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बेरोजगारी की जंजीरें और समाज (कविता) - गरिमा जोशी

हाय! यह बेरोज़गारी की जंजीरें
बड़ी कस के पकड़ लेती हैं,
लड़का हो चाहे लड़की,
ये जंजीरें सबको जकड़ लेती हैं!
एक बिन ब्याही लड़की, जो सबको खटकती है,
तैयारी का हवाला देकर वो मर-मर के जीती है।
“बस कुछ साल का मौका है तेरे पास”, यह कहकर बख्श दी जाती है!
दुनिया की आँखों में वो बस चुभती चली जाती है।
वहीं, दूसरी ओर, एक लड़का है; अब वो भी सबको खटकता है।
“कौन तुझे अपनी लड़की देगा?” यह कहकर आँखों में बड़ा चटकता है।
“तेरे पास लड़की से ज्यादा मौके हैं”, यह कहकर बख्श दिया जाता है,
पर दुनिया की नज़रों में तू थोड़ा कम सबको चुभता है।
एक लड़की, जो शादी से बचने के लिए पढ़ रही है,
वहीं वो लड़का शादी हो जाने के लिए पढ़ता है।
दोनों का मुद्दा एक ही है, वो है ‘बेरोज़गारी’,
पर दोनों की परिस्थिति अलग हैं, वो हैं खुद की लाचारी!
मैं तो कहती हूँ, लोग परिस्थिति देख कर हमें सम्मान देते हैं,
मानो एक साँप को शिवलिंग पर स्थान देते हैं।
शिवलिंग पर साँप दिखते ही लोग उस पर दूध और फूल चढ़ाते हैं,
वहीं साँप अगर घर में घुस जाए, लाठी-डंडों से उसे भगाते हैं।
था दोनों जगह साँप ही...
पर परिस्थिति ने रुतबा उसका बदल दिया।
मानो शिवलिंग पर चढ़ा साँप ‘रोज़गार’ में था,
और घर में आया साँप ‘बेरोज़गार’ बन गया।
बेरोज़गारी थी दोनों के लिए एक-सी,
मायने उसके सबने बदल दिए।
किसी के लिए वह अच्छी, तो किसी के लिए नासूर-सी बन गई।
हाय! यह बेरोज़गारी की जंजीरें
बड़ी कस के पकड़ लेती हैं,
लड़का हो चाहे लड़की,
ये जंजीरें सबको जकड़ लेती हैं!
- गरिमा जोशी

संपादकीय टिप्पणी - "कविता में प्रयुक्त शब्द प्रतीकात्मक हैं और समाज की दोहरी मानसिकता की तरफ ध्यान खींचने के प्रयोजन से उपयोग में लिए गए हैं, किसी भी इंसान की किसी भी भावना को आहत करने का कतई प्रयोजन नहीं है।" - लवकुश कुमार 


युवा रचनाकार गरिमा जोशी जी की लेखन शैली सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित होती है और वह समाज में मौजूद रूढ़िवादी सोच पर सवाल उठाती हैं। 

आप एक ऐसे न्यायपूर्ण और समानता वाले समाज का सपना देखती हैं जहाँ लिंग, जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो। 

कवयित्री से garimaji0814@gmail.com के जरिए संपर्क साधा जा सकता

है। रचनाकार के बारे में और जानने के लिए यहां पर क्लिक करें


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  kumarchetnapsw@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

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आगामी पुस्तक परिचर्चा(27वीं) 06 सितंबर 2026 के लिए लिंक

27वीं पुस्तक परिचर्चा | Kumar Chetna Manch × Literary Land Readers Club 

 

किताबें सिर्फ़ पढ़ी नहीं जातीं…
वे हमारे भीतर नए विचारों को जन्म देती हैं। 

इसी विचार-यात्रा को आगे बढ़ाते हुए कुमार चेतना मंच एवं लिटरेरी लैंड रीडर्स क्लब, कानपुर द्वारा आयोजित 24वीं पुस्तक परिचर्चा में आप सभी पुस्तक-प्रेमियों, पाठकों एवं साहित्य-रसिकों को सादर आमंत्रण। 

 दिनांक: 06 सितंबर 2026
समय: शाम 8:30 बजे
माध्यम: Google Meet
 लिंक -  https://meet.google.com/ntu-cpvm-miw

संपर्क:
9792492227 | 9795675065

 Website: kumarchetna.in
 Facebook: Literary Land Readers Club
 Instagram: https://www.instagram.com/_aksharam__?igsh=MWd3NHB2cnZlemtkbg==

YouTube: https://youtube.com/@literaryland_bft?si=OQjCkcOAJhVsx_R1
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आपकी सहभागिता ही इस पुस्तक-यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
 

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हर महीने की दस्तक (कविता)- गरिमा जोशी

मासिक धर्म, रजोधर्म, ऋतु चक्र हूँ।
कुछ के लिए महावारी हूँ, तो
कुछ के लिए लाल चक्र हूँ।

अंग्रेज़ी में कह दो मुझे, तो पीरियड्स मैं हूँ।
कुछ मान लेते हैं मुझे कि छूत भी मैं हूँ।

कहते हैं मुझे कि एक नारी का गहना मैं हूँ।
मैं ना अगर हूँ, तो फिर ना जाने क्या ही हूँ।

मिलता है सम्मान मुझे कहीं तो, जब मैं पहली बार आती हूँ।
पूजते हैं लोग उस नारी को, जहाँ भी मैं जाती हूँ।

मैं ना आऊँ, तो चिंता तुम्हारी बढ़ जाती है।
कहीं तो मेरे आते ही वो नारी नज़रों से हटा दी जाती है।
एक कोने में बैठे, आँखों से जुदा कर दी जाती है।
थाली भी उसकी बड़ी अलग कर दी जाती है।

चादर, कम्बल, यहाँ तक कि अपने बच्चे से भी वो
बिल्कुल अलग कर दी जाती है।

कहीं न जाने, न छूने की उसकी आदत कर दी जाती है।
मंदिर के दरवाज़े से वो पूरी ही आउट कर दी जाती है।

पूछती है वो नारी मुझे, “क्यों तुम हर महीने आ जाती हो?”
और मेरे न आने पर उस नारी की हालत
बड़ी ही टाइट कर दी जाती है।

सोचती हूँ मैं कभी-कभी, मेरे आने पर
क्यों वो नारी बिल्कुल अपवित्र कर दी जाती है?
पीछे से मुझे चेक करने की उसकी फ़ितरत कर दी जाती है।

हर महीने मैं आती हूँ, ये बताने कि
मैं एक नारी को पूरा करने आती हूँ।
पूरा कर उसे, फिर भी मैं अधूरा ही पाती हूँ।

हर महीने की दस्तक देना मेरा काम है,
पर एक सवाल मेरा तुमसे है-
कि जिस नारी को मेरे आने पर
तुम अपवित्र कहते हो,
उसी नारी की कोख से जन्म लेकर
फिर तुम पवित्र कैसे हो जाते हो?

