य "मैं नहीं परन्तु आप" (NOT ME BUT YOU)

राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) का मुख्य उद्देश्य छात्रों को सामुदायिक सेवा और सामाजिक कार्यों में शामिल करना है। यह युवाओं को समाज के प्रति संवेदनशील बनाता है और उनमें जिम्मेदारी की भावना पैदा करता है। NSS स्वयंसेवकों को विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर काम करने का अवसर मिलता है, जैसे कि स्वच्छता, शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण। इसका उद्देश्य छात्रों को समाज के सक्रिय और जिम्मेदार नागरिक बनाना है।

आइए कुछ सवालों के माध्यम से बेहतर समझते हैं :

देश की एकता एवं अखण्डता आपके कर्त्तव्यों के सफल संचालन में निहित है।

एकता और अखंडता एक राष्ट्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वे समाज में सामंजस्य स्थापित करते हैं, जिससे सभी नागरिकों को समान अवसर मिलते हैं। एकता विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और धर्मों के लोगों को एक साथ लाती है, जबकि अखंडता राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा और संप्रभुता को सुनिश्चित करती है। यह देश की प्रगति और विकास के लिए आवश्यक है।

कर्त्तव्यों का सफल संचालन, व्यक्ति द्वारा अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी, समर्पण और कुशलता से पूरा करने को दर्शाता है। इसमें समय पर काम करना, निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करना और दूसरों के साथ सहयोग करना शामिल है। सफल संचालन से व्यक्ति और समाज दोनों को लाभ होता है, जिससे बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं और राष्ट्र का विकास होता है।
 

एक स्कूल/कॉलेज परिसर के बुनियादी मूल्य क्या होने चाहिए

1. समस्त विद्यार्थियों को समान रुप से उच्च शिक्षा प्रदान करना।

2. विद्यार्थियों में मानवीय मूल्यों को विकसित करना ।

3. परिसर को उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में विकसित करना।

4. विद्यार्थियों को उनके विषयों में सर्वोत्तम ज्ञान से परिपूर्ण करना।

5. सुनहरे भविष्य की प्राप्ति के लिये विद्यार्थियों की प्रतिभा का पता लगाना एवं विकसित करना।

6. विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के लिये उनकी पाठ्येत्तर प्रतिभाओं को उजागर करना।

एक उच्च शिक्षा के संस्थान से अपेक्षित उद्देश्य

  • परिसर में गुणवत्ता युक्त शिक्षण।
  • शोध एवं प्रोजेक्ट क्रियाकलापों में लगने एवं शामिल होने के लिये स्टाफ एवं विद्यार्थियों को प्रोत्साहन करना।
  •  राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सियों की सहभागिता से नये शोध के मागों को खोलना।
  • सेमिनारों। कार्यशाला। जागरुकता कार्यक्रमों का आयोजन करना ताकि शैक्षणिक वातावरण कायम किया जा सके|
  • विभिन्न विषयों के विद्यार्थियों के लिये विस्तार व्याख्यानों की व्यवस्थायें।
  • पुस्तकों, पत्रिकाओ, फर्नीचर एवं वाचनालय के आधुनिकी करण का प्रबन्ध प्रतियोगी परीक्षा अओं से सम्बन्धित कमजोर वर्गों में लिये उपचारात्मक कक्षायें।
  • कोचिंग परामर्श एवं प्लेसमेन्ट (नियुक्ति क साथ उन्हें सुविधा प्रदान करके उपलब्ध के रिटार के अवसरों के बारे में विद्यार्थियों में जागरुकता पैदा करना ।
  • परिसर को पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों को रोजगार देने के लिये अनुकरणीय संस्थान के रूप में विकसित करना।

आइए एक  सवाल के माध्यम से बेहतर समझते हैं :

इस पाठ में उल्लिखित 'अनुकरणीय संस्थान' की क्या भूमिका है?

