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1. कार्य तब किया जाता है जब किसी पिंड पर लगाया गया बल, पिंड को लगाए गए बल की दिशा में एक निश्चित दूरी तक ........................कर देता है। इसे बल और बल की दिशा में चली गई दूरी के गुणनफल से मापा जाता है, अर्थात W = F.S
2. दूसरे शब्दों में, कार्य बल और विस्थापन का ".................... गुणनफल" है। अतः यदि बल और विस्थापन एक-दूसरे के लंबवत हैं, तो उनका
अदिश गुणनफल शून्य होगा, जिससे W=0 होगा | या कारक द्वारा किया गया कार्य W, विस्थापन की दिशा में बल के घटक और विस्थापन के परिमाण का गुणनफल होता है।
3.यदि हम लगाए गए बल और विस्थापन के बीच एक ग्राफ बनाते हैं, तो F-s ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल ज्ञात करके किया गया ....................प्राप्त किया जा सकता है।
4.गतिमान आवेश पर चुंबकीय बल .................................... होता है, क्योंकि यहाँ बल गति की दिशा के लंबवत है।
5. स्प्रिंग सिस्टम - यदि किसी स्प्रिंग को उसके बिना खिंचे हुए विन्यास (सामान्य अवस्था) से थोड़ी दूरी तक खींचा या संपीड़ित किया जाता है, तो स्प्रिंग बाह्य कारक पर एक बल लगाएगी जोकि उसकी प्रत्यास्थता के चलते उत्पन्न होता है, जो इस प्रकार है: F = -kx, जहाँ x स्प्रिंग में संपीड़न (कम्प्रेशन) या दीर्घीकरण (elongation) है, k एक स्थिरांक है जिसे ............................. स्थिरांक कहते हैं| ऋणात्मक चिह्न दर्शाता है कि स्प्रिंग बल की दिशा " x " के विपरीत है (x मुक्त सिरे का विस्थापन है।)
6. उपरोक्त स्थिति में स्प्रिंग में संग्रहित स्थितिज ऊर्जा E= (1/2) k x^2 होगी। यह स्पष्ट है कि E, खिंचाव या संपीडन के ........................के समानुपाती होता है। इसलिए यदि खिंचाव "x" के लिए ऊर्जा "E" है, तो "3x" के लिए ऊर्जा 3^2E अर्थात् "9E" होगी।
7. बल या स्प्रिंग स्थिरांक (नियतांक) का मान स्प्रिंग की बिना खिंची हुई लंबाई और स्प्रिंग के.......................... की प्रकृति (प्रत्यास्थता गुणांक)पर व्युत्क्रमानुपाती रूप से निर्भर करता है।
ऊर्जा
किसी पिंड की ऊर्जा उसकी कार्य करने की क्षमता होती है। ऊर्जा को कार्य की इकाई, अर्थात् जूल या erg या वाट या किलोवाट, में मापा जाता है।
यांत्रिक ऊर्जा दो प्रकार की होती है: गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा।
गतिज ऊर्जा
8. किसी पिंड द्वारा अपनी ....................के कारण धारण की गई ऊर्जा को उसकी गतिज ऊर्जा कहते हैं। m द्रव्यमान और v वेग वाली किसी वस्तु के लिए, गतिज ऊर्जा निम्न प्रकार से दी जाती है: K.E. = ( 1/2 ) mv^ 2
स्थितिज ऊर्जा
किसी पिंड द्वारा अपनी स्थिति या अवस्था के कारण धारण की गई ऊर्जा को उसकी स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।
स्थितिज ऊर्जा के दो सामान्य रूप हैं: गुरुत्वाकर्षण और प्रत्यास्थ।
इसे निम्न प्रकार से व्यक्त किया जाता है: P.E. = mgh, यह एक सापेक्ष मान है, इस स्तिथि में ऐसा माना गया है कि की पृथ्वी के सतह पर स्थितिज उर्जा शून्य है |
जहाँ m —> पिंड का द्रव्यमान
g —> पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वाकर्षण के कारण त्वरण। h —> पिंड को ऊपर उठाए जाने की ऊँचाई ( यह सूत्र तब है उपयोगी है जब h का मान पृथ्वी की त्रिज्या की तुलना में बहुत कम हो अन्यथा हमें g के मान में परिवर्तन का संज्ञान भी लेना होगा )
स्प्रिंग के लिए ऊपर वर्णित ऊर्जा प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा का एक उदाहरण है।
कार्य-ऊर्जा प्रमेय
9. कार्य-ऊर्जा प्रमेय के अनुसार, किसी पिंड पर बल द्वारा किया गया कार्य, पिंड की .................................ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है। KE- गतिज उर्जा
