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ग्यारहवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 17-05-2026

बीते रविवार (17-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से ग्यारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

बूढ़ा आदमी और समुद्र - अर्नेस्ट हेमिंग्वे

सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह 

गबन - मुंशी प्रेमचंद

इकिगाई - लम्बे और स्वस्थ जीवन का जापानी रहस्य 

अखंड ज्योति पत्रिका - गायत्री पीठ 

त्यागपत्र  - जैनेन्द्र कुमार

सही और जरुरी काम में लगें हैं तो हताशा या निराशा में न फंसे

पुस्तक परिचर्चा का सिलसिला जारी रहे ताकि एक मंच मौजूद रहे, साहित्य प्रेमियों के लिए, पुस्तक प्रेमियों के लिए 

परिचर्चा के दौरान समीक्षा ज्यादा लम्बी न रखी जाए और तीन बिंदुओं पर ही अपनी बात में जरुर शामिल किये जाएँ यथा पुस्तक में क्या है, आपको क्यों पसंद आयी और दूसरों को यह पुस्तक क्यों पढ़नी चाहिए|

डॉ जीवन सिंह एक प्रतिष्ठित आलोचक हैं जिन्होंने कविताओं की आलोचना का पैमाना इनका तेवर, जनवादी और लोकधर्मी स्वरुप रखा

केशव तिवारी जी ने अपनी एक कविता में कहा कि यदि वह अपनी कविता के माध्यम से किसी बेईमान आदमी की आँखों में ना खटके तो कविकर्म का दायित्व अपूर्ण रह जाये

केशव तिवारी जी के काव्य में बुंदेलखंड का लोकजीवन, भूगोल, इतिहास और संघर्ष समाहित है|

क्यों पढ़ी जानी चाहिए, सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह ? ताकि काव्यशास्त्र की समझ आये, कविता विधा के शर्तों का पता चले जिनके बिना कविता अर्थ नहीं पाती, माने कौन से गुण एक रचना को कविता बनाते हैं, न तो छंदयुक्त और न तो छंदमुक्त, कविता को अर्थ मिलता है सन्दर्भ, अंदाज और कथ्य तथा शिल्प के बीच सम्बन्ध से|

मुक्तिबोध की कविताओं की अंतर्वस्तु तक पहुँचने में मददगार हो सकती हैं ऐसे समालोचनात्मक पुस्तकें

ऐसे भी साहसी विद्यार्थी हैं जो पुस्तक परिचर्चा के महत्व और निरंतरता को समझते हुए परीक्षा वाले दिन से पहले दिन भी परिचर्चा में शामिल होने के लिए व्यवस्थित रहते हैं|

 उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, मुकेश जोशी जी, अंशुल मैम, सौम्या मैम,  उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अरविंद कुमार, प्रिया शर्मा, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, प्रीति जायसवाल, और लवकुश कुमार|

श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन सौम्या गुप्ता मैम और लवकुश कुमार ने किया|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

 

अगली परिचर्चा 24 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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ताल :फिल्म समीक्षा - सौम्या गुप्ता

हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, बातें की जाती हैं पर एक समय तक एक ऐसा समूह जिसे न स्त्री माना जाता है न पुरुष अर्थात् किन्नर उनके विषय में उस स्तर पर न समाज में कुछ बात हुयी और न ही कानून में।

      हमें संविधान में समानता का अधिकार दिया गया पर ये कैसी समानता थी जिसमें एक दौर तक पूरे एक तबके को डेथ सर्टिफिकेट लेने के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ा|

गौरी सावंत जी के जीवन पर बनी फिल्म ताली संवेदनाओं और जोश का अद्‌भुत मिश्रण है। कैसे एक किन्नर अपनी कम्युनिटी के लिए लड़ती है। जिसे अपने घर से निकलना पड़ता है क्योंकि उसके पिता उसकी अलग पहचान को समाज के सामने स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।

गणेश जिसे पता था कि गौरी बनने का सफर कितना दर्द देने वाला हो सकता है फिर भी उसने यह सफर तय किया। खाने के लिए और रहने के लिए संघर्ष किया।

अपनी कम्युनिटी में पूरी तरह उसे अपना समझा जाने लगे इसके लिए उसने जान जोखिम में डालकर ऑपरेशन कराया। फिर उसकी ही कम्युनिटी का एक मेंबर उसकी जान लेना चाहता था क्योंकि वो एक शिक्षिका बन गई थी।

गौरी जी ने किन्नर समुदाय के लिए ही नहीं काम नहीं किया, बल्कि वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के बच्चों को भी अपना माना। गणेश को गौरी बनना था क्योंकि उसे माँ बनना अच्छा लगता था।

गौरी जी कहती हैं कि इस देश में यशोदा की बहुत जरूरत है। उन्होंने शिक्षा भी ली और शिक्षिका भी बनीं।

शिक्षिका बनने तक का सफर भी आसान नहीं रहा होगा। वो ऐसी शिक्षिका बनी कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा इन्हें सम्मानित किया गया। उनकी एक दोस्त की जान जाने पर शरीर को नीचे रखने पर उन्होंने धरना प्रदर्शन कर दिया | साम-दाम-दण्ड की नीति के द्वारा उनको पूरा सम्मान दिलाया।

सुप्रीम कोर्ट में अपनी कम्युनिटी को तीसरे लिंग की पहचान दिलाई

उन्होंने राह के काले पत्थरों या मुँह पर पड़ी काली स्याही से रुकना सीखा ही नहीं था। इसीलिए तो चाहे अपनों का साथ छूटना हो या इस समुदाय के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का पता चलना हो, ऑपरेशन के लिए जान जोखिम में डालना हो या अपने ही लोगों द्वारा मारने कोशिश, उन्होंने रुकना नहीं आगे बढ़ना स्वीकार किया।

ताली बजाना नहीं, बजवाना स्वीकार किया

हमें इस मूवी को देखना चाहिए और प्रत्येक समुदाय के प्रति सद्भाव रखना चाहिए आखिर हम सभी में ईश्वर का रूप भिन्न-भिन्न रूपों में साकार होता है। 

           हर समुदाय में कुछ कमियां होती है। हमें जरूरत है कि हम उसकी कमियों को समझें और हर समुदाय को समाज की मुख्यधारा में शामिल करें| जब तक हम उन्हें बराबर का अधिकार नहीं देते, शिक्षा और स्वास्थ्य के समान अवसर नहीं देते, हमें कोई हक नहीं है कि हम उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए किए जाने वाले कामों के लिए उन्हें अपमानित करे। 

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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तुम सुन रही हो न - डॉ प्रीति अग्रवाल

