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एक गायक की भूमिका
एक गायक सिर्फ सुरों, बोल, भावनाओं और हृदय के उद्गारों का संवाहक नहीं होता, वह लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाता है और साथ मे होता है संगीत|
उसकी आवाज़ में वो ताकत होती है जो बिना भौतिक स्पर्श दिल को छू ले।
जब इंसान खुश होता है तो संगीत और गीत जश्न बन जाते हैं और जब निराश हो तो वही गाने मरहम बनकर दर्द कम कर देते हैं, आशा और उत्साह जगा देते हैं|
गायक और गीतकार हमारे जज़्बातों की ज़ुबान होते हैं, जो बात हम कह नहीं पाते, वही बात एक गीतकार, गायक की आवाज के माध्यम से एक गाने में कह जाता है। मानवीय प्रेम और जुड़ाव की पहली धड़कन से लेकर जुदाई/अलगाव के आँसू तक, हर लम्हे का साथी बन सकता है एक गीत|
सफर में, अकेलेपन में, त्यौहार में - गायक की आवाज़ और संगीतकर का संगीत हमारे साथ चलते हैं और यादें बना देते हैं|
समाज में भी गायक का बड़ा योगदान होता है, वह अपनी आवाज़ से संस्कृति को जिंदा रखता है लोकगीतों और भजनों को नई पीढ़ी तक पहुँचाता है। कई बार उसके गाने हिम्मत देते हैं, एकता का संदेश देते हैं और भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में कुछ सुकून दे जाते हैं।
ये, वह काम है जो कम लोग कर पाते हैं - दर्द में संबल देना और खामोशी को आवाज़ दे देना। इसीलिए एक सच्चा गायक सिर्फ स्टेज पर नहीं गाता, वो लाखों लोगों के दिल में बस जाता है।
जैसे: अरिजीत सिंह, किशोर कुमार, भारत रत्न लता मंगेशकर जी सहित अनेक गायकों ने अपनी आवाज़ से कई दशकों तक देश को जोड़ा।
गायक वह क्षमता रखता रखता है जो सुरों से दिलों को जोड़ दे। खुशी में जश्न, गम में मरहम और यादों में साथी बन जाए। वह अपनी आवाज़ और गीतकार के लिखे बोल से वह बात कह देता है जो हम अपने लफ्ज़ों से नहीं कह पाते। इसीलिए गायक सिर्फ कलाकार नहीं, हमारी रोज़ की ज़िंदगी का सुकून होता है।
संगीत हमारी संस्कृति, देश की पहचान को बनाए रखता है। अच्छा संगीत और मनमोहक बोल हमें हमारे अंदर की विराटता और सूक्ष्म विश्लेषण से परिचित करवाते हैं|
इसीलिए यदि आप भी अपने काम से लोगों को सुकून और उम्मीद देना चाहें तो संगीतकार। गायक या गीतकार बनने के बारे में विचार किया जा सकता है|
उदाहरण चाहिए तो बस एक लाइन लिखिए वेब सर्च में, अपनी जरूरत के अनुसार, "जीवन पर आधारित कुछ बेहतरीन गाने", फिर आएगी एक सूची जिसके गाने सुनने पर मिल सकता है समाधान आपकी दुविधाओं को और चैन आपके बेचैन मन को |
कुछ गाने ये भी "एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल" और "जिंदगी एक सफर है सुहाना" आदि
शुभकामनाएं
- प्रिया
बरेली, उत्तर प्रदेश
प्रिया जी स्नातक की विद्यार्थी हैं और सिविल सेवाओं की परीक्षा के लिए खुद को तैयार कर रही हैं|
आप कविताओं द्वारा स्वयं के विचारों और भावनाओं को व्यक्त करती हैं | समाज मे आपकी गहरी रुचि है और लोगों की मदद करने मे आपको एक अनोखी अनुभूति महसूस होती है, जो आपको और बेहतर करने को प्रेरित करती है|
इस बाबत कवि भवानी प्रसाद मिश्र जी की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं :
कुछ लिख के सो,
कुछ पढ़ के सो,
तू जिस जगह जागा सवेरे,
उस जगह से बढ़ के सो"
नए कवियों को निर्देशित करती वरिष्ठ कवि महेश चन्द्र पुनेठा जी की कविता, "पहली कोशिश" भी प्रासंगिक है:
मैं न लिख पाऊँ एक अच्छी कविता
दुनिया एक इंच इधर से उधर नहीं होगी
गर मैं न जी पाऊँ कविता
दुनिया में अंधेरा कुछ और बढ़ जाएगा
इसलिए मेरी पहली कोशिश है
कि मरने न पाए मेरे भीतर की कविता।
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शुभकामनाएं