W (कार्य ) जहाँ W= KE_2 – KE_1, जोकि परिवर्तन को अंतिम मान (स्थिति-2) घटा प्रारंभिक मान (स्थिति-1) के रूप में परिभाषित किया जाता है।
ऊर्जा संरक्षण का नियम-
10. ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार, एक विलगित (आइसोलेटेड) निकाय की कुल ऊर्जा में ...............................नहीं होता है।
11. ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में ...................हो सकती है, लेकिन एक विलगित निकाय की कुल ऊर्जा स्थिर रहती है।
12. ऊर्जा का न तो सृजन किया जा सकता है, न ही .....................।
कणों के बीच टकराव को मोटे तौर पर दो प्रकारों में विभाजित किया गया है।
(i) प्रत्यास्थ टकराव (ii) अप्रत्यास्थ टकराव।
प्रत्यास्थ संघट्ट (elastic collision)
दो कणों या पिंडों के बीच संघट्ट को प्रत्यास्थ कहा जाता है यदि निकाय का रैखिक संवेग और गतिज ऊर्जा दोनों संरक्षित रहते हैं।
अप्रत्यास्थ संघट्ट (inelastic collision)
यदि निकाय का रैखिक संवेग संरक्षित रहता है, लेकिन उसकी गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं होती है, तो संघट्ट को अप्रत्यास्थ कहा जाता है।
उदाहरण: जब हम गीली पुट्टी की एक गेंद को फर्श पर गिराते हैं, तो गेंद और फर्श के बीच संघट्ट एक अप्रत्यास्थ संघट्ट होता है।
संघट्ट को एकविमीय कहा जाता है, यदि टकराने वाले कण, संघट्ट से पहले और बाद दोनों समय एक ही सरल रेखा पथ पर गति करते हैं।
• एकविमीय प्रत्यास्थ संघट्ट में, संघट्ट से पहले अभिगम (approach) का सापेक्ष वेग, संघट्ट के बाद पृथक्करण के सापेक्ष(रिलेटिव स्पीड ऑफ़ सेपरेशन) वेग के बराबर होता है।
13. प्रत्यास्थता गुणांक (e) को टक्कर के बाद पृथक्करण की सापेक्ष गति और टक्कर से पहले पहुँच की सापेक्ष गति के अनुपात के रूप में
परिभाषित किया जाता है। अतः पूर्णतः प्रत्यास्थ टक्कर के लिए e का मान .........................., पूर्णतः अप्रत्यास्थ टक्कर के लिए शून्य और अन्य टक्करों के लिए 0 और 1 के बीच होता है।
14. संरक्षी बल- किसी बल को संरक्षी कहा जाता है यदि एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाने में किया गया कार्य, अनुसरण किए गए................. पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि केवल गतिमान वस्तु की प्रारंभिक और अंतिम स्थिति पर निर्भर करता है।
संरक्षी बलों के उदाहरण हैं:
(i) गुरुत्वाकर्षण बल (ii) स्थिरवैद्युत बल (iii) चुंबकीय बल
15. असंरक्षी बल
किसी बल को असंरक्षी कहा जाता है यदि एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाने में किया गया कार्य अनुसरण किए गए पथ पर ................करता है।
असंरक्षी बलों के उदाहरण हैं: (i) घर्षण बल (ii) श्यान बल
नोट- ऊर्जा संरक्षण का नियम संरक्षी और असंरक्षी दोनों बलों पर लागू होता है।
16. संरक्षी क्षेत्र के लिए बंद पथ में कार्य ................होगा या संरक्षी बल के अधीन कार्य ................... होगा जबकि असंरक्षी क्षेत्र के लिए कार्य शून्य
नहीं होगा।
उत्तर : 1. विस्थापित, 2. अदिश, 3.कार्य,4. शून्य, 5. बल या स्प्रिंग, 6. वर्ग 7.पदार्थ, 8.गति, 9.गतिज, 10.कोई परिवर्तन,11.परिवर्तित,12.विनाश,13. 1, 14.पथ. 15.निर्भर, 16.शून्य,शून्य
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Best wishes
दिये की चमक से अँधेरे का सर भी झुक गया,
देखो, हर दहलीज़ पे ख़ुशियों का आसमान बिखर गया।
दिल में दबी कड़वी सी बातों को आतिशबाज़ी में खो जाने दो,
रंगोली के रंगों सा हर दिल का रिश्ता हो जाने दो।
बहुत मुबारक हो आप सभी को इस दिवाली की,
घर-आँगन अपना ख़ुशियों से भर जाने दो।
दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ!