मेरी प्यारी कॉफी, 

              सुमधुर स्मृति, 

                         तुम जहां भी होगी बहुत खुश होगी, ऐसा मेरा विश्वास है क्योंकि तुम थी ही इतनी प्यारी। तुम सबसे इतने प्यार से मिलती थी, हर आने वाले को तुम प्यार की डोर में बाँध लेती थी जैसे तुम्हारा उससे जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो। हमारी कॉलोनी वाले सभी तुमको बहुत प्यार करते थे। जब तुम कार में बैठकर रानी की तरह ठाठ से जाती तो सभी बच्चे हाथ हिला कर तुम्हारा अभिवादन करते। तुम्हारे जाने के बाद भी वे तुम्हारी खोज-खबर लेने हमारे घर आ जाते हैं। कुछ लोग तो अब भी पूछते हैं, जब हमारे घर का गेट खोलते हैं तो सबसे पहले अंदर झांकते हैं, मेरे आश्वासन देने पर की डरने की कोई बात नहीं है, काॅफी चली गई है, तब ही वे अंदर आते हैं। आज कुछ निडर प्राणी हमारे घर में खूब उछल-कूद मचा रहे हैं जो तुम्हारे रहने पर फटकते भी नहीं थे, अब ये बेधड़क नन्हें-मुन्हें बच्चे तुम्हारी जगह धमा-चौकड़ी कर हमारा मन लगाए रहते हैं और म्याऊँ-म्याऊँ की बोली से हमारे कानों में मिश्री-सी घोल जाते हैं । उनका दबे-पांव आना और चुपचाप झांकना मुझे तुम्हारी याद दिलाता रहता है। वैसे भी हम तुमको भूले ही कहां है, बस कुछ इस तरह से तुम्हारी यादें ताजी हो जाती हैं।  

                    तुम्हारी भारी-भरकम आवाज जब पूरे घर में गूंजती तो हम समझ जाते कि कोई आया है और तुम हमें बुला रही हो या आने वाले से उसका नाम पूछ रही हो। तुम्हारे पास तो एक ही भाषा थी, हमें समझना पड़ता था कि तुम क्या कहना चाहती हो? गुस्से के समय तुम्हारा चेहरा बदल जाता था। तुम्हारे अंदर के भाव तुम्हारे प्यारे से चेहरे पर ऐसे आते जैसे कोई बच्चा रूठ गया हो और उस समय मेरी हंसी रोके नहीं रुकती। तुमको अपने गले से लगाए बिना मैं ना रह पाती। जब मैं सितार बजाती तो तुम मेरी गोद में सिर रख कर पूरी तन्मयता से सुनती जैसे सब समझ रही हो और आनंद ले रही हो। तुमने मुझे हर एक प्राणी से प्यार करना सिखा दिया। सभी प्राणियों में मुझे एक ही आत्मा दिखाई देने लगी, यह मेरे लिए तुम्हारी सबसे बड़ी सौगात थी जो मुझे कोई और नहीं दे सकता था, एक आध्यात्मिकता का अहसास जो तुमने करवा दिया। आज इसी वजह से मैं उन प्राणियों से डरने या डराने की जगह उनसे दोस्ती करने की कोशिश कर रही हूं। यह मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि पहले मैं जिनसे भयभीत रहती थी,उनसे आज प्यार करने का मन चाह रहा है, यह सब कुछ हमारी कॉफी रानी की बदौलत ही तो हो रहा है। परिवर्तन ही तो जीवन का नियम है, तभी तो हम अपने आप को बदलते हुए आगे बढ़ते हैं और ऊपर उठते जाते हैं। तुमने मुझमें आध्यात्मिक चेतना जगा दी कि आखिर हम सब भी तो उस एक परमात्मा की संतान ही तो है। बस रूप अलग-अलग है, फिर सभी की मूलभूत जरूरतें भी तो एक ही है इसीलिए तुम हमारे परिवार की सदस्या बन गई थी। पूरे अधिकार से तुम हमारे बीच धंसने में जरा भी नहीं हिचकती। तुम्हारा बस चलता तो तुम गलबाहियां डालकर बैठ जाती। मेरे पति ने इसीलिये तुम्हारा नाम काॅफी रानी रख दिया था। हमारे सोफे पर बैठकर तुम हमारे साथ ही अखबार पढ़ा करती थी हमसे छीन कर, जब हम तुमसे अखबार मांगते तो तुम अजीब-सा मुंह बनाकर हम पर गुस्सा दिखाती। शायद तुमको हमारा अखबार पढ़ना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि उस समय हम तुम्हारे साथ होकर भी पेपर पढ़ने में व्यस्त हो जाते थे, यह बात तुमको नागवार गुजरती।

                   तुम्हारा पालन-पोषण मेरे बेटे सान्निध्य की गोद में और बचपन हमारे साथ खेलकर गुजरा। मस्ती के साथ झूमते हुए तुम बहुत जल्दी बड़ी होने लगी। कभी-कभी अफसोस होता कि तुम इतनी तेजी से क्यों बड़ी हो रही हो? हम लोगों का और हमारे यहां आने वाले सभी लोगों का तुमने मन मोह रखा था, तुम मनमोहिनी बन गई थी। तुम्हारा रंग भी दूध वाली कॉफी जैसा था, व्हाइट और ब्राउन मिक्स, इसीलिए बेटे ने तुम्हारा नाम कॉफी रखा था। कोई यदि हमारे यहां से जाने के बाद बहुत दिनों के बाद हमसे मिलने आया और तुम उसको पहचानती तो बस उसके पास आकर बैठ जाती और वहां से उठने का नाम नहीं लेती क्योंकि उससे प्यार जो करवाना होता, तुम प्यार की प्रतिमूर्ति थी। हर एक से प्यार पाकर तुम्हारे चेहरे पर एक सुकून दिखाई देता और तुम आंखें बंद कर उसका सुखद अहसास सामने वाले को भी करवा देती, जैसे तुम कृतज्ञता व्यक्त कर रही हो। तुम्हारी हर एक गतिविधि ने जैसे हम सबको एक बंधन में बांध दिया था। घर में तुम्हारी बातें ज्यादा होती और दूसरी बातें कम होती। तुम हमारे बीच जैसे एक पुल बन गई थी। बड़ी होने पर भी तुम शायद खुद को बच्ची ही समझती थी। उसी तरह रूठना लेकिन जल्दी मान जाना तुम्हारी बहुत बड़ी विशेषता थी।