"अंतस - जरा ठहरिए"
लेखक - लवकुश कुमार
प्रकाशक - नोशन (Notion) प्रेस चेन्नई
"अंतस - जरा ठहरिए" लवकुश कुमार जी द्वारा लिखी गई पहली साहित्यिक पुस्तक है,जो हॉल ही में प्रकाशित हुई है।
यह सरल शब्दों में जीवन मूल्यों की तरफ़ पाठक का ध्यान खींचती है। जो बहुत ही संवेदनशील तरीके से लिखी गई है।
जो किसी क्षेत्र या किसी एक विषय के बारे में भले ही आपको पूर्ण ज्ञान न दे सकें। लेकिन आम जीवन में छोटी छोटी चीजों का क्या महत्व है, उस ओर आपको जरा देर खींचकर रोक देती है।
बहुत सामान्य से विषय है,जहां सूक्ष्म चीजों को लेकर उन्होंने अपना लेखन किया है। एक तरह से यह पुस्तक मन में उठते तूफान को शांत कर देती है, खुद के लिए अपराधबोध, समाज के लिए ईर्ष्या,खुद के ही आगे बढ़ने की लालसा को ठहर कर सोचने को कहती है। उनका मुख्य चिंतन समाज के लिए है जो यह कहते हैं कि अपनी एक जिम्मेदारी समाज के लिए भी रखो।अपनी जिंदगी में इतने परेशान रहने की जरूरत नहीं है, किसी जरूरत मंद इंसान की मदद करो वह किसी भी तरह से की जा सकती है। दूसरों की मदद करने से बड़ा कोई सुख नहीं है।
आज जब जिंदगी बहुत तेजी से भाग रही है, आए दिन तरह-तरह की घटनाएं हमें सुनाई देती है, जब मानव सभ्यता को एक अलग दिशा में प्रवाहित किया जा रहा है।मनुष्य के लालच और भोग विलास को ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है, ऐसे में लवकुश जी बहुत से उदाहरण देकर जीवन का उद्देश्य समझाते है।
जब मनुष्य, मनुष्य होने के नाते कुछ न कर पाने के अपराधबोध से खुद को दबाएं हुए है, ऐसे में आज के वातावरण का सूक्ष्म अवलोकन के लिए मानो कोई जगह ही नहीं रह गई है और परिणामतः हम कोई कार्य इसलिए नहीं कर रहे कि उससे हमें आनंद की प्राप्ति हो।
जीवन के मूलभूत पहलुओं में यह किताब एक मनुष्य को स्पष्टता देती है कि अभी कुछ भी नहीं छूटा, एक तसल्ली देती है कि अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा,अगर किसी कारण से पढ़ाई छूट गई या कुछ परिस्थिति बदल गई तो उसका विकल्प फिर से शुरू करना है न कि आत्मघाती कदम उठा लेना|
जीवन की बारीकियों को समझाती हुई यह पुस्तक जीवन की खूबसूरती से पाठक का परिचय कराती है। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह पुस्तक उनके द्वारा दुनिया और स्वयं को देखे और समझे जाने का प्रतिफल है।
यह पुस्तक पाठक के दिमाग में बहुत प्रभाव डालती है। मुझे स्वयं इसे पढ़ते हुए लग रहा था कि हां मुझे भी जरूरत थी इस तरह की पुस्तक की, जो आपको प्रेरित करें, लिखने को ,पढ़ने को अपने विचार खुल कर रखने को,अपनी असहमति दर्ज करने को और सामने वाले की बातों का सम्मान करने के लिए।
- शीतल
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas
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लेखिका – शिवानी 
प्रकाशक – राधाकृष्ण पेपरबैक्स
“कालिंदी” सिर्फ एक उपन्यास नहीं हैं बल्कि एक गहरी अनुभूति की शुरुआत है जो पाठक को भीतर तक छू जाती है।
यह कृति एक स्त्री के आत्मसम्मान, संघर्ष और समाज से टकराने की कहानी को बेहद संवेदनशीलता और सजीवता के साथ प्रस्तुत करती है। नायिका डॉ. कालिंदी का व्यक्तित्व दृढ़, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर है। वह अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेती है और उन निर्णयों की कीमत भी पूरी दृढ़ता से चुकाती है। यही उसे एक साधारण पात्र से असाधारण बना देता है।
उपन्यास में कालिंदी की मां (ईजा) अन्नपूर्णा का निःस्वार्थ त्याग, देवेंद्र का आंतरिक द्वंद्व और रिश्तों की जटिल परतें मिलकर एक ऐसा यथार्थ रचती हैं, जो कहीं न कहीं हर पाठक को अपना-सा लगता है। पुस्तक में कुमाऊँ की पृष्ठभूमि विशेषकर अल्मोड़ा और उसके आसपास के अंचल का जीवंत चित्रण इस रचना की आत्मा है। यहां की मिट्टी, हवा, संस्कृति और लोकजीवन शब्दों के माध्यम से जैसे सजीव हो उठते हैं।
“कालिंदी” केवल एक स्त्री की कथा नहीं हैं। इसमें तो अनेकों अनगिनत स्त्रियों की सामूहिक गाथा है जो आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में निरंतर स्वयं को खोजती रहती हैं। यह उपन्यास यह एहसास कराता है कि नारी केवल सहने के लिए नहीं बनी है। उपन्यास के नारी पात्रों का अपने निर्णयों पर अडिग रहना और अपनी पहचान गढ़ना इसका मजबूत पहलू है।
एक पाठक के शब्द इस कृति के प्रभाव को बेहद खूबसूरती से व्यक्त करते हैं—
"कालिंदी पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो मैं फिर से उसी पुराने अल्मोड़ा में लौट गया हूँ।"
स्वयं लेखिका के शब्द—
"मुझे लगा जैसे मुझे कुमाऊँ का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार मिल गया।"
यह लेखिका के पाठकों के प्रति उनके गहरे जुड़ाव और समर्पण को दर्शाते हैं।
डॉ. कालिंदी एक स्वयंसिद्धा स्त्री है, जो जीवन के हर झंझावात का सामना अपनी शर्तों पर करती है। यह उपन्यास कुमाऊँ की स्त्री शक्ति, उसके लंबे शोषण, उसकी अदम्य सहनशीलता और जिजीविषा का सशक्त दस्तावेज़ है। साथ ही यह नए और पुराने मूल्यों के टकराव और उनके पुनर्सृजन की कथा भी कहता है।
अन्नपूर्णा और कालिंदी जैसे पात्र आज भी हमारे समाज के हर कोने में मौजूद हैं जो लिए हुए हैं अपने भीतर अपार प्रेम, त्याग और संघर्ष को। यही इस उपन्यास को कालजयी बनाता है।
विशाल चन्द @reading_owl.3
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https://www.instagram.com/reading_owl.3
विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।
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मेरी पुस्तकें
देवेंद्र मेवाड़ी

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स्रोत - आदरणीय देवेंद्र मेवाड़ी सर से प्राप्त सूची की फाइल से साभार
ई-मेल : dmewari@yahoo.com
लेखक परिचय - विज्ञान को साहित्य की सरसता और सरलता में पिरो कर देवेंद्र मेवाड़ी समाज को नई रोशनी दे रहे हैं। बीते 50 वर्षों से भी अधिक समय से वह अपनी किताबों, कहानी, विज्ञान साहित्य के लेखों से बच्चों को विज्ञान की बारीकियां सिखा रहे हैं। अब तक आधा दर्जन से अधिक राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जित कर चुके देवेंद्र के आत्मकथा संस्मरण मेरी यादों का पहाड़ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी 2021 के युवा एवं बाल साहित्य पुरस्कार के लिए चुना गया।
मूल रूप से नैनीताल जनपद के ओखलकांडा कालाआगर निवासी देवेंद्र मेवाड़ी का जन्म 1944 में हुआ। 12वीं तक पढ़ाई ओखलकांडा में पूरी करने डीएसबी परिसर से वनस्पति विज्ञान में एमएससी की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई पूरी कर भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान दिल्ली में तीन वर्षों तक अनुसंधान कार्य करने के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया। इसके बाद जीबी पंत कृषि विवि पंतनगर में बतौर विज्ञान लेखक कार्य करना शुरू किया। जहां 13 वर्षों तक उन्होंने किसान भारती पत्रिका का संपादन किया। इसके बाद 22 वर्षों तक वह बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े रहे। वर्तमान में वह दिल्ली में रहकर मुक्त रूप से विज्ञान साहित्य का लेखन कर पाठकों की जिज्ञासा शांत कर रहे हैं।
स्रोत - साभार दैनिक जागरण, पूरी रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करें |
प्रस्तुत हैं कुछ पोस्टर:

दूसरा पोस्टर

तीसरा पोस्टर

कुछ अन्य लिंक :
सातवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 19-04-2026
छठी ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 12-04-2026
पांचवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 05-04-2026
चौथी पुस्तक परिचर्चा (29-03-2026) का विवरण यथा पुस्तकें एवं शामिल पुस्तक साथियों के नाम और इनपुट्स
मानव हो, न मानविकी से दूर रहो (कविता)
क्यों शामिल हों पुस्तक परिचर्चा मे ? कुछ जरूरी जो पाया जा सकता है, एक दृष्टि |
शुभकामनाएँ और धन्यवाद
लवकुश कुमार
बीते रविवार (19-04-2026) को हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से सातवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:




न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है - ख़ुमार बाराबंकवी

अकेलेपन का डर हमें अक्सर हमारे जीवन को अन्य वस्तुओं से भरने
पर मजबूर कर देता है। वहीं से उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति का जन्म
होता है, जिसके कारण हमें जीवन में न जाने कितना दुःख भोगना
पड़ता है। यदि इस डर को गहराई से समझा जाए तो जीवन सरल
और बोधपूर्ण हो जाएगा। यह किताब हमें उस डर के पार ले जाने का
एक प्रयास है। - अकेलापन और निर्भरता पुस्तक के कवर पृष्ठ से
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
योगेश बिष्ट (किताबवाला दोस्त), अवनीश त्रिपाठी, हिमांशु जोशी, लाल बहादुर, अमितेन्द्र सिंह, कर्ण भाईजी(लिटरेरी लैंड), सौम्या मैम, सिद्धि तिवारी मैम, सचिन सिंह, शिवम राय, अंशुल, शोभित, आशुतोष, राजन वर्मा, आशुतोष श्रीवास्तव,अरविंद कुमार, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, उमा जायसवाल और लवकुश|

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 26 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (12-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से छठी साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
अगली परिचर्चा 19 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
सौम्या मैम, आंशिका मैम, प्रदीप छाजेड़ भैया, अंकित, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु और लवकुश।

प्रदीप भैया ने कई कविताओं के द्वारा मानवीय संबंधों में समुचित संचार (proper communication) की जरूरत पर प्रकाश डाला।

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
धन्यवाद
-लवकुश कुमार

बीते रविवार (05-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से पाँचवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा,

जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों/विचारों पर सार्थक चर्चा हुयी:
·हिमांक और क्वथनांक के बीच - शेखर पाठक, नवारुण प्रकाशन, गाजियाबाद
·A Doctor's Experiments in Bihar - डॉ. तारू जिंदल, Speaking tiger Books
·अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) – महेश चन्द्र पुनेठा, समय साक्ष्य प्रकाशन देहरादून
·परीक्षा कक्ष के बाहर पड़े मोजे जूते (कविता)- महेश चन्द्र पुनेठा
·आपका बंटी – मनु भण्डारी (लघु उपन्यास)
·उमराव जान अदा- मिर्ज़ा हदी रुसवा (उपन्यास)
·अंतस - जरा ठहरिए (लेखों का संग्रह) – लवकुश कुमार, नोसन प्रकाशन चेन्नई

·पुस्तक हिमांक और क्वथनांक के बीच के संबंध में आदरणीय पुनेठा सर के शब्दों में – “इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हैं तो लगता है कि यह एक कठिन ही नहीं बेहद कठिन यात्रा थी। और ऐसी यात्राएं आदमी को आध्यात्मिक बना देती हैं और इस बात का एहसास करा देती हैं कि प्रकृति की विराटता के सामने मनुष्य एक कण के समान है। उसका सारा का सारा अहंकार चूर-चूर होकर रह जाता है। शेखर पाठक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रकृति की क्षमता और शक्ति के साथ मनुष्य की मर्यादा और सीमा का इतनी गहराई से पहली बार एहसास हुआ। पर इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रकृति जितनी भी विराट हो लेकिन मनुष्य का साहस उसके सामने कभी भी कम नहीं रहा। वह हार नहीं मानता है। पिछली असफलताओं से सीख लेते हुए फिर नयी चढ़ाई की तैयारी शुरू कर देता है।”

·A Doctor's Experiments in Bihar, डॉ. तारू जिंदल (मुंबई की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ) द्वारा लिखी गई एक प्रेरक पुस्तक है, जो बिहार के मोतीहारी के जिला अस्पताल और पटना के पास मसरही गाँव में उनके 2 साल के चुनौतीपूर्ण कार्यकाल का वर्णन करती है यह पुस्तक बिहार की वास्तविक सार्वजनिक स्वास्थ्य स्थिति और एक समर्पित डॉक्टर के संघर्ष की कहानी बताती है, वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय सिद्धेश्वर सिंह सर ने इस किताब को पढ़ने का सुझाव दिया न केवल चिकित्सा के पेशे से जुड़े लोगों को बल्कि अन्य को भी इसे पढ्ना, समझ को विस्तार देने वाला बताया, सर ने आगे कुछ अन्य बातों पर भी ज़ोर दिया वस्तुतः


·धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी मौजूद रहे:
महेश चन्द्र पुनेठा सर, सिद्धेश्वर सिंह सर,अर्चना बेंज्वाल मैम, प्रदीप छाजेड़ भैया, शिल्पी मैम,शिवम राय, सौम्या मैम, सोनम मैम, प्रिया, अरविंद जी, आरती जी, अंशुल पांडे, निशांत शुक्ल जी, गायत्री,अंजना जी, कृष्णकांत जी,उर्मिला,शोभित, दिव्याशु एवं लवकुश|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
लिंक - हिमांक से क्वथनांक तक - पुस्तक समीक्षा
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
आइये ले चलते हैं आपको उक्त पुस्तक की समीक्षा और परिचय की तरफ जिसे लिखा है वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा जी ने, और जिसे पढ़ने के बाद मुझे भी लगा कि अब तो यात्रा वृत्तान्त भी पढ़ने हैं, आपको कैसा लगा जरूर बताइएगा| तो आइये मिलते हैं इस परिचय और समीक्षा यात्रा में:
गंगोत्री कालिंदीखाल यात्रा मार्ग उच्च हिमालय के कठिनतम यात्रा मार्गों में से एक है, जिसके चलते इस मार्ग पर कम ही यात्री जाते हैं। इतिहासकार, पर्यावरणविद और घुमक्कड़ शेखर पाठक ने वर्ष 2008 में अपने साथियों के साथ इस मार्ग में यात्रा की। वर्ष 2023 में इस यात्रा पर नवारुण प्रकाशन से उनकी एक किताब "हिमांक और क्वथनांक के बीच" नाम से आयी है।
शेखर पाठक अपनी भूमिका में कहते हैं कि - “यह हमारे जीवन की सबसे कठिन यात्रा थी। उच्च हिमालय ने कभी इस तरह नहीं डराया था हमें।”
इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हैं तो लगता है कि यह एक कठिन ही नहीं बेहद कठिन यात्रा थी। और ऐसी यात्राएं आदमी को आध्यात्मिक बना देती हैं और इस बात का एहसास करा देती हैं कि प्रकृति की विराटता के सामने मनुष्य एक कण के समान है। उसका सारा का सारा अहंकार चूर-चूर होकर रह जाता है। शेखर पाठक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रकृति की क्षमता और शक्ति के साथ मनुष्य की मर्यादा और सीमा का इतनी गहराई से पहली बार एहसास हुआ। पर इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रकृति जितनी भी विराट हो लेकिन मनुष्य का साहस उसके सामने कभी भी कम नहीं रहा। वह हार नहीं मानता है। पिछली असफलताओं से सीख लेते हुए फिर नयी चढ़ाई की तैयारी शुरू कर देता है।
वरिष्ठ कवि शैलेय की कविता यहां याद आती है...हताश निराश लोगों से/बस एक सवाल/एवरेस्ट ऊंचा कि बछेंद्री पाल।
यह किताब तेरह अध्यायों में बंटी है। इस मार्ग के साथ-साथ उत्तराखंड नेपाल हिमालय के बारे में बहुत कुछ बताती है। शेखर पाठक किताब में पिछली यात्राओं और उस दौरान मिले हुए लोगों को भी याद करते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र में की गयी अपनी पुरानी यात्राओं का विवरण भी देते हुए चलते हैं। पूरी किताब में अतीत और वर्तमान के बीच यह आवाजाही चलती रहती है, जिसके चलते यह काफ़ी रोचक और उपयोगी बन गयी है।
नयी-नयी आवाज़ों, दृश्यों और घटनाओं से हमारा परिचय होता है। इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हुए एकदम नये अनुभव मिलते हैं, जो केवल यात्रा करते हुए ही मिल सकते थे। यहीं पर मुझे किताबों का महत्व दिखाई देता है। किताबें हमें उन जगहों तक भी पहुंचा देती हैं, जहां हम स्वयं नहीं पहुंच पाते हैं। इतने कठिन मार्ग की यात्रा करना हरेक के लिए संभव नहीं होता है लेकिन ऐसे यात्रा वृत्तांतों के माध्यम से हम इन मार्गों के बारे में जान सकते हैं। अत्यंत निर्मम और निर्मोही एकांत में प्रकृति के कितने सारे रूपों को लेखक की नज़र से देख और सुन सकते हैं।
हमें इस यात्रा वृत्तांत में एक इतिहासकार भी दिखाई देता है। एक पर्यावरणविद भी, प्रकृति प्रेमी भी, सामाजिक सरोकारों से लैस एक जागरुक नागरिक भी, उच्च हिमालय के भूगोल का जानकार भी, साहित्य का अध्येता भी और एक आंदोलनकारी भी। पुस्तक में दिखाई देता है कि जब कोई इतिहासकार यात्रा वृत्तांत लिखता है तो उसके यात्रा वृत्तांत में एक सामान्य लेखक के यात्रा वृत्तांत से काफ़ी अंतर होता है। वह इस रूप में कि एक इतिहासकार द्वारा लिखे गये यात्रा वृत्तांत में जब भी किसी जगह, व्यक्ति या घटना का जिक्र आता है तो उससे जुड़ी हुई पुरानी घटनाओं का जिक्र भी प्रामाणिक तथ्यों सहित उसके साथ जुड़ता चला जाता है। शेखर पाठक बार-बार हमें इतिहास की ओर ले जाते हैं।
उनके द्वारा गंगोत्री कालिंदीखाल यात्रा मार्ग में पहली बार 24 जुलाई 1931 को आए कैप्टन इजी बरनी से लेकर 2007 में नीरज पंत द्वारा की गई यात्राओं का संक्षिप्त इतिहास और उनके संघर्षों तथा उनके द्वारा लिखे यात्रा साहित्य को इस पुस्तक में रेखांकित किया गया है। उन तमाम लोगों को याद किया गया है, जिन्हें इस यात्रा के दौरान अपनी जान गंवानी पड़ी। जानकारी के लिहाज से यह पुस्तक का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो आने वाले पथारोहियों और हिमालय साहित्य के पाठकों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