© आयुष पंवार, देहरादून
ईमेल- official96500@gmail.com
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शुभकामनाएं
“नमस्ते अंकल जी, पापा की तबीयत ठीक नहीं है| आप भीतर चलकर उनके कमरे में ही उनसे मिल लीजिए|”
“क्या बात है भई, आपके साहबजादे बड़े बदले-बदले से जान पड़ रहे हैं!” बेटे की ओझल होती पीठ पर नजरें गड़ाये हुए श्याम ने व्यंग्यपूर्वक अपने जिगरी मित्र रामलाल से पूछा|
“आओ श्याम! आखिर आज रास्ता भूल ही गए |”
पोता पानी और बेटा चाय-नमकीन लेकर एक ही साथ कमरे में प्रविष्ट हुए। चाय रखकर बेटे ने विनम्रता से कहा, “कुछ और तो नहीं चाहिए पिता जी?” बाहर जाते हुए पलटकर पुनः बोला, “ज्यादा देर नहीं बैठिएगा, पीठ में फिर से दर्द होने लगेगा|” कहते हुए पिता की कमर में बेल्ट बाँधकर चला गया|
श्याम ने अपनी छूट गयी बात को आगे बढ़ाया, “लगता है, दिवा- स्वप्न देख रहा हूँ मैं| पाँच-छह साल पहले तो यह साहब ऊँट-की-सी अकड़ी गर्दन लिए ...” श्याम के कुछ और अपशब्द कहने के पूर्व ही रामलाल ने ठहाका लगाया|
"आप हँस रहे हैं, किन्तु इस प्रकार से आपकी सेवा-शुश्रूषा होते देखकर, अभी-भी मैं बहुत अचंभित हूँ!”
“जड़ खोदकर ही मानोगे श्याम!”
“मैं भी तो जानूँ, आखिर बदल कैसे गए बरखुरदार?”
“बढ़ते बच्चों का बाप जो हो रहा है|” गहरी मुस्कान के साथ दोनों मित्र चाय सुड़कने लगे।
© सविता मिश्रा 'अक्षजा'
ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com
अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत हैं| आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|
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शुभकामनाएं
पत्नी और माँ के बीच होते झगड़े से तंग आकर बेटा माँ को ही नसीहतें देने लगा| सुनी-सुनाई बातों के अनुसार माँ से बोला- "बहू को बेटी बना लो मम्मा, तब खुश रहोगी|"
"बहू बेटी बन सकती है?" पूछ अपनी दुल्हन से|" माँ ने भौंह को चढ़ाते हुए कहा|
"हाँ, क्यों नहीं?" आश्वस्त हो बेटा बोला|
"बहू तो बन नहीं पा रही, बेटी क्या खाक बन पाएगी वह|" माँ ने गुस्से से जवाब दिया|
"कहना क्या चाहती हैं आप माँजी, मैं अच्छी बहू नहीं हूँ?" सुनते ही तमतमाई बहू कमरे से निकलकर बोली|
"बहू तो अच्छी है, पर बेटी नहीं बन सकती|"
"माँजी, मैं बेटी भी अच्छी ही हूँ| आप ही सास से माँ नहीं बन पा रही हैं|"
"मेरे सास रूप से जब तुम्हारा यह हाल है, माँ बन गयी तो तुम मेरा जीना ही हराम कर देगी।" सास ने नहले पर दहला दे मारा|
"कहना क्या चाह रही हैं आप?" अब भौंह तिरछी करने की बारी बहू की थी|
"अच्छा ! फिर तुम ही बताओ, मैंने तुम्हें कभी सुमी की तरह मारा, कभी डाँटा, या कभी कहीं जाने से रोका!" सास ने सवाल छोड़ा|
"नहीं तो !" छोटा-सा ठंडा जवाब मिला|
बेटा उन दोनों की स्वरांजली से आहत हो बालकनी में पहुँच गया|
"यहाँ तक कि मैंने तुम्हें कभी अकेले खाना बनाने के लिए भी नहीं कहा| न ही तुम्हें अच्छा-खराब बनाने पर टोका, जैसे सुमी को टोकती रहती हूँ|" उसे घूरती हुई सास बोली|
"नहीं माँजी, नमक ज्यादा होने पर भी आप सब्जी खा लेती हैं!" आँखें नीची करके बहू बोली|
"फिर भी तुम मुझसे झगड़ती हो! मेरे सास रूप में तो तुम्हारा ये हाल है| माँ बन, सुमी जैसा व्यवहार तुमसे किया, तो तुम तो मुझे शशिकला ही साबित कर दोगी।" बहू पर टिकी सवालिया निगाहें जवाब सुनने को उत्सुक थीं।
कमरे से आती आवाजों के आरोह-अवरोह पर बेटे के कान सजग थे| चहलकदमी करता हुआ वह सूरज की लालिमा को निहार रहा था|
"बस करिए माँ! मैं समझ गयी| मैं एक अच्छी बहू ही बनके रहूँगी|" सास के जरा करीब आकर बहू बोली|
"अच्छा!"