मैं अभिशाप नहीं, प्रकृति का सबसे सुंदर सत्य हूँ।
मैं अपवित्र नहीं, सृजन की पहली सीढ़ी हूँ।
मुझे छूने से धर्म नहीं टूटता, मुझे समझने से समाज बनता है।

हर महीने की दस्तक देना मेरा काम है,
और हर महीने उस दस्तक का सम्मान करना तुम्हारा!

 - गरिमा जोशी 


युवा रचनाकार गरिमा जोशी जी की लेखन शैली सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित होती है और वह समाज में मौजूद रूढ़िवादी सोच पर सवाल उठाती हैं। 

आप एक ऐसे न्यायपूर्ण और समानता वाले समाज का सपना देखती हैं जहाँ लिंग, जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो। 

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शुभकामनाएं

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गरिमा जोशी - रचनाकार परिचय

युवा रचनाकार गरिमा जोशी जी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से हैं। उन्होंने भौतिकी में  परास्नातक और शिक्षा में स्नातक की उपाधि हासिल की है। वह पिछले पाँच वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही हैं। उनकी रुचियों में गाना, नृत्य, पेंटिंग करना सरीखी कलाएं, कविताएँ लिखना और पढ़ाना शामिल है। उनकी लेखन शैली सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित होती है और वह समाज में मौजूद रूढ़िवादी सोच पर सवाल उठाती हैं। 

गरिमा जी एक ऐसे न्यायपूर्ण और समानता वाले समाज का सपना देखती हैं जहाँ लिंग, जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो। 

कवयित्री से garimaji0814@gmail.com के जरिए संपर्क साधा जा सकता है।

विश्वास है कि गरिमा जी की रचनाएं पाठकों को संवेदित करते हुए स्पष्टता प्रदान करेंगी।

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Youth Suicide — An Inquiry, A Perspective

The subject of suicide among young people is painful, but it is also a subject we must be willing to discuss openly.

We often hear that a young person took their own life because of failure in an examination, a relationship problem, unemployment, family conflict, financial pressure, loneliness, or some other immediate difficulty.

But perhaps we should look deeper.

A single event may be the immediate trigger, but it is often not the whole story. The World Health Organization notes that suicide has multiple and interacting risk factors, including loss, loneliness, discrimination, relationship difficulties, financial problems, violence, abuse, chronic illness, barriers to care, and previous suicide attempts. Some suicides also occur impulsively during moments of crisis. (World Health Organization)

So the question should not merely be:

“What happened that day?”

We should also ask:

“What had been happening in this person's life for months or years before that day?”

When one setback becomes the whole of life

A young person may fail an examination and begin to think:

“My life is finished.”

Someone may not get a job and think:

“Everyone has moved ahead. I am good for nothing.”

Someone may experience rejection in a relationship and conclude:

“There is no point in living without this person.”

Someone may fall behind their classmates and begin to believe:

“I have lost the race.”

But life is much larger than any one examination, job, relationship, college, city, or social circle.

A setback is an event in life. It is not the definition of life.

This distinction needs to be taught much earlier.

We are sometimes teaching children the wrong definition of success

If children grow up hearing only about marks, ranks, salaries, prestigious colleges, government jobs, social status, appearance, and comparison, they may slowly begin to measure their entire worth through these things.

Then a failure in one area can feel like a failure of the entire person.

We need to give children a broader understanding of life.

Teach them that a meaningful life can include:

learning, physical health, meaningful work, self-reliance, friendship, creativity, helping others, reading, service, courage, truthfulness, and the simple ability to experience joy.

A person's worth is much larger than their examination score or salary.

Give young people more than one reason to wake up

Perhaps one of the most important things we can do is help young people build multiple sources of meaning. If a student has only one goal—say, clearing one examination—and everything else in life has been neglected, failure in that examination can feel catastrophic.

But if that same young person also has books to read, a sport to play, people to help, skills to develop, meaningful work to explore, friendships to build, and questions about life to understand, one setback cannot destroy the entire structure of their life.

A strong life needs more than one pillar. Do not make loneliness a punishment

Young people often experience enormous pressure to “fit in.”

They may feel that everyone else has friends, relationships, social recognition, and a successful life while they are somehow being left behind.

We need to teach them that being alone for a period of life is not the same as being worthless or unwanted.

A person can use periods of solitude to read, learn, exercise, develop skills, work, create something, and understand themselves better.

Good books can become companions. Meaningful work can become a source of connection. Helping someone else can reconnect us with life.

At the same time, we should not romanticize isolation. Supportive relationships and access to appropriate mental-health care are important protective factors. WHO emphasizes the importance of supportive family, school, and community environments for adolescent mental well-being. (World Health Organization)

Listen before giving advice

When a young person says: “I can't take this anymore.”

Don't immediately reply: “Others have bigger problems.”

Don't say: “Be strong.” Don't say: “You are overthinking.”

And certainly don't turn the conversation into a lecture.

First, listen.

Ask what is happening.

Let the person speak without fear of being mocked, judged, or punished.

UNICEF has highlighted that adolescents' difficulties are often dismissed as merely a normal part of growing up, while stigma and lack of awareness can prevent them from seeking help. (UNICEF)

Sometimes the most important thing we can give another person is the feeling:

“I can tell you what is happening to me, and you will not humiliate me for it.”

Asking directly about suicide does not make the problem worse

If you are genuinely concerned that someone may be thinking about suicide, do not avoid the subject because it feels uncomfortable.

Ask calmly and directly whether they are thinking about hurting themselves or ending their life.

Take such statements seriously.