हमें विभिन्न स्थानों की ही यात्रा नहीं बल्कि उन स्थानों से जुड़े हुए व्यक्तित्वों की जीवन यात्रा भी करा देते हैं। जैसे जब वह उत्तरकाशी पहुंचते हैं तो वहां पर उन्हें विल्सन की याद आती है और इस बहाने वह विल्सन के बारे में बहुत कुछ बताते हुए चलते हैं। जोंकों द्वारा खून चूसने के प्रसंग तक का वर्णन कि कैसे जोंक चुपके से छिपकर खून चूसते हैं? कैसे उनसे बचाव होता है? बड़े रोचक ढंग से किताब में करते हैं।
इसी तरह यात्रा की पीड़ा परेशानियों के साथ-साथ लोगों द्वारा मिले हुए स्नेह को भी याद करते हैं। उनका यह याद करना बड़ा प्रीतिकर लगता है। जब वह पुरानी घटनाओं को बताते हैं तो ऐसा लगता है कि हम छोटी-छोटी कथाएं पढ़ रहे हों। इन कथाओं में स्मृतियों के साथ-साथ पूरी आत्मीयता और संवेदनशीलता झलकती है। यह तरीका यात्रा वृत्तांत को बहुआयामी और उपयोगी बना देता है। इतिहास के विद्यार्थियों को तो उसे बहुत सारी नयी जानकारियां मिल जाती हैं।
एक अच्छी बात यह है कि शेखर पाठक जी अपनी बात कहने का कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते हैं। जैसे चतुरंगी के साथ चलते हुए वह एक जगह से शिवलिंग शिखर के ऊपर बादलों को उड़ते हुए देखकर सागरमाथा और तेनजिंग का जिक्र करने लग जाते हैं। इसी तरह चिड़िया उड़ती देखते हैं तो अनूप साह और सालिम अली को याद करने लग जाते हैं। यात्रा में साथ चल रहे पोटर्स बलबीर कार्की, पूर्ण बहादुर शाही और अन्य के बहाने पोटर्स की स्थितियों, संघर्षों और नेपाल की राजनीति का जिक्र ले आते हैं। यह यात्रा वृतांत की इकरसता को तोड़ने और उसे अपने समय और समाज के सवालों से जोड़ने का अच्छा तरीका है। नमक लगी ककड़ी खाने जैसी लेखक के जीवन की छोटी-छोटी स्मृतियां, इस वृत्तांत में एक नया रस पैदा करती हैं।
साथ ही यात्रा मार्ग के बाहर के जीवन की झांकियां भी हमें यहां दिखाई देती हैं। जो लेखक की जीवन के प्रति गहरी रागात्मकता को बताती है। यहां यात्रा करते हुए लेखक के मन में तमाम जिज्ञासाएं, उत्सुकताएं और प्रश्न पैदा होते हैं। प्रकृति के रहस्यों को समझने की कोशिश में लेखक के मन में बाल सुलभ प्रश्न उठते हैं कि यह गल पहले बना होगा या यह शिखर? यहां शेखर पाठक एक चुटकी लेते हैं कि वही (बच्चे ही) सवाल पूछते हैं। हम बड़े ना सवाल पूछते हैं और न जवाब देते हैं। देश के सबसे जिम्मेदार लोगों में जवाब देने का निकम्मापन सबसे ज्यादा प्रकट हुआ है। इस तरह की पंक्तियां बताती हैं, वह किताब में मौजूदा समय और देश की राजनीतिक व्यवस्था पर टिप्पणी भी करते हैं। यहां उनके भीतर का एक सचेत नागरिक कुलबुलाने लगता है।
कहीं-कहीं वह व्यंग्य में भी अपनी बातें कहते हैं। जैसे एक जगह वह एवरेस्ट बेस कैंप का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि एवरेस्ट बेस कैंप में जाते हुए शोपियां के पास मैंने ऐसा ही निडर कस्तूरा मृग देखा था। जब मैंने उससे कहा, "अब तू चला जा कोई मार सकता है तो उसने पलट कर कहा कि क्या मैं उत्तराखंड में हूं कि जो मार दिया जाऊंगा। मैं शेरपाओं के इलाके में हूं और वह मेरे जीवित होने का अर्थ जानते हैं। मैं अपना सा मुंह लेकर रह गया। पर मैं उसे आंख भर देखता रहा फिर वह चलते-चलते दूसरी ओर निकल गया।" यह बात उनके ध्यान में भरलों के समूह को देखकर आया। वह लिखते हैं, "भरल निर्भय घूम रहे थे। हमें तीन दिन में चार या पांच भरल दल मिल गए थे। उन्हें गिनने का उत्साह घट गया था। उनका निर्भय होना दरअसल राहत देता था।
जनतंत्र में नागरिक भी यदि इसी तरह निर्भय हो जाए तो ठगी करने वाली राजनीति समाप्त हो सकती है या कहें कि ऐसी राजनीति के समाप्त होने पर ही ठगी बंद होगी।" इस तरह की चुटकियां लेना शेखर पाठक के स्वभाव में है। इस किताब में भी जगह जगह उनका यह स्वभाव प्रकट होता है।
शेखर पाठक यात्रा के दौरान नींद में देखे गये सपनों का भी जिक्र इस किताब में करते हैं। अधिकांश सपने तो नींद खुलने के बाद याद नहीं रह पाए ऐसा बताते हैं। इन सपनों को पढ़ना भी रोचक है। लेखक की मनोदशा का अनुमान लगाया जा सकता है। शेखर पाठक यह भी बताते हैं कि जब भी उच्च हिमालय की यात्रा करते हैं तो उन्हें इस तरह के सपने अक्सर आते हैं। कोई मनोविश्लेषक इनको पढ़े तो मन की हलचलों और दबावों के बारे में बहुत कुछ विश्लेषित कर सकता है।
यात्रा वृत्तांतकार यदि भूगोल का जानकार होता है तो पहाड़, नदी, नाले, गधेरे, झील, ग्लेशियर आदि स्थलाकृतियां अपने नामों के साथ उतर आती हैं जैसे वे सारे लेखक के बचपन के यार दोस्त हों। यही बात पाठक जी के संदर्भ में सटीक बैठती है। वह खुद को गंगोत्री कालिंदीखाल बद्रीनाथ यात्रा मार्ग तक सीमित नहीं रखते हैं, बल्कि हिमालय क्षेत्र के अन्य भागों के भूगोल पर भी बात करते हैं। अन्य गलों, नदियों, शिखरों, तालों का जिक्र भी इस किताब में हमें मिलता है। केवल गंगा ही नहीं उसकी अन्य बहनों के बारे में भी सोचते हैं और पाठकों को उस बारे में बताते हैं। इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि गंगा नदी का इतना मान क्यों है पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में।