"मैंने ही सासू माँ नाम से अपने दिमाग में कँटीली झाड़ियाँ उगा रखी थीं| सब सखियों के कड़वे अनुभवों ने उन झाड़ियों में खाद-पानी का काम किया था|"
"सुनी क्यों! यदि सुनी भी तो गुनी क्यों?"
बेटे ने बालकनी में पड़े गमले के पौधे में कली देखी तो उसे सूरज की किरणों की ओर सरका दिया|
"गलती हो गई माँ! आज से उन पूर्वाग्रह रूपी झाड़ियों को समूल नष्ट करके, अपने दिमाग में प्यार का उपवन सजाऊँगी| आज से क्यों, अभी से| अच्छा बताइए, आज क्या बनाऊँ मैं, आपकी पसंद का ?" बहू ने मुस्कुराकर कहा |
"दाल भरी पूरी..! बहुत दिन हो गए खाए हुए।" कहते हुए सास की जीभ, मुँह से बाहर निकल होंठों पर फैल गई|
धूप देख कली मुस्कुराई तो, बेटे की उम्मीद जाग गयी| कमरे में आया तो दोनों के मध्य की वार्ता, अब मीठी नोंकझोंक में बदल चुकी थी|
सास फिर थोड़ी आँखें तिरछी करके बोली- "बना लेगी...?"
"हाँ माँ, आप रसोई में खड़ी होकर सिखाएँगी न!" मुस्कुराकर चल दी रसोई की ओर|
बेटा मुस्कुराता हुआ बोला, "माँ, मैं भी खाऊँगा पूरी|"
माँ रसोई से निकल हँसती हुई बोली, "हाँ बेटा, जरूर खाना ! आखिर मेरी बिटिया बना रही है न|"
© सविता मिश्रा 'अक्षजा'
ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com
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शुभकामनाएं
आदरणीय अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों पर प्रकाश डालते हुए या कहें कि ध्यान खींचते हुए एक शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपके सम्बन्ध में निम्नलिखित जानकारी उपलब्ध है जो पाठकों के लिए प्रासंगिक होगी ऐसा विश्वास है :
सृजन की विधाएँ : लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि।
प्रकाशित कृतियाँ: 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह।
अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित।
अनुवाद : 'अदहने क आखर' अवधी अनुबाद [लघुकथा-संकलन]
सम्पादन : 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश}
पुरस्कार : लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत |
आकाशवाणी आगरा से कहानी प्रसारित
कुछ लघुकथाएँ पंजाबी, उर्दू, नेपाली और उड़िया में अनूदित होकर प्रकाशित।
यू ट्यूब चैनल : 'savita mishra akshaja' और ‘साहित्य एक समुन्दर: 'अक्षजा' नाम से|
ब्लॉग: 'मन का गुबार' एवं 'दिल की गहराइयों से'।
ई-मेल: 2012.savita.mishra@gmail.com
मोबाइल: 09411418621
सभ्यताएँ तबाह हो जाती हैं क्योंकि वे अपने कवियों-साहित्यकारों की नहीं सुनती और उन्हें भ्रमित करने वालों के बताये रास्ते पर चलने लग जाती हैं |"
मिलकर रहने के बजाय लोग दस बहाने ढूंढ लेते हैं अलग अलग रहने के, एक दुसरे को नुकसान पहुंचाने के और इस तरह ले आते हैं अशांति माहौल में, लोगों के जीवन में और अपने जीवन में भी |