Do not leave a person in immediate danger alone, and involve a trusted person and qualified mental-health or medical support as soon as possible.

Suicidal thoughts and behaviour deserve serious attention; they are not something to dismiss as “drama” or an attempt to attract attention. UNICEF notes that expressions of wanting to hurt or kill oneself in children and adolescents should always be taken seriously. (UNICEF)

Parents have an important responsibility

Parents do not need to provide their children with a perfect life.

They need to provide a relationship in which the child can say:

“I have failed.” “I am scared.” “I don't know what to do.” “I made a mistake.”

“I don't agree with you.”

—and still feel loved and respected.

If children believe that failure will result in humiliation, violence, rejection, or the withdrawal of love, they may hide their difficulties precisely when they most need support.

A home should not be a courtroom where children are constantly being judged.

It should be a place where they can recover and begin again.

Teachers and institutions also have a role

Schools and colleges cannot solve every problem, but they can create an environment where students do not feel that their entire identity depends on academic performance.

Teachers should notice sudden changes in behaviour, prolonged withdrawal, extreme distress, bullying, or other signs that a student may be struggling.

Institutions also need accessible pathways to counselling and professional support.

WHO recommends psychosocial interventions and supportive environments across schools, communities, and other settings as part of adolescent mental-health promotion and suicide prevention. (World Health Organization)

Teach children that life has many chapters

Perhaps this is one of the most important lessons we can give them:

A difficult chapter is not the end of the book.

You may fail an examination.

You may lose a year.

You may not get the job you wanted.

You may discover that your chosen career was not right for you.

You may experience rejection.

You may fall behind your friends.

You may have to start again at an age when others seem far ahead.

None of these things automatically means that life has lost its meaning.

Sometimes the path changes.

Sometimes our expectations change.

Sometimes we become stronger precisely because life did not go according to our original plan.

Give young people a purpose larger than comparison

Instead of constantly asking children:

“What will you become?”

we might also ask:

“What kind of person do you want to become?”

Do you want to become honest?

Capable?

Self-reliant?

Courageous?

Compassionate?

Excellent at your work?

Useful to other people?

Someone who makes the environment around them better?

These questions give life a larger horizon.

If a young person develops the desire to learn, work, contribute, and live with dignity, then even when one path closes, there are still many other paths worth exploring.

And perhaps we need to change our definition of failure

Failure is not necessarily losing an examination, missing a job, or falling behind someone else.

Sometimes the greater failure is giving up the opportunity to learn from the present situation.

If something has gone wrong, ask:

What can I learn?

What can I change?

What is still in my hands?

What useful work can I do today?

These questions bring the mind back from an imagined hopeless future to the possibilities of the present.

And that is important because suicide is preventable. WHO and UNICEF emphasize that timely support, evidence-based interventions, supportive environments, and better access to care can make a difference. (World Health Organization)

A final thought

We should not tell a struggling young person merely:

“Your life is precious.”

We should also help them discover why life can become precious again.

Give them books.

Give them meaningful work.

Give them opportunities to learn.

Give them physical activity.

Give them people who listen.

Give them room to fail without humiliation.

Give them opportunities to help someone else.

Give them the freedom to change direction.

And when they are in serious distress, give them professional help rather than expecting them to solve everything through willpower alone.

A young person's life should not be judged by how quickly they reached a particular destination.

Sometimes the most important achievement is simply finding enough support and clarity to continue the journey.

The purpose of education should not be merely to prepare a young person to earn a living, but also to prepare them to understand life, face difficulty, think independently, and live with dignity.

For your book, I would recommend keeping this chapter non-judgmental and evidence-based, especially avoiding language that portrays suicide as cowardice, selfishness, or a moral failure. That framing can increase stigma and make help-seeking harder. Recent UNICEF India work has specifically identified stigma as a major barrier to young people accessing mental-health support. (UNICEF)

Generated through chatgpt for spreading awareness, kindness and compassion.

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पितृसत्ता (कविता) - सौम्या

पुरुषों ने नहीं रहने दिया इंसान किसी को 

स्त्री को बनाया देवी कि वो सब सह जाए 

किन्नर में कहा कि देवता वास करते हैं इनके हृदय में 

जिससे इस व्यवस्था में रह सके सिर्फ वहीं इंसान 

और बने रहे अन्य सभी लिंगों के स्वामी 

क्योंकि इंसान बने रहना ही था सबसे अच्छा 

इसीलिए उन्होंने अपने लिए चुना इंसान रहना 

पुरुषत्व पर भी रखा सिर्फ अपना वर्चस्व 

सारे कल्याण के काम खुद ही करने लगे 

स्त्रियों की सुरक्षा से पालन पोषण तक 

उसके तन से लेकर मन तक 

किया अपना ही अधिकार 

पर इस वर्चस्व से सबसे ज्यादा मुसीबत में पड़ा भी पुरुष 

महिला तो दासी बनी ही 

पर पुरुष ने भी महिला को इतना दुर्लभ बनाया 

कि वो भी उसका दास हो गया 

कभी मानसिक तौर पर तो कभी शारीरिक

 

-सौम्या 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 

सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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Ok फिजिक्स: टिप्स और तरीके - लवकुश कुमार: पुस्तक परिचय

यह मेरे लिए खुशी की बात है कि जिस पुस्तक के लिए, इतने महीनो से प्रयास चल रहा था वह अब पाठकों के लिए उपलब्ध हो गई है, कुछ आम सवालों के जवाब, परिचय और आपकी प्रतिक्रिया के लिए यह लेख | ईमेल - KCPHYQA@GMAIL.COM

सवाल जैसे कि

लेखक का परिचय जरूरी है और प्रासंगिक भी, पुस्तक की सामग्री के आंकलन में 

ये किताब क्यों खरीदें, अन्य किताबों से यह किस तरह अलग हो सकती है? कुछ बातें इस पर :

स्टूडेंट्स के लिए है अतः स्टूडेंट्स की कुछ समस्याएँ जिन्हें संबोधित किया गया है :

कुछ बातें जिनके चलते इस पुस्तक को लिखने की जरुरत पड़ी:

 