                उम्र का तकाज़ा अब तुम्हें पहले की तरह उछल-कूद की इजाज़त नहीं दे रहा था। तुम्हारा भागना-दौड़ना भी प्रतिबंधित हो गया। तुम्हारी चंचलता पर भी लगाम लग गई। यह सब हम लोगों के लिए भी कष्टदायी हो गया। तुम हमारे पलंग पर अब भी पहले की तरह सोने के लिए मचल जाती लेकिन लाचार होकर बैठ जाती, हम लोग भी विवश थे क्योंकि तुम्हारा भारी शरीर बाधा बन गया था इसीलिए हम भी तुम्हें पलंग पर नहीं चढ़ा सकते थे। हमें तुम्हारे बिना पलंग सूना लगता था, जबकि शुरू में जब तुम हमारे साथ सोने की जिद करती तो हम तुम्हारी इस जिद से बहुत परेशान और नाराज होते थे। लेकिन तुम जीत जाती और हम हार जाते पर हमें हार कर भी जीत से ज्यादा खुशी मिलती। लेकिन तुमको उदास देखकर हम भी दुखी हो जाते थे। क्या करें कि तुम पहले की तरह ही उछलकर पलंग पर चढ़ जाओ और हम दोनों के बीच धंस जाओ। मेरे पतिदेव के सीने पर ठोड़ी टिकाये बिना तो तुमको नींद ही नहीं आती थी। तुम्हारी गर्दन का बोझ जब बर्दाश्त नहीं होता तो प्यार से हम तुम्हें हटाते, लेकिन यह हमारी कल्पना के भी बाहर था कि हम तुमको बिस्तर पर अपने साथ सुलाएंगे पर तुम्हारे प्यारे से मुखमंडल के आगे हम सबकुछ भूल जाते थे। तुम्हारा बिस्तर हमारे कमरे के कोने में लगा दिया जाता, जहां तुम चुपचाप दुबक कर बैठ जाती, बिना किसी शोर-शराबे के। तुम भी शायद अब उम्र के तकाजे के साथ समझौते का रुख अपना रही थी, तुमको उठने में और चलने में परेशानियां शुरू हो गई। किसी के आने की आहट भी तुमको अब शायद सुनाई नहीं देती। तुम्हारे ऊपर बुढ़ापा तेजी से हावी हो रहा था। धीरे-धीरे तुम्हारी सारी गतिविधियां उम्र के साथ प्रतिबंधित हो रही थी। इससे हम भी परेशान रहने लगे क्योंकि तुम्हारी हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। तुम्हारी लाचारी ने ही तुम्हें चिड़चिड़ा बना दिया था। हम लोग धैर्य के साथ तुम्हारा उस समय में साथ दे रहे थे और सब मिलकर सेवा करते थे। कभी-कभी हम लोग भी तेजी से गिरते तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए परेशान हो जाते। ना जाने तुम कैसे स्वस्थ होगी? लेकिन उम्र का तकाज़ा रोके कहां रुकता है? तुम भी उसकी गिरफ्त में आ गई थी,ये हमें खुद को समझाना पड़ा। जो आया है, उसे जाना ही पड़ेगा। कोई यहां अमरफल खाकर नहीं आया। तुम्हारा शायद अब अंतिम समय आ गया था। बेटे सान्निध्य ने अच्छे से अच्छा इलाज करवाया। लेकिन शायद ईश्वर ने इतने ही समय के लिए हमारे साथ तुम्हारा अद्भुत संबंध जोड़कर हमें एक आध्यात्मिक जगत से जोड़ने के लिए भेजा था। तुम्हारी सारी स्मृतियां अंतिम समय तक हमारे साथ रहेंगी। बेटे ने तुम्हारी समाधि हमारे छोटे से लाॅन में जो तुमको बहुत पसंद था, वही बनवाई है, जिससे तुम मीठी-प्यारी स्मृतियों के रूप में हमारे पास मौजूद रहोगी। मेरे पतिदेव रोज उस जगह धूपबत्ती लगाते हैं। मैंने एक साल तक तुम्हारे लिए वहां दूध रखा क्योंकि तुम दूध पीने के लिए सबसे ज्यादा उछलती हुई आती थी। आज भी मुझे तुम्हारी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों में तुम्हारे अंतिम समय की लाचारी याद आती है। एक अफसोस है, काॅफी काश मैं तुम्हें अपने अंतिम समय तक साथ रख पाती। जब मैंने तुम्हें अंतिम बार गले लगाया, तुम जमीन पर निढाल मेरी तरफ याचना भरी दृष्टि से देख रही थी। तब तुम्हारी आंखें मेरे आलिंगन और चुंबन से धीरे-धीरे हमेशा के लिए जैसे बंद हो गई और वातावरण में खामोशी-सी छाने लगी, तुमको अलविदा करते ही एक सन्नाटा-सा चारों पसर गया हो । जैसे घर का कोई बड़ा बुजुर्ग हमें अकेला और असहाय छोड़कर चला गया हो जो हमारी बहुत प्यारी सुकून देने वाली छाया थी।

                   तुम कभी-कभी सपनें में अपनी झलक दिखला जाती हो। बेटे सान्निध्य के साथ तुम्हारा लगाव बिल्कुल माँ-बेटे के संबंध जैसा था। आज भी उसे जाने-अनजाने में एक अलौकिक अहसास करवा देती हो तुम। आत्मा के रूप में तुम हमारे साथ ही हो। तुम्हें जो रोज घुमाते थे, आज भी वह कॉलोनी में डॉग्स को घुमाते मिल जाते हैं तो नमस्ते के साथ-साथ तुम्हारी तारीफ किए बिना नहीं रहते। ऐसी डॉगी अभी तक नहीं मिली जो इतनी प्यारी और शांत थी। अब तो तुम्हारी यादें ही प्यारी लगने लगी हैं और इन्हीं यादों के साथ हमने जीना सीख लिया है। एक प्यारा-सा खिलौना भगवान ने पोते के रूप में हमें दिया है। सौभाग्य से उसे भी तुम्हारा स्नेह मिला था। वह जब तुम्हारे ऊपर पैरों से कूदता था तो तुम उसे प्यार से मुड़ कर देखती जैसे दादी एक पोते पर प्यार लुटा रही हो। इससे ज्यादा तुम उसे क्या दे सकती थी? यही तुम्हारी हम सब के लिए सबसे बड़ी सौगात थी प्यार, जो तुम जाते-जाते हम सभी को दे गई। नन्हा-सा पोता अपने नन्हें-नन्हें कदमों से अक्सर तुम्हारी समाधि तक पहुंच कर वैसे ही चढ़ जाता है जैसे तुम्हारी पीठ पर चढ़ा करता था। तुम हमेशा हमारी स्मृतियों में रहोगी कॉफी, यह पंक्तियां तुम्हारी यादों को समर्पित है-

 

हमारे घर की पहचान थी कॉफी

        हम सब का अरमान थी काॅफी

हमारे घर की शान थी कॉफी

        हम लोगों की जान थी काॅफी

 

                                                                              तुम्हारी अपनी 

                                                                                      स्नेहिल प्रीति


डॉ. प्रीति अग्रवाल ने सन् 1984 में हिंदी-साहित्य में स्वर्ण-पदक लिया। सन् 2015 में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आपने कॉलेज की नौकरी करने के बदले खुद को साहित्य, कला, संस्कृति और सामाजिक कार्यों में शामिल करने का निर्णय लिया। 

              आपको संस्कार भारती ग्वालियर द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक सेवाओं के लिए वीरांगना लक्ष्मीबाई सम्मान भी दिया गया है। आपने अनेक राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित किए हैं।

                आपकी पुस्तक यात्रा संस्मरण चलो चले अंडमान तथा शोध प्रबंध हिंदी बाल गीतों में लोक संस्कृति और पूर्व सिविल सेवा अधिकारी और माननीय राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा जी के निजी सचिव जो आपके पति है, उनकी जीवनी तृषित- एक जीवन यात्रा प्रकाशित हो चुकी है। 

                आपका दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से जीवंत जुड़ा रहा है। फिलहाल आप लाइफ काउंसलर के रूप में लोगों को फोन पर निःशुल्क सेवा उपलब्ध करा रही हैं। 

               आपने लोगों की जटिल से जटिल जीवन संबंधी समस्याओं को सुलझाया है। अनेक लोगों के जीवन को अपने मार्गदर्शन से आत्महत्या से बचाया है तथा उनके जीवन को सार्थकता भी दी है। वे रिश्तें जो तलाक तक पहुंच गए थे आपने उन्हें भी फिर से मिला दिया। आप प्री-मैरिज काउंसलिंग भी निःशुल्क करती हैं। 

         कोई भी इच्छुक व्यक्ति आपसे बात कर सकता है, यह काउंसलिंग पूरी तरह निःशुल्क है, आपका मोबाइल नंबर 9644624449 है। शाम को 6:00 बजे से 9:00 बजे तक आपसे संपर्क किया जा सकता है।आपातकालीन परिस्थितियों में कभी भी बात कर सकते हैं।


 

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खुद से जंग (कविता) - सौम्या गुप्ता

खुद से खुद की जंग है,

कई बार मैं हार जाती हूँ,

कई बार मन हार जाता है।

 

पर कोशिश है मन को

ज़्यादा हराने की,

 

हर बार एक कदम

मन से जीत जाने को,

 

जानती हूँ मन मेरा हर बार

प्रतिस्पर्धी नहीं होगा,

 

कई बार बनेगा यह मेरा मित्र,

कई बार खुद ही आदत हो जाएगी

इसे मुझसे हार जाने की।

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 

 

संपादकीय टिप्पणी:

 

इस कविता का मूल विषय क्या है?