दीपक जी बाजार में मिले तो पीछे ही पड़ गए "आज तो चलना ही पड़ेगा, मेरा मकान देखने, बहुत इन्ट्रेस्ट से बनवाया है मैंने।" दीपक जी मेरे बॉस रह चुके हैं, अतः अनिच्छा से ही सही, जाना पड़ा।
मकान वाकई बहुत सुन्दर बनाया गया था। सुन्दर बगीचे वाला कम्पाउण्ड, अन्दर हर कमरे में चमचमाते मार्बल के फर्श, कीमती फर्नीचर, दीवारों पर महँगे वालपेपर्स, बेहद सुन्दर फॉल्स सीलिंग्स, एक्वेरियम, प्योर लेदर के सोफे, चमचमाते वॉशरूम देखकर मेरे मुख से अपने आप 'वाह' निकल गया और मन में ऐसा ही मकान बनाने की इच्छा बलवती होने लगी।
चाय पानी के बाद हम बाहर आए तो दीपक जी एकाएक बोले, "अरे तुमने बाईक उधर दाईं तरफ क्यों खड़ी की ? उधर वालों से हमारा झगड़ा है।" फिर घूमकर बाईं तरफ के मकान की ओर देखा तो पत्नी पर चिल्ला पड़े "नीमा, तुम्हारे सुखाए कपड़े उड़कर उस तरफ जा रहे हैं, संभालो उन्हें।" फिर कुछ संकोची स्वर से बोले "ये दाएं तरफ वाले भी ऐसे ही हैं, इनसे भी बोलचाल बन्द है हमारी। नब्बे लाख का मकान जो बना लिया है मैंने, नाते रिश्तेदार भी आज तक देखने नहीं आए, सब जलते हैं साले मुझसे। खैर, कैसा लगा मेरा बंगला ?" "बहुत खूबसूरत, बहुत शानदार" मैंने कहा। "तुमने एक बात नोट की, मैंने हर कमरे, यहाँ तक कि बरामदे में भी बिजली कनेक्शन के कई-कई प्वाइंट लगवाए हैं, ताकि किसी को किसी इन्स्ट्रुमेण्ट के चार्जिंग में कोई दिक्कत न हो, है न दूरदर्शी सोच मेरी।"
"बिल्कुल सही" मैंने कहा "काश बिजली के कनेक्शंस के साथ आपने सम्बन्धों के कनेक्शन भी जोड़े रखे होते तो डिस्चार्ज पड़े रिश्ते भी चार्ज हो जाते" कहना चाहता था मैं, पर कह न सका।
© संतोष सुपेकर ( सातवें पन्ने की खबर से साभार )
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )
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"क्या पापा ?" विवेक अचकचा कर बोला, "आप, बस स्टैण्ड से बोल रहे हैं? मगर आप लोग तो ट्रेन से आ रहे थे न ?"
"ट्रेन लेट हो गई थी बेटा, पर बाकी बातें बाद में करेंगे।" परमानन्दजी का हकबकाया-सा स्वर था, "तू तो जल्दी से हमको लेने बस स्टैण्ड पर आ जा, हम यहाँ खड़े हैं एटीएम के पास।"
विवेक हड़बड़ाया-सा बस स्टैण्ड पहुँचा तो परमानन्दजी ने सारी बात बताई, "बेटा, हम सब तो ट्रेन में अपने कोच में सो रहे थे, तभी बीना स्टेशन पर जोरदार हंगामा होने लगा, ढेर सारे जवान लड़के, जो किसी नौकरी की परीक्षा के लिए आये थे, जबरदस्ती हमारे कोच में घुस आये, सोये हुए यात्रियों को उठाने लगे, उनसे मार-पीट, झगड़ा करने लगे। कोच में सवार महिलाओं, लड़कियों से छेड़छाड़ करने लगे। हम सभी बेहद घबरा गये थे, तेरी बहन उस समय बाथरूम गयी हुई थी। हमारा दिमाग चला, उसे फोन कर वहीं से बाहर निकलने को बोला, हम दोनों भी जैसे-तैसे बाहर निकले, बस स्टैण्ड पहुँचे और बस पकड़कर यहाँ तक आये, पर पता नहीं...", परमानन्दजी ने जोरदार झुरझुरी ली, "बेचारे बाकी पैसेंजर्स के साथ क्या घटी होगी ?"