वह इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि जिस गंगा नदी को हम इतना पवित्र मानते हैं, उसी नदी को प्रदूषित करने से पीछे नहीं रहते हैं। हमने गंगा को दुनिया की सबसे प्रदूषित दर्जन भर नदियों में से एक बना दिया है। वह हमारी आस्था पर भी सवाल उठाते हैं कि आखिर काल्पनिक उद्धार के चक्कर में प्रकृति के सुंदर स्थानों को कब तक गंदा करते रहेंगे? किताब में वह जगह-जगह उच्च हिमालय क्षेत्र और तीर्थ स्थान में आने को लेकर जो विश्वास और मान्यताएं प्रचलित हैं उनका उल्लेख करते हुए उन पर ज़रूरी प्रश्न खड़े करते हैं।
एक प्रकृति प्रेमी के द्वारा लिखा यह यात्रा वृत्तांत हमें हिमालय के चित्ताकर्षक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थानों को देखने के लिए प्रेरित करता है क्योंकि जगह-जगह शेखर पाठक जी ने उन स्थानों का जिक्र अपने इस यात्रा वृत्तांत में किया है, जहां का जादू उनको बहुत प्रभावित करता रहा है, जो उनके मन में स्थाई स्मृति की तरह पसरी है, जिसे वह हिमालय यात्री की पूंजी कहते हैं, जो सिर्फ बांटने से बढ़ती है। वह लिखते हैं कि खूबसूरत जगहें हमारे मन मस्तिष्क में अपना नाम लिख देती हैं और वह एक कविता, गीत या चित्र की तरह हमारे साथ सदैव रहती हैं।
ऐसी जगहें शायद हममें अधिक मानवीय गुण भरती हैं और प्रकृति के आगे विनम्र होने की समझ देती हैं। यह जगहें आदमी की रचनाएं नहीं हैं। आदमी और उसकी व्यवस्थाओं ने तो उनको कुछ न कुछ नष्ट करने की ज़रूर कोशिश की है| पर आत्मसात भी लगातार किया। एक प्रकृति प्रेमी ही इतनी आत्मीयता, गहरे सौंदर्यबोध और संवेदनशीलता से प्रकृति को देख सकता है।
शेखर पाठक साहित्य के गहरे अध्येता होने के चलते इस किताब में स्थान-स्थान पर न केवल चर्चित कविता पंक्तियां या कविता शीर्षकों को याद करते हैं बल्कि खुद कविता सी रचते चलते हैं। जो दृश्य वह रचते हैं, वे पाठक के मन और आंखों दोनों में बस जाते हैं। वह अभिभूत हो उठता है।
प्रकृति के प्रति गहरे लगाव के चलते शेखर पाठक, पत्थर मिट्टी के साथ पानी, हवा और सूरज के खेलों को न केवल खुद देखते और आनंदित होते हैं, बल्कि उन खेलों का आनंद पाठकों तक पहुंचाने में भी सफल रहते हैं। कितना सुंदर बिंब खड़ा करते हैं कि पत्थर, मिट्टी, रेत पर पानी का सूरज और हवा के बाजे के साथ गाया जा रहा कोरस आश्चर्य की तरह है। हैलो करती वनस्पतियां। उतार चढ़ाव ... आवाज़ पर भीतर लगातार बोलता हुआ यह विराट गल हमारे सामने था। अब हम सभी इसका हिस्सा हो गये थे। अग्नि से जीवन इसके ऊपर चल रहे थे। ये पंक्तियां बताती हैं कि लेखक कैसे प्रकृति से पूरा तादात्मीकरण स्थापित कर लेता है। तभी वह प्रकृति के रूप, रंग, गंध, स्पर्श, ध्वनि और स्वाद को पाठकों तक पहुंचाने में सफल होता है। इस तादात्म्य का ही प्रतिफल है यह यात्रा वृतांत।
एक अच्छा यात्रा वृतांत तब तक लिखना संभव नहीं है, जब तक यात्रा के दौरान दिखाई देने वाले दृश्यों, घटनाओं, लोगों और प्रकृति को पूरी तरह आत्मसात न कर लिया जाए।
प्रकृति का जहां-जहां चित्रण हुआ है, उनको बार-बार पढ़ने और महसूस करने का मन करता है। ऐसा अनुभव होता है कि पंख होते तो अभी उड़ कर वहां पहुंच जाते। ऐसा लगता है कि हम प्रकृति पर लिखी गयी कोई कविता पढ़ रहे हों। वह सही कहते हैं कि मनुष्य के लिए यह ज़रूरी है कि प्रकृति को सुनने के लिए वह स्वयं चुप रहना सीखे।
उच्च हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले भरल, हिमचितुवा, पीली चोंच वाले कौव्वे, दाढ़ी वाले गिद्ध ,गौरैया जैसी घने पंखों वाली चिड़िया, कठफोड़वा, रेड स्टार्ट बड़वा, रोजी पीट, गोल्डन स्टेटस रेड स्टार्ट, चूहा पीक जैसे पशु पक्षियों और कीट पतंगों का जिक्र इस यात्रा वृत्तांत में आता है। कुछ से तो पहली बार परिचय होता है। बहुत सारी ऐसी अजनबी चिड़ियों का भी जिक्र हुआ है, जिनके नाम भले लेखक को पता ना हों लेकिन उनका वह रूप, रंग, आकार, प्रकार बताते हुए चलते हैं। यह वृत्तांत उनके सौंदर्य और आदतों को जानने के प्रति हमें उत्सुकता से भर देता है। भरल तो इस किताब में बार-बार आता है। फूल जैसे सींगों के साथ आता है। उसी तरह कौवा भी। जैसे सहयात्री हो। यात्रा मार्ग में पशुओं को देख लेखक के मन में ये विचार उठते हैं कि हमारे समाज में मासूमियत कम बची है, जो बची हुई थी उसे धूर्त राजनीति में साफ कर दिया है। हम आजकल आक्रामकता से आगे प्रत्यक्ष हिंसा तक चले गये हैं। आदमी की जान की कोई कीमत नहीं। काश हम पशुओं में बची मासूमियत और विश्वास से ही द्रवित हो पाते।
एक पर्यावरणविद के नाते वह उच्च हिमालय क्षेत्र में जमा होते जा रहे प्लास्टिक, कूड़ा करकट, शराब और पानी की खाली बोतलों तथा अन्य तरह के अवशिष्ट को लेकर भी अपनी चिंता व्यक्त करते हैं। वह कहते हैं कि हमें सागरमाथा क्षेत्र के लोगों से सीखना होगा कि किस तरह अपने जंगली जीव बचाए जा सकते हैं? कैसे सौर ऊर्जा और केरोसिन का इस्तेमाल कर प्रकृति पर पड़ने वाले दबाव को घटाया जा सकता है? वह बार-बार वहां के लोगों विशेषकर शेरपाओं का उदाहरण देते हैं। इस किताब में बहुत सारे तथ्य भी हमें मिलते हैं। जैसे, गंगोत्री गल का 1818 से आज तक का आंकड़ा देते हैं, जिसके अनुसार 200 सालों में यह गाल 15 किमी से अधिक पीछे गया है। इस तरह के आंकड़े न केवल भविष्य के प्रति डराते हैं बल्कि सचेत भी करते हैं। सोचने को मजबूर करते हैं कि इसी तरह यदि गल सूखते चले गये तो हिमालय से निकलने वाली सदानीरा नदियों का क्या होगा? कहां से उनमें पानी आएगा? एक ओर गल पीछे खिसक रहे हैं दूसरी ओर इस क्षेत्र में पाए जाने वाले नौले, धारे और गधेरे मानवीय उपेक्षा और अनियंत्रित निर्माण कार्यों के चलते सूखते जा रहे हैं जो हिमालय की नदियों को रिचार्ज करने में सहायक होते हैं।