इस कविता का मूल विषय आंतरिक संघर्ष है, जो व्यक्ति के मन के साथ होने वाली लड़ाई को दर्शाता है, जब मन हमें हमारी वृत्ति की और खींचता है और हम अपने शरीर से वह काम लेना चाहते हैं जो हमें उत्थान, आत्मनिर्भरता और मुक्ति की और ले जाएँ। यह हार और जीत के चक्र, और खुद को बेहतर बनाने की निरंतर कोशिश के बारे में है।


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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दसवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 10-05-2026

बीते रविवार (10-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से दसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

ब्राह्मण की बेटी – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

जीत आपकी- शिव खेड़ा

संबंध और क्या है जीवन- आचार्य प्रशांत

  • पढ़ने का उद्देश्य जीवन के लिए रोटी कमाने तक सीमित न हो, बल्कि इससे आगे बढ़कर एक सार्थक जीवन के लिए खुद को तैयार करना हो|
  •  निर्णय निर्माण के लिए समय देकर, स्वयं की जरूरतों की समीक्षा करें, अपने असल जरूरतों को समझें और जो जरूरतें अभी महसूस हो रही हैं उनकी प्रासंगिकता के बारे मे अच्छे से विचार करें, दूसरों को देखकर अपनी प्राथमिकताएँ न बनाएँ, पहले स्वयं को समझें फिर अपनी जरूरतों को
  • जिस दिन आपको अपनी असली जरूरतों का पता चल जाएगा आपको बाहर से प्रेरणा की जरूरत महसूस न होगी
  • हौसला आता है स्पष्टता से, इसीलिए अध्ययन करें
  • सफलता और असफलता की भावना से ऊपर उठ जो जरूरी है वो करें, पूरा प्रयास और सही कार्य के लिए प्रयास अपने आपमें एक जीत है, सबसे पहला कदम सही काम के चुनाव का|

  • परिस्थितियाँ हमे सिखाती हैं, यदि आप एक उचित और जरूरी कार्य के लिए प्रयासरत हैं तो हार न माने
  • अध्ययन के बाद यदि आपकी समझ मे कुछ बेहतरी न आए तो आपको विचार करना चाहिए कि क्या वाकई पढ़ना सार्थक रहा?
  • खुद को खुलकर ईमानदारी से अभिव्यक्त करें ताकि आपसे इत्तेफाक रखने वाले लोग आपसे जुड़ सकें और आपके कार्यों मे सहयोग कर सकें
  • परिचर्चा को ऐसे संचालित करें जैसे कि हम सब एक कमरे मे बैठे बात कर रहे हों |
  • परिचर्चा में, सक्रिय रहें, पूछे जाने पर प्रतिक्रिया जरूर रखें ताकि परिचर्चा को एक दिशा दी जा सके
  • “जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना जरूरी है”- एक शेर का हिस्सा

  • स्वीडन यदि पूरी तरह डिजिटल हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को फिर से किताबों पर ला रहा तो क्या इतना काफी नहीं है हमारे लिए किताबों और पुस्तकालय के महत्व को समझने के लिए!
  • साहित्य को प्रोत्साहित करके हम इसी दुनिया को जिसमें हम रहते हैं, एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं जहां लोगों में प्रेम हो, संवेदनशीलता और हो आपसी सम्मान
  • फोन देखते देखते सो जाने से बेहतर है एक किताब पढ़ते पढ़ते सो जाना, असर आपको अगले दिन ही दिख जाएगा, साहित्य का चुनाव ढंग का हो|
  • पुस्तकें हमारी भाषा शैली को बेहतर करती हैं, हम लोगों को बेहतर समझ पाते हैं और उनसे तालमेल बिठाना आसान हो जाता है|
  • आप किसी भी विधा के विद्यार्थी हों, हर महीने 2-3 पुस्तकें पढ़ने का उद्देश्य रखना आपको कई मामलो मे बेहतर कर सकता है, जीवन के संघर्षों के लिए आपको तैयार कर सकता है और साथ मे मिल सकती है आंतरिक शांति और स्थिरता|
  • यदि आपमें बातचीत से लोगों के साथ जुड़ाव बनाने की चाहत है तो नियमित पुस्तकें पढ़ना न केवल आपको बेहतर शब्द दे सकता है साथ ही कार्यालय और व्यक्तिगत जीवन मे लोगों के साथ समन्वय बनाते हुये, खुद को अभिव्यक्त करते और दूसरों को समझते हुये आगे बढ़ने मे मदद कर सकता है|
  • पुस्तकें आपकी विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं जबकि विडियो मे काफी कुछ समझा देने और विजुअल जोड़ देने से हमारे दिमाग़ को जानकारी प्रोसैस करने की जरूरत कम पड़ती है और नतीजा कि हमारी  विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता का उपयोग न होने से इनमे बेहतरी कि गुंजाइश घट जाती है और इस तरह कुछ सृजन करने की संभावना भी| इसीलिए पुस्तकों का साथ बनाएँ रखें|
  • हमे विश्वास है कि जब लोग पढ़ना शुरू करेंगे तो समाज बेहतरी की ओर अग्रसर होगा, वही समाज जिससे प्रभावित हुये बिना हम नहीं रह सकते
  • कुछ लोगों मे इतनी स्पष्टता है कि वह सही नियत से एक काम में लगे हैं तो निरंतर अपने प्रयास को बढ़ ही रहे हैं बिना इस बात की परवाह के कि अभी वर्तमान मे उनका प्रयास कितना कारगर है क्योंकि सही नियत से किया गया काम बिलकुल उसी तरह है जैसे एक बीज को माहौल, खाद और पानी देकर पौधे से पेड़ और फिर फलदार पेड़ बनने तक उसके लिए लगे रहना|
  • कभी न भूलें कि आज जिन भी चीजों और मूल्यों का लाभ हम ले रहे हैं वह कहीं न कहीं हमारे पूर्वजों द्वार बहुत त्याग और संघर्ष से अर्जित किया हुआ है, चाहे वह आजादी हो या लोकतंत्र, इसीलिए हमे भी अपने बुढ़ापे और आने वाली पीढ़ी को सही और सुरक्षित हवा, जल और माहौल मिल सके, इसके लिए काम करना होगा, इसमें भी हमारे अकेले से काम न चलेगा, हम अगर एक एक पौधा लगा रहे हैं तो हमें ये देखना होगा कि कोई एक साथ हजारों और लाखों पौधे क्यों उजाड़ रहा? उसकी समझ पर काम करना होगा|
  • प्रयास करें कि रोज कम से कम एक पेज ही पढ़ लो एक पुस्तक से 
  • जब मातापिता और घर के बड़े स्वयं ही पुस्तक लेकर पढेंगे तो उन्हें देख घर के बच्चे भी पुस्तकों के तरफ आकर्षित होंगे, और ये आकर्षण जुड़ाव में बदल पाए इसके लिए जरुरी है कि घर में उम्दा, रोचक बाल साहित्य के रूप में रंगबिरंगी किताबें मौजूद हों|
  • इसे परिचर्चा में शामिल होना भी एक तरीका है अपने जीवन अपने दिन को सार्थक करने का |
  • जीवन सम्बन्ध है। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध, प्रकृति से सम्बन्ध, समाज से सम्बन्ध।