"ओऽऽह" घटना सुनकर विवेक के मुँह से ऐसे निकला जैसे गुब्बारे से हवा और उस पर हावी होने लगा चार साल पहले का अतीत, जब उसने भी बेरोजगारों की फौज के साथ मिलकर ऐसी ही एक ट्रेन में जोरदार हंगामा कर यात्रियों को आतंकित और त्रस्त कर दिया था। तब तो वह बच गया था पर आज खुद को कठघरे में पा रहा था।
© संतोष सुपेकर ( मधुरिमा (दैनिक भास्कर) से साभार )
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )
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शुभकामनाएं
कड़ाके की सर्दी की एक सुबह, रामकिशन जब घर लौटे तो देखा, बेटी अभी भी सो रही है, “अरे” उसे झिंझोड़ते हुए वे कुछ क्रुद्ध स्वर में बोले, “अनु, अभी तक सो रही है, साढ़े सात बज गये हैं, स्कूल नहीं जाना क्या?”
“क्या बाबा, आप भी ! सोने दो न, बोहोत ठण्ड है, आज से हमारे स्कूल का टाइम भी नौ बजे हो गया है।” रजाई में से अनु का उनींदा स्वर सुनाई दिया।
“और तू राजू” वे फिर छोटे भाई की ओर मुड़े, “तू भी अब तक पड़ा हुआ है, तेरा दफ्तर भी क्या…”
“हाँ भैया, कड़क ठण्ड के कारण आज से हमारा ऑफिस भी ग्यारह बजे खुलेगा।” राजकिशन का एक विजेता-सा स्वर रजाई में से उभरा।
“ओऽऽह” रामकिशन फीकी-सी मुस्कान से बड़बड़ाये, “तो इस जमा देने वाली सर्दी में सबके देर तक सोने का इन्तजाम हो गया है, सिवाय मेरे... खेत पर तो बिजली रात डेढ़ बजे ही आती है, चाहे कितनी भी कड़ी ठण्ड क्यों न पड़े, मुझे तो उठकर जाना ही है खेत पर, क्या करूँ किसान हूँ न…” उनींद और विजेता स्वर के बाद यह एक मजबूर नहीं, एक मजबूत स्वर था।
© संतोष सुपेकर (तरंग नई दुनिया, इंदौर से साभार )
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )
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शुभकामनाएं
कुछ दिन पहले टेलीविजन पर, अशान्त सरहदों पर मची मार-काट,
खून-खराबे के मध्य एक लोमहर्षक दृश्य देखा जो न सिर्फ याद रहा बल्कि एक
नयी चिन्तायुक्त सिहरन को भी जन्म दे गया...
इस दृश्य में युद्धग्रस्त, आतंकग्रस्त, शरणार्थी समस्याग्रस्त मुल्क का
एक विवश-अतिविवश पिता अपने छोटे बच्चे को सरहद की टूटी हुई बाड़ में
से पड़ोसी मुल्क की सरहद में छोड़ रहा था। ऐसा करते हुए उसकी आँखों में
प्रलय के आँसू थे। पिता से, मुल्क से बिछड़ते हुए नन्हे बालक का चेहरा ऐसा
हो रहा था कि क्रूरतम् व्यक्ति भी देखे तो फफककर रो पड़े...
ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई अपने जान से प्यारे बच्चे को किनारे से,
उफनते सागर में धकेल रहा हो, उम्मीद के खिलाफ इस उम्मीद में कि उफनते
सागर में तो कोई सम्भावना है बच्चे के बच जाने की, लेकिन किनारे पर मची
मार-काट, रक्तपात में तो उसका मारा जाना अवश्यम्भावी है।
हाहाकारी और अशान्त ऐसी कई सरहदें हैं दुनिया में ! मानवता की
कर्णबेधी और हृदयबेधी चीत्कार से उपजी मेरी इस चिन्तायुक्त सिहरन में शामिल
है, इन दृश्यों के आम होते जाने की चिन्ता...
© संतोष सुपेकर (नवनीत (मुम्बई) से साभार )
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )
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