 कुछ ही दिनों में यह पुस्तक अमेज़न और फ्लिप्कार्ट पर उपलब्ध होगी, अपने जानने वाले विद्यार्थियों को गिफ्ट करने के लिए एक एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है यह पुस्तक, जो न केवल उनके पढ़ने के तरीके को बेहतर करेगी बल्कि उन्हें एक अवलोकन और एनालिसिस की दृष्टि देगी| इसे निम्नलिखित लिंक से खरीदा जा सकता है|  https://notionpress.com/in/read/ok-physics-tips-aur-tareeke, या  बिना डिलीवरी शुल्क के प्राप्त करने के लिए  अपने निकटतम पुस्तक विक्रेता द्वारा डिमांड (वितरक को) सबमिट करवाएं (पुस्तक के लिए अपने पते का फॉर्म भरें )

 

आपकी सूचना हेतु, उक्त पुस्तक की विषय सूची साझा कर रहा हूँ:

  1. विद्यार्थियों को पंत सर का एक पत्र
  2. विश्लेषण क्षमता
  3. गलतियों से बचना : एक कविता
  4. 5 पॉइंट SOP और अन्य तरीके/एप्रोच
  5. सैद्धांतिक प्रश्नों को एप्रोच करना
  6. शुरुआत उदाहरणों से- 11वीं
  7. शुरुआत उदाहरणों से- 12वीं
  8. कॉमन चैप्टर
  9. हर पाठ में कुछ मूल बातें
  10. ग्राफ
  11. गणित से जुड़ी समस्याओं पर
  12. प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु
  13. कुछ इस तरह समझी मैने भौतिकी: तरीके और एप्रोच
  14. गलतियों से निपटना
  15. वन लाइनर का तरीका
  16. रिक्त स्थान का तरीका
  17. अभ्यास के लिए बेसिक प्रश्न
  18. अँग्रेजी शब्दसूची
  19.  परीक्षा में दबाव-मुक्त कैसे रहें?
  20. देश के कुछ बेहतरीन संस्थान
  21. कुछ बातें अध्यापकों से
  22. HC Verma (HCV) सर की कुछ बातें
  23. जीवनोपयोगी साहित्य का एक अंश
  24. कुछ शब्द और सार्थक जीवन
  25. भौतिकी, वैज्ञानिक चेतना और हमारा समाज
  26. भौतिकी, आविष्कार और संघर्ष
  27. अपनी बात कहना जरूरी
  28. लेखक की साहित्यिक पुस्तक

विद्यार्थियों को पंत सर का एक पत्र

सभी प्यारे विद्यार्थियों से एक बात—अपने विषय में आने वाली कठिनाइयों से जूझना सीखिए। किसी प्रश्न का उत्तर या समाधान तुरंत कहीं से खोज लेने की आदत मत डालिए। ऐसा करने से आपकी सोचने-समझने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। अपना अधिक समय मूल अवधारणाओं (Concepts) को स्पष्ट करने में लगाइए। जब आपकी नींव मजबूत होगी, तब आप सबसे कठिन अवधारणाओं को भी समझ पाएँगे और जटिल से जटिल प्रश्नों का समाधान भी स्वयं कर सकेंगे।

इस संदर्भ में अब्राहम लिंकन का एक प्रसिद्ध कथन याद आता है—"यदि मुझे किसी पेड़ को काटने के लिए छह घंटे दिए जाएँ, तो मैं पहले चार घंटे अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाऊँगा।" यही सिद्धांत पढ़ाई पर भी लागू होता है। अवधारणाओं को मजबूत करना ही अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करना है।

अक्सर ऐसा होता है कि कोई विद्यार्थी किसी कठिन प्रश्न से लंबे समय तक जूझता रहता है, फिर भी उसका समाधान नहीं निकाल पाता। तब उसे स्वयं या उसके माता-पिता को लगता है कि उसका समय व्यर्थ चला गया। वास्तव में ऐसा नहीं होता। भले ही उस एक प्रश्न का उत्तर न मिला हो, लेकिन उस संघर्ष के दौरान अनेक संबंधित अवधारणाएँ उसके मन में स्पष्ट हो चुकी होती हैं। यही बौद्धिक विकास की वास्तविक प्रक्रिया है।

एक दार्शनिक के बारे में कहा गया है कि "दार्शनिक वह अंधा व्यक्ति है जो अँधेरे कमरे में काली बिल्ली को खोजता रहता है।" परंतु विद्यार्थी की स्थिति तो इससे कहीं बेहतर है। उसकी आँखें खुली हैं, चारों ओर ज्ञान का प्रकाश फैला हुआ है और उसके पास सीखने की इच्छा भी है। ऐसे में यदि वह धैर्य और निरंतर प्रयास बनाए रखे, तो वह किसी भी अवधारणा रूपी 'काली बिल्ली' को अवश्य खोज लेगा।

इसलिए कठिनाइयों से घबराइए नहीं, उनसे मित्रता कीजिए।

हर संघर्ष आपको केवल एक प्रश्न का उत्तर नहीं देता, बल्कि सोचने की क्षमता, धैर्य और आत्मविश्वास भी देता है। यही गुण जीवन भर आपकी सबसे बड़ी पूँजी बनेंगे।

- भुवन पंत "इत्यादि"

लगभग ढाई दशकों तक भौतिक विज्ञान के एक शीर्ष संस्थान का नेतृत्व करते हुए, भौतिक विज्ञान में परास्नातक आदरणीय भुवन पंत सर ने सैकड़ों युवाओं को देश-विदेश के नामचीन इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों तक पहुँचाया। पिछले तीन वर्षों से अध्यापन को विराम देकर वे अपना पूरा समय रचनात्मक लेखन को दे रहे हैं। उनकी व्यंग्य रचनाएँ समाज के विविध रंगों, विरोधाभासों और विडंबनाओं को तीक्ष्ण किंतु सहज शैली में प्रस्तुत करती हैं।

 मई 2026 में द्वाराहाट की कार्यशाला के दौरान आदरणीय एच सी वर्मा सर से जो कुछ सीखा उसे भी एक अध्याय में शामिल किया है पुस्तक में, जोकि इस ईमेल के अंत में आपकी सूचना हेतु उल्लेखित है और साथ ही अपनी पुस्तक का विचार मैं व्यक्त कर सकूँ, इसके लिए पुस्तक में शामिल अध्यायों की सूची भी संलग्न कर रहा हूँ| 