  • इन सम्बन्धों का आधार क्या है?

  • क्या है हमारे सम्बन्धों की वास्तविकता ?

  • क्या हमारे सम्बन्ध डर, लालच, मोह, आसक्ति की छाया मात्र हैं, या ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं? 

  • क्या हमारे सम्बन्ध अकेलेपन से बचने के उपाय हैं, या आन्तरिक पूर्णता का प्रस्फुटन ? 

  • और क्या है, सच्चा प्रेम? 

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

अंशिका शर्मा मैम, हिमांशु जोशी जी, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अंजना वर्मा, आरती मैम, अरविंद कुमार, धर्मेंद्र शर्मा सर, शोभित, प्रिया शर्मा, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, विजय कुमार, प्रिय कश्यप और कर्ण भाईजी|

कुशल और श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन कर्ण भाईजी ने किया|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

 

अगली परिचर्चा 17 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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प्रस्फुटन (कहानी) - शीतल भट्ट

"एक मजेदार कक्षा के साथ, सीखने, खुलने, निखरने और बेहतरी के सफर पर एक संकोची लड़की के एक मुखर व्यक्ति बनने की कहानी" 

 

शालिनी बहुत ही चुपचुप रहने वाली लड़की है। पहले वह स्कूल में अक्सर अपना सिर नीचे ही रखती,वह कभी सवाल नहीं करती थी। समझ न आने में सर को बताती नहीं थी कि उसे समझ नहीं आ रहा है। उसके लिए स्कूल जाना सबसे बोझिल कामों में से एक था। स्कूल और वहां के माहौल ने उसकी तरफ कभी कोमल हाथ नहीं बढ़ाया, बचपन से ही टीचर के लिए डर और अपने साथियों द्वारा उसका मजाक बनाए जाने का ऐसा असर हुआ कि स्कूल उसके लिए किसी यातना शिविर सा बन गया।

वह हमेशा दबाव में रहती, डर उसके ऊपर इतना हावी हो गया था कि वह हमेशा डरी-डरी रहती। ऐसा करते-करते शालिनी ने आठवीं पास कर लिया। वह घर में बहुत खुश रहती, वहां वह सहज हो पाती। मां के साथ घर के काम में हाथ बटाती। स्कूल से आते ही मां को खोजते हुए खेतों में पहुंच जाती थी।

शालिनी को लगता स्कूल जाने से अच्छा यह होता कि वह अपनी मां के साथ घर और खेतों का काम कर पाती। लेकिन स्कूल तो जाना ही था,उससे बचना नामुमकिन सा था। अब उसका दाखिला बड़े स्कूल में हो गया। वह नौवीं में पहुंच गई थी। तमाम तरह की शंकाएं और उस स्कूल के बारे में सुनी बातें उसे रह रहकर डराती। वही डर में वह खुद को फिर से सहमा हुआ पाती जहां से वह अभी अच्छी से निकली भी नहीं थी। नया स्कूल सच में बड़ा था ,वहां बहुत सारे बच्चे थे। टीचर भी बहुत सारे।यह नजारा उसके लिए आश्चर्यजनक करने वाला रहा।

एक दिन उन्हें कक्षा में एक अध्यापक पढ़ाने आएं। सोमेश सर ,जो उन्हें सामाजिक विज्ञान पढ़ाते थे। पहली बार तो वह सर के व्यवहार को देखकर अचंभित हो गई कि कोई अध्यापक ऐसा भी हो सकता है। वह बच्चों से लगातार प्रश्न पूछने को कह रहे थे। बिना किसी डर के वह पहली कक्षा थी जहां शालिनी को राहत सी महसूस हुई।

सोमेश सर ने बहुत सारी बातें बताई। किताबें,समाज और साथ में स्कूल के पुस्तकालय की भी। शालिनी ने आज तक अपने जीवन में पुस्तकालय नहीं देखा था। सच बात तो यह थी कि पाठयपुस्तक के अलावा उसने कोई किताब देखी ही नहीं थी। सोमेश सर के मृदु और बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार का यह असर होने लगा कि शालिनी दबे पांव पुस्तकालय का रुख करने लग गई। वह सहमी सी जाती थी,एक कोने में जाकर बैठ जाती थी। उसके लिए वह पुस्तकालय किसी अजूबे से कम न था।टेबल पर बहुत सारी पत्रिकाएं बिखरी हुई थी। अलमारियों में बहुत करीने से किताबें लगी थी

दीवारों में बच्चों के हाथों से लिखे हुई कुछ लंबे से पोस्टर टंगे हुए थे। बाद में सर ने बताया कि यह दीवार पत्रिका है। जो वहां के बच्चों ने स्वयं बनाई है। इसमें कुछ भी लिख सकते हो,जिसे किसी किताब से नहीं उतारना बल्कि अपने भीतर की दुनिया में जो चल रहा है उसे कागज में उतारना है,बिना किसी संकोच के। उसे पहली बार महसूस हुआ कि बच्चों को भी स्कूल में सम्मान दिया जाता है। यहां कुछ न आने पर सिर्फ उन्हें मारा या डांट नहीं लगाई जाती बल्कि उनके हिस्से की दुनिया रचने की आजादी भी दी जाती है।

इस तरह से शालिनी सर के साथ धीरे धीरे घुलने मिलने लग गई। अब वह सर के सामने वाली बेंच में बैठी रहती। इंटरवल होते ही पुस्तकालय आ जाती। पत्रिकाएं पढ़ती। यह उसका पसंदीदा काम होने लगा। सोमेश सर के पढ़ाने का अंदाज सबसे निराला था। उनके कक्षा में सन्नाटा कभी भी जगह नहीं ले पाया,वहां बच्चों की हंसी, बच्चों के प्रश्न और विषय से संबंधी किसी बात पर अपनी बात रखते बच्चों का शोर कक्षा को जीवन्त बनाएं रखता था।हर किसी की बात सुनी जाती, बहुत बार तो ऐसा होता कि बच्चे सर की बात से सहमत नहीं होते, उसके एवज में स्वयं तर्क करने लगते, फिर भी पूरा माहौल खुशनुमा बना रहता। यह सब शालिनी को भीतर ही भीतर गुदगुदाता । उसने आज तक ऐसा दृश्य न देखा था न कभी कल्पना की थी। उसने एक ऐसे अध्यापक की कल्पना किसी सपने में भी नहीं की थी। उसका बालमन सर की तरफ आकर्षित होता जा रहा था। वह सोमेश सर ही थे जो उसे हर वक्त लाइब्रेरी में मिलते। शालिनी का यह पहला परिचय था पुस्तकों से। उसे किताबों की रंग बिरंगी दुनिया अपनी सी लगती। वहां कोई उसे उसकी कमजोरी से नहीं आंकता था, बल्कि अपनी क्षमताओं से मिलाता।सोमेश सर बच्चों के विचार व्यक्त करने और पढ़ने के बहुत पक्ष में रहते,यही कारण था कि बच्चों की चहलकदमी सर के आस पास बनी रहती।