प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ और जबरदस्ती को लेकर शेखर पाठक सरकारों और समाज से तीखे प्रश्न करते हैं कि सरकारों या समाज को किसी नदी की हत्या करने या अधमरा बनाने का हक किससे मिला था? इस तरह के प्रश्न किताब में जगह-जगह मिलते हैं, जो लेखक की पर्यावरण की प्रति गहरी संवेदनशीलता, सरोकारों तथा चिंताओं को व्यक्त करते हैं। साथ ही वह प्रकृति और समाज में आ रहे बदलावों को रेखांकित करते हैं। उसके कारणों की पड़ताल करने की भी कोशिश हमें यहां दिखाई देती है। शेखर पाठक जी उत्तराखंड में समय-समय पर हुए भूस्खलनों का जिक्र करते हुए पाठकों को याद दिलाते हैं कि जो व्यक्ति, समाज या सरकार प्राकृतिक या अन्य मानव जनित आपदाओं या राजनीतिक तथा आर्थिक आपदाओं को भुलाते हैं, वह उन्हें पुनः पुनः भुगतने के लिए अभिशप्त रहते हैं और आगामी समय में भी रहेंगे। इस तरह वह हमें सचेत भी करते हैं। प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ और अवैज्ञानिक दोहन को लेकर एक जिम्मेदार नागरिक के दायित्व का निर्वहन भी करते हैं।
इस तरह से यह केवल विशुद्ध यात्रा वृतांत नहीं है, बल्कि अपने समय के सवालों से सीधे मुठभेड़ करता हुआ एक दस्तावेज है। किताब बीच-बीच में घुम्मकड़ी के दर्शन और उसके उद्देश्य पर भी बात करती है और बहुत सारे ज़रूरी सुझाव भी देती है। इन पर विचार किया जाए तो हिमालय क्षेत्र में की जाने वाली यात्राओं को यहां की प्रकृति और संस्कृति की दृष्टि से मित्रवत बनाया जा सकता है। उनकी सार्थकता को बढ़ाया जा सकता है।
किताब का 11वां और 12वां अध्याय इस किताब का केंद्रीय हिस्सा है। सबसे अधिक कौतूहल पैदा करने वाला हिस्सा। कुछ इस तरह का दृश्य है...लगातार 24 घंटे से एक ही स्पीड से गिरती हुई बर्फ। बर्फ के कुछ कम होने पर बढ़ती हुई बारिश। चारों ओर होते हुए भूस्खलन। पीछे लौटने और आगे बढ़ने दोनों में खतरा ही खतरा। यात्रा दल के साथियों के दिवंगत होने की घटनाएं। यात्रा दल में थे जो इधर-उधर बिखर चुके थे। कौन आगे गया और कौन पीछे रह गया इसका अंदाजा कोई नहीं कर पा रहा था। सभी इतने आत्म केंद्रित हो गये थे कि कभी-कभी किसी और का ख्याल ही नहीं आता था। पानी काट खाने को आ रहा था। यात्रियों की आंखों में भय था। मौत की आहट बिल्कुल नजदीक से सुनाई दे रही थी। पास में बहती नदी में इतना पानी बढ़ गया था कि वह अपना विकराल रूप दिखा रही थी। ठंड से यात्री थर थर कांप रहे थे। रोशनी बहुत कम हो चुकी थी। कुछ साथियों को दिखाई देना भी बंद हो गया था। कुछ साथियों का सामान नदी में गिर गया था। सामने ही यात्री दल के सदस्यों को ठंड से अकड़ते हुए और दिवंगत होते हुए देख रहे थे। असहाय से कोई किसी को बचाने की स्थिति में नहीं था। सामान भीग कर भारी हो रहा था। कुछ साथी अपने सामान को रास्ते में ही छोड़कर आगे बढ़ गये थे। महीन ओले पड़ रहे थे। फिसलने की संभावना ज्यादा बढ़ गयी थी। चलने की गति भी नहीं बढ़ाई जा सकती थी। सहायता के लिए आईटीबीपी के जवानों के आने की उम्मीद भी खत्म जैसी हो गई थी। पहाड़ के दोनों तरफ से पत्थर ही लुढ़क रहे थे।
ऐसा लगता है कि जैसे शेखर पाठक मृत्यु का रेखाचित्र हम लोगों के सामने प्रस्तुत कर रहे हों। इतने नजदीक से मृत्यु का साक्षात्कार अपने आप में दुर्लभ अनुभव है। मौत अट्टहास कर रही है और जीवन उसके सामने दया की मांग कर रहा है। मृत्यु हजार वेश धर रही है। यहां मृत्यु और जीवन जैसे दोनों अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं। दोनों ही अपनी अपनी जीत को सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हों। जीवन, गीत संगीत को मृत्यु से लड़ने के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। यह संघर्ष रोमांचित करने वाला भी है और डराने वाला भी। उस संघर्ष का आंखों देखा हाल पाठकों के सामने रखने में वह पूरी तरह सफल रहे हैं। उतार चढ़ाव भरी मनस्थिति का बहुत ही जीवंत और मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। जितना बारीकी से बाहर का उससे भी अधिक बारीकी से भीतर का भी। एक उदाहरण देखिए..."मौत हमारे आसपास मंडरा रही थी। वह किसी को भी दबोच सकती थी। यहां आज उसी का राज था। हमारे शरीर लगातार हिमांक के पास थे और हमारे मन मस्तिष्क में भावनाओं का उबाल क्वथनांक से ऊपर पहुंच रहा था।....हम शब्दों में कोई संवाद नहीं कर पा रहे थे। शब्द भी नहीं ढूंढ़ पा रहे थे। शब्द जैसे गायब हो गए थे और भावनाएं जैसे पथरा गई थी। यह लाटा हो जाने की निरीहता थी।....मैंने इतना बदहवास पराजित और हतप्रभ अपने को जीवन में कभी नहीं पाया था। बेचैनी और विडंबना भाव से मचलता मेरा चेतन अवचेतन क्वथनांक को पार कर रहा था। यह हम सब के मानस के ध्वस्त होने जैसा था। हमारा एक साथी हमारे साथ न था। शायद हम सब का मन मस्तिष्क ठहर सा गया था। जैसे एकाएक बिजली चली गयी हो या फ्यूज उड़ गया हो और टॉर्च या दियासलाई पास में न हो।"