HC Verma (HCV) सर की कुछ बातें

प्यारे विद्यार्थियों आपने वर्मा सर का नाम जरूर सुना होगा और अगर नहीं सुना है तो उनके बारे में अपने शिक्षक से बात करें या इन्टरनेट का सहारा लें|

वाह देश के जाने माने भौतिक विज्ञानी और आई आई टी कानपुर में भौतिकी के प्रोफेसर रहे हैं और सेवा निवृत्ति के बाद भी भौतिकी के क्षेत्र में महती भूमिका निभा रहे हैं, मई 2026 में उत्तराखंड के द्वारहाट के एक विद्यालय में उनसे मिलना और उन्हे सुनना हुआ|

प्रस्तुत हैं कुछ बातें आपके लिए, ज्यादा जानकारी के लिए सर की "बेहतरीन किताब भौतिकी की समझ" पढ़ी जा सकती है और उनके youtube एवं वेबसाइट ( https://hcverma.in/books ) पर विजिट किया जा सकता है|

  • भौतिकी के अध्ययन में आप गणित का इस्तेमाल एक luxury bus की तरह से कर सकते हैं जो आपको सकुशल और आराम से आपके गंतव्य तक पहुंचा सकती है|
  • पहले जिज्ञासा, फिर प्रयोग, फिर चर्चा और अंत में निष्कर्ष की तरफ
  • जब हम तार्किक अनुमान लगाते हैं तो कभी कभी कुछ नई बातें भी सामने आ जाती हैं|
  • कक्षा में "Attention create करना शिक्षक की जिम्मेदारी है, इसके लिए अवलोकन से जुड़े कुछ सवाल पूछकर बच्चों का ध्यान खींचा जा सकता है या कोई परिस्थिति उत्पन्न कर बच्चों से उसे explain करने को कहा जा सकता है और इस प्रक्रिया में हर के तार्किक अनुमान को appreciate भी करना चाहिए|
  • बच्चों को उत्तर देना नहीं, उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना आवश्यक है।
  • कई बार एक ही प्रयोग के अलग-अलग उत्तर सामने आते हैं कि सूक्ष्म स्तर पर परिस्थितियाँ बदल चुकी होती हैं|
  • विज्ञान रटने की नहीं, सोचने की प्रक्रिया है।
  • विज्ञान उत्तर याद करने का नहीं, प्रश्न पूछने का विषय है।
  • जिज्ञासा सीखने का सबसे बड़ा ईंधन है।
  • कक्षा की शुरुआत सरल और उत्तर देने योग्य प्रश्नों से होनी चाहिए।
  • बच्चों का ध्यान आकर्षित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।
  • Puzzle Method विद्यार्थियों को सक्रिय बनाती है।
  • वैज्ञानिक चेतना अवलोकन से शुरू होती है।
  • हर प्रयोग के पीछे "क्यों?" सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
  • सीखने की प्रक्रिया परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण है।
  • कम लागत की सामग्री भी उत्कृष्ट प्रयोगशाला बन सकती है।
  • विज्ञान को जीवन से जोड़ना जरूरी है।
  • बच्चे तब बेहतर सीखते हैं जब वे चर्चा का हिस्सा बनते हैं।
  • स्वतंत्र सोच भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण क्षमता है।
  • प्रयोग डर को कम करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।
  • प्रश्न पूछने वाला वातावरण रचनात्मकता को जन्म देता है।
  • विज्ञान का उद्देश्य केवल परीक्षा नहीं, जीवन को समझना है।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामाजिक समस्याओं को समझने में भी मदद करता है।
  • पर्यावरण संरक्षण भी वैज्ञानिक चेतना का हिस्सा है।
  • शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर दे तो कक्षा भी ठहर जाती है।
  • समान परिस्थितियों में भी परिणामों की जांच आवश्यक है।
  • सीखना आनंददायक होना चाहिए।

पूरा लेख पढ़ने के लिए विजिट करें https://kumarchetna.in/article.php?id=917

भूमिका 

“बड़े वैज्ञानिक शोध के लिए यदि हम जुझारू शोधार्थियों और बेहतरीन अवसंरचना के लिए उत्कृष्ट इंजीनियरों का पर्याप्त संख्याबल चाहते हैं, तो हमें सुनिश्चित करना होगा कि शुरुआत से ही बच्चों में विज्ञान के प्रति प्रेम पैदा हो, डर नहीं। उसी प्रयास में बतकही के अंदाज में प्रस्तुत है यह पुस्तक।”

 

अपने ग्रेजुएशन के दिनों से बच्चों को पढ़ाते और मार्गदर्शन करते समय, फिर स्वतंत्र रूप से बच्चों के डाउट्स हल करते हुए मैंने गौर किया कि अलग-अलग स्तर के बच्चों को कई तरह की दिक्कतें आ रही हैं—भौतिकी के सिद्धांत समझने में, आंकिक प्रश्नों को हल करने के लिए सही दिशा (अप्रोच) में आगे बढ़ने में। यहाँ तक कि कई ऐसे छात्र-छात्राएँ मिले जो आंकिक प्रश्नों में दी गई राशियों और प्रतीकों को पहचान पाने में ही सक्षम नहीं हो पाते। जब उन्हें नोटेशन (प्रतीक) ही समझ नहीं आ रहा, तो किस सूत्र को लगाएँ, इसका निर्णय भी बहुत मुश्किल हो जाता है। थोड़ी भिन्नता के साथ एक जैसे दिखने वाले प्रश्नों में कौन-सा सूत्र लगना है, यह नहीं जान पाते। इस तरह की दिक्कतों के साथ कुछ छात्रों से गणना में ही गलतियाँ हो जाती हैं (अभ्यास की कमी के चलते)। इन दिक्कतों का समाधान करने के उद्देश्य से ही “ओके फिजिक्स शृंखला” की पुस्तकों में सही प्रक्रिया को ध्यान में रखकर कई स्तर के प्रश्न और समुचित मार्गदर्शन उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।

 