एक दिन शालिनी इंटरवल में लाइब्रेरी में बैठी थी, तब ही स्कूल में बनने वाली दीवार पत्रिका के लिए नए संपादक मंडल का चुनाव हो रहा था। सर ने शालिनी से भी पूछा कि क्या वह भी संपादक मंडल की सदस्य बनना चाहेगी।सर के सामने वह सिर्फ हां बोल पाई थी। लेकिन उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे लगा हां यही तो चाहती थी वो। उसके बाद उसका लेखन शुरू हो गया। जिसे सोमेश सर ने काफी सराहना शुरू किया। इसका असर यह होने लगा कि सर की कक्षा में उसका डर निकलने लगा। वह सभी चीजों में बढ़ चढ़ के प्रतिभाग करने लगी। सर के सिखाने का ही तरीका था कि उसके भीतर कभी गौरवबोध नहीं आया। सोमेश सर सभी बच्चों को एक समान मानते। किसी को सिर्फ इसलिए तवज्जो नहीं देते थे कि वह अच्छा बोलता है या पढ़ने में अच्छा है। वह बच्चों की तरफ से आने वाली शिकायत में भी तटस्थ बने रहते। उन्हें कभी शालिनी ने किसी की तरफदारी करते नहीं सुना। हालांकि वह बच्चों के लेखन को सार्वजनिक रूप से सराहते। शालिनी को अब पढ़ने में आनंद आने लगा,सामाजिक विषय उसका पसंदीदा विषय बन गया। उसे सोमेश सर के पढ़ाने का बेसब्री से इंतजार रहता।वह एक दिन भी घर में नहीं रहती,रोज स्कूल में जाती,अब वह पहले से ज्यादा चीजों को सीखने की कोशिश करती।

शालिनी धीरे धीरे आत्मविश्वास से भरने लगी थी। वह किसी न किसी बहाने से सर के आस पास रहती,उनसे बातें करती। सर का स्नेह ही था जो उसे सीखने को प्रेरित कर रहा था।अब उसने अपने आस पास समाज को ज्यादा  बारीकी से देखना शुरू कर दिया। सर ने उसकी यह भ्रांति भी तोड़ी कि सिर्फ स्कूल की चारदीवारों के भीतर और पाठयपुस्तकों से ही सीखा जाता है। वह किताब को समाज से जोड़कर पढ़ाया करते थे। उनमें अक्सर गांव के गरीब व्यक्ति की कहानी, सस्ते गल्ले की दुकान वाले का इंटरव्यू , अगर आप प्रधानमंत्री बन गए तो क्या करोगे, इस तरह के विषय शामिल रहते। इन सबको वह बड़ी ईमानदारी से करती।

उसे सर को दिखाने का उतावलापन रहता, उसने कैसा लिखा है करके। स्कूल पहुंचकर वह सबसे पहले लाइब्रेरी की ओर देखती कि सर आएं हैं या नहीं। जो विषय आज तक उसे रटने वाला और उबाऊ लगता था उसे सोमेश सर ने सबसे मजेदार बना दिया था। स्कूल अब उसके लिए दबाव नहीं बल्कि उत्सुकता का केंद्र बन गया। सोमेश सर उसकी जिंदगी में न आएं होते तो उसके जीवन में जो यह बदलाव आ रहे थे ,वह कभी नहीं आ पाते। उसने अब लोगों की बातों को नजरअंदाज करना सीख लिया था। वह बाकी विषयों में भी ध्यान लगाने लगी थी। 10वीं में वह अच्छे अंकों से पास हो गई थी। जबकि उसके घर वालों को यह डर था कि कहीं वह फेल न हो जाएं। विषय में रुचि बढ़ने के कारण उसने 11वीं में भी मानविकी विषय लिए। जिसके लिए उसे घर में भी काफी संघर्ष करना पड़ा। घर वाले चाहते थे लड़की साइंस ले, लेकिन दिल तो मानविकी विषयों में अटक गया था।

जबरदस्ती वो विज्ञान पढ़ भी नहीं पाती। फिर भी कुछ दिन विज्ञान पढ़ने गई, एकदम वह उदास पड़ने लग गई। सोमेश सर की कक्षा उसे रह रहकर याद आती,उसका वहां न होने का विचार उसे उदास कर जाता। उसने किसी से बात करना छोड़ दिया था। घर में भी किसी से बात नहीं करती थी। एक दिन हताश होकर वह स्कूल से जाते ही बिस्तर में जाकर सो गई, कंबल के अंदर मुंह छिपाकर रोती रही। उस रात घर वालों के बहुत मनाने पर भी उसने खाना नहीं खाया। उसकी जिद्द के आगे घर वालों को हार माननी पड़ी। दूसरे दिन सुबह स्कूल जाते वक्त पापा ने उसे मानविकी पढ़ने की इजाजत दे दी। वह दिन उसके लिए किसी उपलब्धि की तरह था। मानो उसने अपनी कोई जरूरी मांग मनवाई हो। इस तरह उसने मानविकी में अपना एडमिशन लिया। वह खुश तो थी, लेकिन उसके सभी साथियों ने विज्ञान विषय ले लिए थे। वह अकेली पड़ गई थी। बाकी जो थे वह अभी उसके लिए नए थे। पूरे स्कूल में एक तरह की हवा फैल गई कि शालिनी ने मानविकी ले ली। वह भी सोमेश सर के विषय के कारण। घर जाते वक्त उसके कुछ साथियों ने कहा भी था यह पागल हो गई है, सोमेश सर ने इसमें काला जादू कर लिया है।

जहां सब विज्ञान पढ़ रहे हैं और यह कला वर्ग में जा रही है। पहले पहले उसे यह बताने में शर्म सी आती या संकोच होता की वह कला वर्ग की छात्रा है।लोग भी उसे शक की नजरों से देखते। बाकी धीरे धीरे उसे वहां वहीं सुकून मिलने लगा था, जिसके लिए उसने संघर्ष किया था। सोमेश सर राजनीति विज्ञान पढ़ाते। वह लाइब्रेरी जाने लगी। लिखना,पढ़ना दोनों साथ साथ चलता रहा। उसे याद है एक बार सर ने उसे "आजादी मेरा ब्रांड" पुस्तक पढ़ने को दी,जो अनुराधा बेनीवाल का यात्रा वृतांत है। उसे पढ़कर उसे बहुत आजादी का अनुभव हुआ। जहां पहले वह कहीं भी अकेले जाने से डरती थी,अब उसने अकेले चलना शुरू कर दिया। उसने इस पुस्तक की समीक्षा भी लिखी। जिसे काफी सराहना मिली।