इस पाठ में उल्लिखित 'अनुकरणीय संस्थान' पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों को बढ़ावा देने और रोजगार के अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों को रोजगार देने के लिए एक मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा, जो स्थायी विकास के लिए प्रतिबद्ध होगा।

मानवीय मूल्यों के विकास में एक विद्यालय/परिसर का महत्व -

1. विद्यार्थियों में समानता का भाव विकसित करना ।

2. अध्यापकों, सहकर्मियों एवं कनिष्ठों का सम्मान करना।

3. लैंगिक संवेदीकरण के मूल्यों को आत्मसात करना।

4. पेर्यावरण निर्वात एवं स्वच्छता के प्रति जागरुकता विकसित करना।

5. समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संग का भाव एवं सहानुभूति (करुणा) होना।–

आइए एक  सवाल के माध्यम से बेहतर समझते हैं :

मानवीय मूल्यों का विकास क्यों महत्वपूर्ण है?

मानवीय मूल्यों का विकास छात्रों को समाज में सकारात्मक योगदान देने के लिए आवश्यक गुणों को विकसित करने में मदद करता है। यह समानता, सम्मान, लैंगिक संवेदीकरण, और पर्यावरणीय जागरूकता को बढ़ावा देता है, जिससे छात्र दूसरों के प्रति अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बनते हैं।

संकलन - पब्लिक डोमैन मे उपलब्ध जानकारी, अकादमिक समझ और शैक्षिक परिसरों के भ्रमण से जुड़ा अनुभव 

- लवकुश कुमार


संकलनकर्ता और लेखक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिकी मे स्नातक और आई आई टी दिल्ली से भौतिकी मे परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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जानकारी 08.11.2025

संदर्भ- QS ranking

- शैक्षणिक संस्थाओं की रैंकिंग में गिरावट इस बात का संकेत है कि रिसर्च की गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेश के छात्रों को आकर्षित करने का माहौल और स्कॉलर टीचर अनुपात में हमारे टॉप इंस्टिट्यूट्स पिछड़े हैं। 

- हांगकांग यूनिवर्सिटी प्रथम आई, जबकि तीसरे स्थान पर सिंगापुर की दो यूनिवर्सिटीज रहीं। भारत का जीडीपी सिंगापुर और हांगकांग के मुकाबले क्रमशः नौ और दस गुना है।

- अमेरिकी सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी )

- पिछले महीने ही, पेरिस की एक अदालत ने पाया कि बहुराष्ट्रीय एकीकृत ऊर्जा और पेट्रोलियम कंपनी टोटलएनर्जीज़ ने यह दावा करके भ्रम पैदा किया था कि वह एनर्जी ट्रांजिशन में एक प्रमुख भूमिका निभा रही है। यूरोपीय संघ के उस कानून का हवाला देते हुए- जिसके अनुसार पर्यावरण संबंधी दावों के लिए उद्देश्यपूर्ण, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध और सत्यापन योग्य प्रतिबद्धताओं और लक्ष्यों का समर्थन आवश्यक है- अदालत ने पाया कि कंपनी की जलवायु संबंधी घोषणाएं हाइड्रोकार्बन में उसके विस्तारित निवेश के अनुरूप नहीं हैं। हालांकि कंपनी पर लगे जुर्माने अधिक नहीं हैं, लेकिन भविष्य में इनके बढ़ने की संभावना है- और इसीलिए यह निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

- एक निरंतर गर्म होती दुनिया में यह उम्मीद करना वाजिब है कि कुछ लोगों के खरीदारी के फैसले कंपनी की पर्यावरण संबंधी कार्रवाइयों से प्रभावित हो सकते हैं

- भारत दुनिया की अग्रणी कंपनियों के वैश्विक क्षमता केंद्रों के लिए एक पसंदीदा स्थान के रूप में अपनी स्थिति को अपनी बढ़ती घरेलू बौद्धिक पूंजी का एक संकेतक मानता

- जेन जी : सन 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी

- हिंद महासागर में मौजूद है मेडागास्कर 

- लवकुश कुमार 


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स और दस्तावेजों पर आधारित और जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित 


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं |

 

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