बाजार में मौजूद पुस्तकों को पढ़कर ऐसा लगता है कि उन पुस्तकों को लिखते समय यह धारणा मन में रही है कि पाठक/विद्यार्थी दसवीं में बहुत अच्छे होंगे। जबकि वास्तविकता यह है कि कई कारणों—व्यक्तिगत दिक्कतों, शिक्षण या अभ्यास की अपर्याप्तता—के चलते बहुत से विद्यार्थियों का दसवीं का आधार ही गड़बड़ हो जाता है या कमजोर रह जाता है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक की सामग्री इस तरह निर्मित की गई है कि वे विद्यार्थी जिनका हाई स्कूल अच्छा नहीं रहा, या फिर भौतिकी में अपेक्षाकृत कमजोर रह गए, या जिन्हें भौतिकी से डर लगता है, उन्हें भी भौतिकी में दिक्कत न आए। वे सैद्धांतिक के साथ-साथ आंकिक प्रश्नों में भी माहिर हो सकें, जिससे बोर्ड में तो अच्छा कर पाएँगे ही, प्रतियोगी परीक्षाओं में ज्यादा सवाल हल करके बेहतर प्रदर्शन कर पाएँगे और विज्ञान/तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ पाएँगे।

 

बाजार में पहले ही भौतिकी पर बहुत सी किताबें हैं, जिनमें छोटे-से-छोटे टॉपिक पर लेख हैं और अभ्यास के लिए प्रश्नावली भी हैं। लेकिन कुछ कमी जरूर है, जो छात्रों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों से परिलक्षित होती है। मेरे अपने कुछ साल के chegg.com और toppr.com जैसे प्लेटफॉर्म के लिए “सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट, कंटेंट राइटर” के काम के साथ, अपने शिक्षक बन चुके साथियों के फीडबैक से जाना कि काफी छात्र ऐसे हैं जो भौतिकी को समझने के बजाय रटने वाला विषय मानते हैं। नतीजा यह होता है कि नए सवाल, जिनमें सोचने और तर्क की जरूरत होती है, उनसे नहीं हो पाते। काफी बच्चे तो गणित की मामूली बारीकियों से अनभिज्ञ रहने के चलते अपनी डॉक्टर या इंजीनियर बनने की इच्छा पूरी नहीं कर पाते, क्योंकि भौतिकी के मूलभूत आंकिक प्रश्न भी हल नहीं कर पाते।

 

समाधान के एक प्रयास के रूप में इस पुस्तक को लिखा गया है, जिसमें कई टिप्स और तरीकों पर बात हुई है, विश्लेषण क्षमता बढ़ाने पर बात हुई है, किसी भी अध्याय/टॉपिक के मूलभूत बिंदुओं को पकड़ने पर बात हुई है। इससे पाठक भौतिकी के तार्किक प्रश्नों को भी स्टेप-बाय-स्टेप हल करना सीख पाएँगे और आंकिक प्रश्न भी—वे कितने भी नए क्यों न हों—हल कर पाएँगे। साथ ही वे वे तरीके भी सीख/समझ पाएँगे, जिनसे तथ्य, सूत्र या अवधारणा याद रखना और समझना आसान हो।

 

यह पुस्तक उनको भी मदद करेगी जिन्हें भौतिकी से डर लगता है और उन्हें भी जो भौतिकी से दोस्ती करके, इससे संवाद करके अपने डॉक्टर/वैज्ञानिक या इंजीनियर बनने का सपना पूरा करना चाहते हैं। बायो स्ट्रीम के वे छात्र जो केवल गणित में हाथ तंग होने के चलते फिजिक्स में स्कोर नहीं कर पाते, उनके लिए इस पुस्तक में कुछ सामग्री शामिल करने का प्रयास किया गया है, ताकि डर दोस्ती में तब्दील हो सके।

 

यह किताब पाठ्यपुस्तक नहीं है और न उसका विकल्प। यह तो एक निर्देशिका है, आपको यह बताने की कि फिजिक्स बेहतर तरीके से कैसे पढ़ सकते हैं। आपके सिलेबस के ही टॉपिक्स, सूत्र, प्रश्न और आंकिक प्रश्नों को आधार बनाकर इस किताब में सवाल भी हैं, लेकिन इतनी संख्या में नहीं कि आपको देखकर ही हिम्मत जुटानी पड़े। जो भी सवाल हैं, उनके स्टेप-बाय-स्टेप हल हैं, पीछे की बारीकियों के साथ जिक्र भी है। इस किताब को इस तरह लिखा गया है ताकि छात्रों को लगे कि बड़ा भाई या बहन या कोई बड़ा, कोई प्यारा शिक्षक पास में बैठकर समझा रहा हो। छात्रों के मन में उठने वाली बहुत सी जिज्ञासाओं और भ्रमों को पहले ही संबोधित किया गया है, ताकि पाठक को ऐसा लगे कि जैसे यह किताब उसी के लिए लिखी गई है।

अगर विस्तार से कहें तो ओके फिजिक्स शृंखला के उद्देश्य में निम्नलिखित समस्याओं/दिक्कतों को संबोधित करने का प्रयास शामिल है—

 

  • · अच्छा शिक्षक नहीं मिल पा रहा? यह पुस्तक एक सीमा तक उस रिक्तता को भर सकती है। जो बातें अमूमन शिक्षकों द्वारा क्लास में बताई जाती हैं, लेकिन कुछ विद्यार्थी ही उन्हें याद रख पाते हैं—उनमें से अधिकतम संभव बातों को इस पुस्तक में शामिल करने का प्रयास किया गया है।
  •  
  • · ऑनलाइन पढ़ तो रहे हैं, लेकिन सुधार नहीं हो रहा? उस अवस्था में भी विद्यार्थी इस पुस्तक में दी गई बातों के आधार पर अपनी पढ़ाई का आकलन कर सकते हैं और जरूरी बदलाव ला सकते हैं।
  •  
  • · इकाइयों (Units) की समझ बेहतर हो; सूत्रों द्वारा मात्रक व्युत्पन्न करना।
  •  
  • · जरूरी टर्म्स की मूलभूत समझ पर काम, ताकि MCQs कम-से-कम गलत हों।
  •  
  • · सवाल में छिपे हुए (Hidden) मानों को पहचानना, ताकि कौन-सा सूत्र लगाना है, इसका पता चल सके।
  •  
  • · 5-Point SOP, ताकि नए आंकिक प्रश्न को भी हल करने में आसानी हो।
  •  
  • · कम आँकड़ों से अधिक उपयोग हासिल करने की दृष्टि विकसित करना।
  •  
  • · गणितीय समस्याओं पर समर्पित पाठ।
  •  
  • · विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ाने हेतु कुछ कविताएँ भी शामिल की गई हैं।
  •  
  • · प्रत्येक अध्याय की मूलभूत बातों पर गौर करना सिखाने का प्रयास।
  •  
  • · विद्यार्थी प्रेरित बने रहें, इसके लिए कुछ ज्ञानीजनों के उद्धरण (Quotes) और कविताएँ भी शामिल की गई हैं।