इस तरह पढ़ना लिखना उसकी आदतों का हिस्सा बन गया। 12वीं तक वह लगातार सोमेश सर से पढ़ती रहीं और चीजों को जानती रही। लिखना पढ़ना उसके पसंदीदा कामों में एक बन गया।सोमेश सर का ही असर था कि शालिनी के व्यवहार में बहुत सकारात्मक परिवर्तन आएं। बाकी विषयों में भी उसने मन लगाकर पढ़ना शुरू किया।

एक बार जब वह इंटरवल के बाद होने वाली क्लास में थोड़ी देरी से पहुंची तो इंग्लिश के अध्यापक ने उसे बुरी तरह डांटते हुए कहा कि तुम्हारा यही रवैया रहा तो तुम इंग्लिश में फेल हो जाओगी। यह सुनकर वह सहम गई और चुपचाप अपनी जगह में जाकर बैठ गई। जब 12वीं का रिजल्ट आया तो शालिनी न सिर्फ अंग्रेजी में उत्तीर्ण हुई थी बल्कि बहुत अच्छे नंबर लेकर आई। यह देखकर उसके आंखों में आंसू आ गए । यह पल उसके लिए भावुक करने वाला था। यह सिर्फ परीक्षा का ही रिजल्ट नहीं था , शालिनी के टूटने, बिखरने बनने, सीखने, अपने डर से लड़ने, खुद को लेकर हीन भावना से निकलने का सफर था। उन सभी लोगों की उपेक्षाओं के बावजूद सोमेश सर की अपेक्षाओं ने उसे बचा लिया था। सोमेश सर ने अपने प्रेम और मृदु स्वभाव से न सिर्फ पढ़ने को रुचि में बदल दिया बल्कि कभी भी किसी प्रश्न का जवाब नहीं बताते थे, बल्कि स्वयं खोज लाने को कहते थे। जिससे बच्चों को स्वयं जूझना पड़ता। इसी ने शालिनी को मजबूत और स्वयं कुछ खोजने सीखने को उत्साहित किया।

 

-शीतल भट्ट


 

शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


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अंतस : ज़रा ठहरिए- पुस्तक समीक्षा: विशाल चंद

पुस्तक- अंतस : ज़रा ठहरिए 

लेखक- लवकुश कुमार 

प्रकाशक- Notion Press 

 

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में ठहरना लगभग भूल चुके हैं हम। ऐसे समय में "अंतस" एक ऐसी पुस्तक बनकर सामने आती है, जो न सिर्फ हमें रुकने के लिए कहती है साथ ही भीतर झांकने का साहस भी देती है।

इस पुस्तक को पढ़ने से पहले मुझे लगा था कि यह एक सामान्य सेल्फ हेल्प किताब जैसी होगी लेकिन जैसे-जैसे मैं इसके पन्नों में आगे बढ़ता गया। यह अनुभव कहीं अधिक व्यक्तिगत और गहरा होता चला गया। लेखक ने रोज़मर्रा की साधारण लगने वाली घटनाओं के माध्यम से जीवन के बड़े सवालों को बेहद सहजता से उठाया है।

लेखक की सबसे बड़ी ताकत उनकी संवेदनशीलता है। वह किताबों और लेखकों के महत्व को जिस आत्मीयता से प्रस्तुत करते हैं। वह कहीं न कहीं सीधे दिल तक पहुंचती है। पुस्तक में विभिन्न किताबों, फिल्मों और विचारों का ज़िक्र न केवल पाठक की जिज्ञासा बढ़ाता है बल्कि उसकी सोच के दायरे को भी विस्तृत करता है।

इस पुस्तक की एक और खासियत इसके छोटे-छोटे प्रसंग और उद्धरण हैं। जो कम शब्दों में गहरी बात कह जाते हैं। एक जगह लेखक एक चिड़िया का उदाहरण देते हैं जो जंगल में लगी आग को बुझाने के लिए अपनी चोंच में पानी भरकर लाती है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि छोटी-छोटी कोशिशें भी बड़े बदलाव का हिस्सा बन सकती हैं। सिर्फ दर्शक बनकर रहने से बेहतर है कुछ करना।

संक्षेप में -  

  • यह किताब रोज़मर्रा की छोटी-छोटी चीज़ों में छिपे बड़े सवालों को सामने लाती है और हमें ठहरकर अपनी ही ज़िंदगी को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करती है।
  • अलग-अलग किताबों, फिल्मों और विचारों के ज़िक्र न सिर्फ इस पुस्तक को पढ़ने की इच्छा जगाते हैं, बल्कि साथ ही हमारी सोच को भी विस्तार देते हैं।
  • मेरे लिए यह पुस्तक केवल पढ़ने का अनुभव नहीं रही, बल्कि खुद से जुड़ने की एक प्रक्रिया बन गई। यह हमें लिखने, पढ़ने, अपने विचार खुलकर रखने, असहमति दर्ज करने और दूसरों के विचारों का सम्मान करने की सीख देती है।
  • कुल मिलाकर अंतस : ज़रा ठहरिए एक सधी हुई, प्रेरणादायक और भीतर तक असर छोड़ने वाली पुस्तक है। जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो अपने जीवन को थोड़ी गहराई से समझना चाहता है।

पुस्तक से कुछ उद्धरण - 

" वह हर इंसान सम्मान के योग्य है जो अपना कार्य

ज़िम्मेदारी और ईमानदारी से कर रहा है भले ही आपको उससे कोई

व्यक्तिगत फायदा न हो, इसकी परिणति ऐसे होती है कि सम्मान की

चाह में अन्य लोग भी ज़िम्मेदारी से अपना काम करने को प्रेरित होते हैं"

 

"अपने संसाधनो / धन / समय का एक हिस्सा परोपकार मे जरूर

लगाएँ, आपकी आय कम हो या ज्यादा उसमे दूसरों के लिए कुछ

कर पाने की गुंजाइश जरूर रखें, ये न हो कि पूरा वक़्त तथाकथित

अपनों के लिए चीजें और सुरक्षा खरीदने मे या उसकी तैयारी में लगा

दिया, एक-एक दिन को सार्थक करें, जिसमे व्यायाम, अध्ययन, और

जरूरतमन्द की मदद जरूर से शामिल हों, आप कितना भी वंचित

महसूस कर लें, ऐसे लोग भी हैं जो आपसे भी ज्यादा वंचित हैं, उनके

लिए कुछ काम करके, एक जरूरी उदाहरण बनें।"

 

"जब जीवन मे कोई उद्देश्य न दिखे तब एक काम किया जा सकता है,

है, जरूरतमन्द लोगों की निस्वार्थ सेवा, उनमे सबसे ऊपर जिस बात को

मैं रखता हूँ, वह है लोगों को शिक्षित करना, उन्हे लोगों की तकलीफों

को लेकर संवेदित करना, उनकी समझ पर काम करना, उन्हे मेहनत,

उत्कृष्टता और हुनर के लिए तैयार करना, उन तक बड़े बड़े लोगों की

जीवनियाँ और प्रेरक प्रसंग पहुंचाना, उन तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाना"

 

"सबसे बड़ा पाप अन्याय को देखकर भी चुप रहना है।"

- महात्मा गांधी

 

"जो इंसान अपनी समझ और आकांक्षाएं साझा नहीं करना चाहता वो

समाज से अपनी सहूलियत की दिशा की अपेक्षा कैसे कर सकता है! बिना

किसी पूर्वाग्रह के और बिना इस बात की चिंता किए कि लोग मेरे बारे में

क्या सोचेंगे बेधड़क होकर अपनी बात रखिए और दूसरों को भी हिम्मत

दीजिए, जो कुछ महसूस कर रहें उसे सामने व्यक्त करने का |

आपका एक लाइन का इनपुट भी मायने रखता है।"

#opinion_matters

 

"एक उपाय बाहर के प्रभाव को न्यूट्रल करने का, वह है अपने घर मे

अपनी क्षमता में एक पुस्तकालय का निर्माण करना जिसमे देश दुनिया

का उत्कृष्ट साहित्य हो और हो जीवनियाँ दुनिया के महान लोगों की,

जिन्होने आजादी और गरिमा के लिए जीवन भर संघर्ष किया, और

दुनिया को एक बेहतर जगह बनाया, अपने जीवन मे उत्कृष्ट कार्य करके

आनंद प्राप्त किया, ईमानदारी, बहादुरी और करुणा का जीवन जिया,

ताकि बच्चों को जीवन के लिए सही आदर्श मिल सकें |"

 

उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas

                                                                                   Amazon link

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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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नौवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 03-05-2026

बीते रविवार (03-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से नौवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

कबिरा सोई पीर है (उपन्यास) - प्रतिभा कटियार (लोकभारती प्रकाशन, लेखिका अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की कार्यकर्ता हैं)

स्मारिका  - उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट 

अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) - महेश चन्द्र पुनेठा 

मुसाफिर कैफे  - दिव्य प्रकाश दुबे

खाकी में इंसान  - अशोक कुमार साथ में लोकेश ओहरी 

नचिकेता - महेश चन्द्र पुनेठा 

  • प्रयास करें की घर में कोई एक घंटे का अंतराल निर्धारित करें जब घर के बड़े कोई साहित्यिक पुस्तक लेकर उसका अध्ययन करें, इससे नियमित हमारी समझ को विस्तार मिलेगा और घर में माहौल आएगा पढने लिखने का, हो सकता है कि बड़ों को देख बच्चे भी पुस्तकें लेकर बैठें, बच्चों की रंग बिरंगी आकर्षक पुस्तकें डिस्प्ले रैक में रखें ताकि वो बच्चों को अपनी और आकर्षित कर सकें|
  • किसी साहित्यिक रचना की मार्मिकता, बारीकी, पठनीयता और सामाजिक सरोकार पाठक के मन को बाँध सकती हैं कि वह पूरी पुस्तक पढ़ जाये 
  • जिन्होंने जातिगत भेदभाव कभी झेला नहीं उन्हें जातिगत भेदभाव को उजागर करने वाली रचनाएँ और बातें अतिश्योक्ति लग सकती हैं |
  • 03 मई को विश्व पत्रकारिता दिवस होता है, यइसका उद्देश्य प्रेस की आजादी के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना, मीडिया की स्वतंत्रता पर हमलों का विरोध करना और पत्रकारिता के दौरान जान गंवाने वाले पत्रकारों को श्रद्धांजलि देना है। 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषित यह दिवस, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा में निष्पक्ष पत्रकारिता की भूमिका को रेखांकित करता है
  • स्व० उमेश डोभाल (पत्रकार) और गिरीश चंद्र तिवारी (गिर्दा) हैं जैसे अमिट शख्शियतों और उनके योगदान पर बात हुयी |
  • जम्हूर आलम उअर नैनीताल की होली पर भी बात हुयी 
  • हिंदी भाषा में बात रखना ही आपको इसमें और पढने को प्रेरित करेगा, फिर लिखने को और इससे ही भाषा समृद्ध होती ही और हममें निपुणता आती है| 
  • उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

    आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हिमांशु जोशी जी, आकाश कश्यप, कृष्णा जायसवाल, गुंजन त्यागी मैम, प्रिया शर्मा, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, कपिल देव, अंशुल पाण्डेय, सौम्या वर्मा, प्रिया, लक्ष्मण जोशी, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, विजय कुमार, ममता, गायत्री जायसवाल, अरुण मौर्या और लवकुश|

  • पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

    धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

    इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

    अगली परिचर्चा 10 मई, रविवार रात 09 बजे होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

      धन्यवाद 

    -लवकुश कुमार

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ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है माँ (कविता)- सुषमा सिन्हा

माँ पर कविता (mother's day)
(अतुकांत कविता)

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हम सब हैं तुम्हारी रचना ,
तुम पर क्या रचे हम माँ!
न शब्द ,न शास्त्र, न लेखनी कोई,
जो तुम्हें परिभाषित कर सके माँ ।
ऐसी दीया जो खुद जलकर ,
हमे रौशन करती हो माँ. 
आकांक्षा आसमान से  ऊंचा,
ममता तेरी पृथ्वी से भारी है माँ. 
गर्मी में सघन साया बन जाती, 
जाड़े की नर्म धूप हो माँ.
तेरे स्नेह रसधार के आगे,
सागर भी 'कूप' दिखता है माँ .
कलेजे के टुकड़े को  अपनी मौत तक ,
कलेजे से लगाए रखती हो माँ. 
चोट हमें जब-जब लगती ,
घायल तुम होती हो माँ. 
ईश्वर प्रार्थना सुने 
न सुने ,
बिन बताए इच्छा पूरी करती हो माँ .
प्रभु क्षमा करें ना करें, तुम हर खता माफ करती हो माँ .
परमात्मा नतमस्तक तेरे आगे,
उन्हें भी तो, तुम पाली हो माँ ,
मौत के लाख बहाने होते,
जन्म के लिए सिर्फ तुम ही हो माँ.
हर मुश्किल में साथ निभाती,
निस्वार्थ प्रेम की मिसाल हो माँ .
इंसान के रूप में ही नहीं,
प्राणी मात्र के लिए देवी हो माँ. 
संसार का नजारा बहुत   प्यारा होता,
काश!' किस्मत की लेखनी' पा जाती माँ.  परमात्मा ने भी यही कहा है,
उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति तुमही हो माँ.
बच्चों के लिए हर पल बेचैन रहती,
चैन की नींद, चिता पर सोती है माँ. 
फौजी देश पर कुर्बान होते,
प्रथम कुर्बानी देती है माँ. 
"मदर्स डे"क्या मनाना!  
हर क्षण तुम्हारे नाम है माँ. 

सुषमा सिन्हा 
वाराणसी 
मोबाईल 9369998405 

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पुस्तक परिचर्चा - एक मंच

पुस्तक परिचर्चा में केवल पुस्तकों पर ही बात नहीं होती, इसमें पुस्तकों के महत्व पर भी बात होती है और एक मंच को निरंतरता मिलती है कि कल कोई जुझारू युवा जुड़े और इस मुहिम को और आगे तक ले जाए‌।

शुभकामनाएं 

लवकुश कुमार 

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