 

पुनः इस बात को रेखांकित करता हूँ कि मेरी पुस्तकों का उद्देश्य केवल भौतिकी सीखाना/समझना ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में Analytical and Reasoning-Based Approach विकसित करना है। यह अप्रोच आ जाने पर कोई भी नया टॉपिक समझना और सीखना आसान हो जाता है। इसीलिए बहुत से संख्यात्मक (Numerical) प्रश्नों से पुस्तक भरने के बजाय चुनिंदा प्रश्न शामिल किए गए हैं, लेकिन विस्तृत (स्टेप-बाय-स्टेप) हल के साथ, ताकि समझ स्पष्ट हो सके।

यह पुस्तक पाठ्यक्रम (Curriculum) पूरा कराने के लिए नहीं, बल्कि भौतिकी को समझने (Understanding) के लिए लिखी गई है। विद्यार्थियों में समझ (Comprehension) विकसित करना इसका उद्देश्य है। इसलिए इसमें वही विषय और उदाहरण शामिल किए गए हैं जो विद्यार्थियों की सोचने की क्षमता को विकसित करें और उन्हें नए प्रश्नों को स्वयं हल करने योग्य बनाएँ।

मेरा मानना है कि विश्लेषणात्मक (Analytical) और तर्कपूर्ण (Reasoning-Based) सोच विकसित हो जाने और सही दिशा मिल जाने पर विद्यार्थी काफी कुछ स्वयं भी समझने लगते हैं।

यदि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद विद्यार्थी अपने विद्यालय या प्रतियोगी परीक्षा की किसी भी पुस्तक को अधिक आत्मविश्वास और समझ के साथ पढ़ने लगें, तो यही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी।

मैं अपने उद्देश्य में कितना सफल रहा, यह आप पाठकों की प्रतिक्रिया से ही जान पाऊँगा। आपकी फिजिक्स बेहतर हो, इसी आशा के साथ ढेरों शुभकामनाएँ।

“कोई सवाल हो या हो डाउट, जरूर साझा करें”  

 

ईमेल— KCPHYQA@gmail.com अथवा  

lovekush@iitdalumni.com  

वेब— kumarChetna.in/physics  

अस्वीकरण 

क्या आपको भी दरकार है उन टिप्स की जिनसे आप भौतिकी के साथ सहज हो सकें ताकि इससे डरने के बजाय, इससे दोस्ती कर इसे आसानी से समझ सकें ?

फिर यह किताब आपके लिए है|

यह पुस्तक पाठ्यपुस्तक नहीं है और न ही उसका विकल्प। यह एक सहायक पुस्तक है जो इस प्रयास के साथ लिखी गई है कि आपके लिए भौतिकी को समझना और उसके साथ सहज होना आसान हो सके, ताकि नए प्रश्नों को अप्रोच कर उन्हें हल करना भी आसान हो सके। इससे आप परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकें और भौतिकी को आगे अपने विषय के रूप में लेकर चलने के लिए कॉन्फिडेंट हो सकें।

इस प्रयास के अंतर्गत मैंने अपने उन तरीकों और अप्रोच को साझा किया है, जो मेरी पढ़ाई के दौरान काम आए। साथ ही उन डाउट्स और दिक्कतों पर भी बात की गई है तथा उनके समाधान दिए गए हैं, जिनका सामना अक्सर विद्यार्थी करते हैं।

इस पुस्तक की तुलना पाठ्यपुस्तक से न की जाए। इससे अधिकतम लाभ लेने के लिए इसमें दिए गए उदाहरणों को समझते हुए अपने अंदर एक तार्किक अप्रोच विकसित करें, ताकि वह अप्रोच न केवल उस प्रश्न में, बल्कि अन्य प्रश्नों में भी काम आए।

इस पुस्तक में चुनिंदा उदाहरणों, टॉपिक्स और प्रश्नों के माध्यम से विद्यार्थियों में तार्किक अप्रोच विकसित करने का प्रयास किया गया है। साथ ही कुछ सीमित प्रश्न भी दिए गए हैं, जो उन्हें इस बात के लिए अभ्यस्त करेंगे कि किसी भी पाठ को किस तरह विभिन्न प्रश्न-शृंखलाओं में तोड़कर आसानी से पढ़ा जा सकता है। एक बार यह तरीका आदत में आ गया, तो कितने भी पाठ आसानी से पढ़े और समझे जा सकते हैं।

ज्यादा-से-ज्यादा टॉपिक कवर करने के बजाय, इस पुस्तक में चुनिंदा टॉपिक्स के विभिन्न पहलुओं पर बात करने का प्रयास किया गया है। इससे विद्यार्थियों में वह दृष्टि विकसित हो सके कि वे प्रश्न पढ़ते ही उसमें छिपे इशारे और दिए गए मानों को प्रासंगिक राशियों से जोड़कर देख सकें तथा उसे हल करने के लिए सही सूत्र या कॉन्सेप्ट की पहचान कर सकें। एक बार यह दृष्टि विकसित हो जाए, तो अलग-अलग टॉपिक्स के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। वे भी आसान लगने लगेंगे। जैसे आप देखते होंगे कि कुछ विद्यार्थियों के लिए कोई भी विषय या टॉपिक मुश्किल नहीं लगता — सारा कमाल अप्रोच (तरीके) और एनालिटिकल विजन का होता है।

पुस्तक के साहित्यिक अंश में व्यक्त विचार लेखक के अपने(व्यक्तिगत) विचार हैं, इन्हे किसी(उनके) विभाग या संगठन के विचार न माना जाए| साथ ही पुस्तक के लेखन और प्रकाशन में यथासंभव सावधानी बरती गयी है फिर भी यदि कोई त्रुटि छूट गयी हो तब उस अवस्था में उस त्रुटि के कारण पाठक को होने वाली किसी भी प्रकार की क्षति की ज़िम्मेदारी लेखक या प्रकाशक की नहीं होगी|

विश्वास है कि पुस्तक में जो कुछ भी मैं अपने अध्ययन के तरीकों से शामिल कर सका हूँ, आप उसका अधिकतम लाभ उठाएँगे। क्या नहीं मिला, इसके आक्षेप के बजाय जो कुछ भी आपको दे सका हूँ, उसे सराहेंगे, इस्तेमाल करेंगे और अपने दोस्तों से साझा करेंगे, ताकि वे भी सीखने के अनुभव को बेहतर बना सकें और खुशी से आपसे मुस्कुराकर बात कर सकें।

आपको बहुत कुछ देने का मन है, जो आपके काम आएगा और आपको और अधिक मजबूत तथा कॉन्फिडेंट बनाएगा। लेकिन फिलहाल इतना ही शामिल कर सका हूँ। बाकी फिर कभी — या तो इसी पुस्तक के अगले संस्करण में या किसी अन्य पुस्तक में। तब तक यदि कोई कमी लगे तो लिख भेजें। फिलहाल जो कुछ इस पुस्तक में शामिल किया जा सका है, उसका अधिकतम उपयोग करते हुए अपने सपनों और सीखने की दुनिया में उन्नति करें।

बढ़िया किया जो यह किताब खरीद ली! अब अच्छे से जाना जा सकता है कि विज्ञान की कोई किताब ऐसी भी हो सकती है। चलो, फिर मुलाकात करवाते हैं भौतिकी के अध्यायों से — पहले मुलाकात, फिर बात, फिर कुछ वक्त का साथ और आखिर में दोस्ती।

ठीक है न?

शुभकामनाएं 

आपका

लवकुश कुमार

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जहां चाह वहां राह - शादी में रिटर्न गिफ्ट और पुस्तकें

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संघर्ष की अनिच्छा और समाज में गिरते मूल्य! अवलोकन शृंखला | लेख सं - 003

हम अक्सर अपने से बड़ों के मुँह से सुनते हैं कि आजकल के बच्चों में जीवन-मूल्य, सामाजिक मूल्य या नैतिक मूल्य कम होते जा रहे हैं। झूठ का बोलबाला है, ईमानदारी कम हो रही है और लोगों में संवेदनशीलता भी घटती जा रही है।

लेकिन यहाँ मैं इसकी जड़ तक जाने की कोशिश कर रहा हूँ।

ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, साहस, दया और उदारता—ये केवल अच्छी बातें या किताबों में लिखे आदर्श नहीं हैं। इन्हें अपने जीवन में बनाए रखने के लिए कई बार मेहनत करनी पड़ती है, धैर्य रखना पड़ता है और यहाँ तक कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष भी करना पड़ सकता है।

मसलन, ईमानदार रहना हमेशा आसान रास्ता नहीं होता। सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ सकती है। किसी के साथ खड़े होने के लिए अपनी सुविधा छोड़नी पड़ सकती है। सही बात पर टिके रहने के लिए अकेले खड़ा होना पड़ सकता है।

लेकिन अगर हमारी जीवनशैली का उद्देश्य ही यह हो जाए कि सब कुछ आराम से मिले, तुरंत मिले और हमें किसी तरह का संघर्ष न करना पड़े, तो धीरे-धीरे हम उस संघर्ष के लिए आवश्यक क्षमता विकसित करना ही बंद कर देंगे।

और शायद यहीं से मूल्यों का क्षरण शुरू होता है।

क्योंकि मूल्य केवल सिखाए नहीं जाते, उन्हें परिस्थितियों में निभाया जाता है।
और उन्हें निभाने के लिए कभी-कभी असुविधा, धैर्य और संघर्ष—तीनों को स्वीकार करना पड़ता है।

इसलिए शायद सवाल केवल यह नहीं है कि “आज की पीढ़ी में मूल्य क्यों कम हो रहे हैं?”

एक सवाल यह भी होना चाहिए—

“क्या हमने उन्हें उन मूल्यों के लिए संघर्ष करना सिखाया है?”

 

प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा 

धन्यवाद

-लवकुश कुमार  

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और अपने कार्यालयी दायित्व से इत्तर संवेदनशीलता के प्रवाह हेतु साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु प्रयासरत हैं| 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना अपने जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट। वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


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सुविधाओं की राह की लंबी डगर! अवलोकन शृंखला | लेख सं - 002

जब भी किसी से बात होती है कि अमुक क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं है, या जनता को किसी तरह की असुविधा हो रही है—तो अक्सर तुरंत कई सुझाव आने लगते हैं:

“इसे ऐसे कर देना चाहिए था…”
“वैसे कर देते तो समस्या ही नहीं होती…”

ऐसी बातें सुनकर कभी-कभी लगता है कि लोगों की नज़र में उस काम के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को शायद तरीका ही नहीं पता!

लेकिन मुझे बात कुछ और लगती है।

मैं अभी इसके कारणों में नहीं जाना चाहता। बस एक सवाल की तरफ ध्यान खींचना चाहता हूँ—

जब एक आम आदमी के पास किसी काम को पूरा करने के लिए कई तरह के उपाय, तरकीबें और रास्ते हो सकते हैं, तो वही रास्ते उन लोगों को क्यों नहीं सूझते जिन्हें उस काम को करने की जिम्मेदारी दी गई है?

और अगर सचमुच कोई रास्ता नहीं सूझ रहा, तो फिर उस क्षेत्र की जनता से ही क्यों न पूछ लिया जाए?

आख़िर जिस व्यक्ति को रोज़ उस असुविधा से गुजरना पड़ रहा है, संभव है उसके पास समस्या का कोई सरल और व्यावहारिक समाधान हो।

यहीं से एक असहज सवाल खड़ा होता है—

कहीं ऐसा तो नहीं कि बहाने ऊपर की बात हों, और फिलहाल सुविधा को पंक्ति में खड़े आख़िरी इंसान तक पहुँचाने की नीयत ही नीचे हो?

क्योंकि किसी सुविधा का होना और उसका वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुँच जाना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं और इसमें समय और नियत दोनों चाहिए|

-लवकुश कुमार  

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और अपने कार्यालयी दायित्व से इत्तर संवेदनशीलता के प्रवाह हेतु साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु प्रयासरत हैं| 

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