किताब में यह सारा विवरण पढ़ते हुए भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बार-बार मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर इतनी कठिन परिस्थितियों और जान को जोखिम में डालकर कोई भला क्यों यात्रा करने इतने कठिन क्षेत्र में जाते होंगे? कैसे कोई इतनी कठिन परिस्थितियों से बचकर आने के बाद फिर से एक नई यात्रा में निकल पड़ता होगा?
यह किताब यात्रा किए जाने के लगभग 12 वर्ष बाद लिखी गई है, लेकिन आश्चर्य होता है कि इतने समय अंतराल के बाद लिखने के बावजूद यात्रा के विवरण इतनी बारीकी से आए हुए हैं। छोटी-छोटी बातों का उल्लेख हुआ है। लगता है जैसे कल की ही बात हो। निश्चित रूप से यह कमाल यात्रा के दौरान डायरी लिखने की उनकी आदत के चलते ही संभव हुआ होगा। यह यात्रा वृत्तांत लिखने वालों के लिए एक सीख है कि यात्रा के दौरान डायरी अवश्य लिखी जानी चाहिए, तभी "हिमांक और क्वथनांक के बीच" जैसी यात्रा पुस्तक संभव हो सकती है। इसी के चलते यह किताब हर आयु वर्ग के पाठकों के लिए इतनी उपयोगी बन पाई है। मैं पाठक जी की जिजीविषा, दृढ़ता, अनुशासन और काम के प्रति गंभीरता की दाद दूंगा कि उन्होंने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी डायरी लिखना नहीं छोड़ा। चलते-चलते थोड़ी देर सुस्ताने के दौरान ही वह डायरी लिखने लग जाते।
पुस्तक को पढ़ते हुए कहना पड़ेगा कि शेखर पाठक जी का भाषा को बरतने का अंदाज़ कमाल का है। छोटे-छोटे वाक्यों में बड़ी और गंभीर बात करने वाली भाषा। वह टकसाली भाषा में नहीं लिखते हैं। भाषा के साथ नये प्रयोग करते हैं। संदर्भ के अनुसार उनकी भाषा नये अर्थ देती है। एक सहज प्रवाह है उनकी भाषा में। कविता की तरह दृश्य बिंब खड़े करती है। रूपकात्मकता मन मोह लेती है। एक गद्य काव्य का जैसा आनंद आता है। किताब के नाम सहित, भीतर जितने भी अध्याय हैं, उनके शीर्षक बहुत काव्यात्मक हैं, जो पाठक को बहुत देर तक उस पर सोचने और उसके भीतर प्रवेश करने को आमंत्रित करते हैं। किताब में कहीं कहीं पर लोक बोली के शब्दों का आना भी बड़ा प्रीतिकर लगता है। वैसे शेखर पाठक जी का कहने का अंदाज़ भी कम प्रीतिकर नहीं है! वह बिल्कुल इस तरह से लिखते हैं, जैसे वह बोलते हैं। जिस तरह से उनके व्याख्यान बहुत सम्मोहित करने वाले होते हैं। इस यात्रा वृत्तांत की भाषा भी उसी तरह सम्मोहक है। किस्सागोई के अंदाज़ में अपने साथ बहाकर ले जाते हैं।
इस पुस्तक की एक खासियत यात्रा से संबंधित रंगीन एल्बम है, जिसमें चित्र बिल्कुल जीवंत से प्रतीत होते हैं। हिमालय के अभिभूत कर देने वाले सुंदर दृश्य इस एल्बम में मौजूद हैं। वहां के गल, झील, झरनों, हिमाच्छादित शिखरों, जीव जंतु और वनस्पतियों को देखने का प्रत्यक्ष सा आनंद घर बैठे ही ले सकते हैं। अद्भुत फ़ोटोग्राफ़ी है। कुछ ऐसे दुर्लभ जानवरों के फोटो भी हैं, जिन्हें देखने का बहुत सारे पाठकों को पहली बार अवसर मिलता है। इन चित्रों को देखकर यात्रा की दुरूहता और भयावहता को भी अधिक गहराई से समझा जा सकता है। इस पुस्तक के लगभग हर पेज में उपस्थित श्वेत श्याम चित्र भी कम सुंदर नहीं हैं। हर चित्र बहुत देर तक नज़रें गढ़ाए रखने के लिए विवश करता है। हर चित्र सही स्थान पर लगाए भी गए हैं। विवरण और चित्र दोनों एक दूसरे के पूरक की तरह आए हैं।
कुल मिलाकर इस पुस्तक में उच्च हिमालय क्षेत्र की प्राकृतिक सुषमा, यात्रा मार्ग की दुरूहता, साहसिक यात्राओं का रोमांस, उनकी कठिनाइयां, आसन्न मृत्यु की भयावहता, उससे लड़ने की जीवटता, साहस, प्रयत्न, जीवन की जिजीविषा, उम्मीद, हताशा, उत्साह जैसे मनोभावों के तमाम शेड्स, जीवन के अंतर्द्वंद्व, जीवन दर्शन, विकास और पर्यावरण का संघर्ष, इस तरह के तमाम भावों, विचारों और इंद्रियबोधों से इस किताब में गुज़रना होता है। एक ऐसी किताब जो बार-बार पढ़ने को आमंत्रित करती है और हर बार पहली बार पढ़ने सा आनंद देती है। कहीं-कहीं इसे पढ़ते हुए किसी हॉरर फ़िल्म को देखने जैसी अनुभूति होती है। दिल की धड़कन बढ़ जाती है। यह एक मुकम्मल यात्रा वृत्तांत है। इस सब के बावजूद इस किताब में बहुत कुछ आने से रह गया होगा जिसके बारे में खुद शेखर पाठक किताब में एक स्थान पर लिखते हैं, "बहुत कुछ हम सतत यात्रियों की आंखों और अनुभव में आने से इस बार भी रह जाएगा। हम कायनात के कुछ हिस्से ही देख पाते हैं और समझ तो और भी कम को पाते होंगे। कुछ रह भी जाना चाहिए। पूरी प्रकृति का डॉक्यूमेंटेशन मनुष्य द्वारा संभव नहीं है और यह उसे पा भी नहीं पाएगा।
- महेश चन्द्र पुनेठा
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा जी एक चिंतक, शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार हैं जो पढ़ने की संस्कृति के विकास, भयमुक्त और रचनात्मक शैक्षिक वातावरण और शैक्षिक दखल के अपने प्रयासों के लिए जाने जाते हैं, इनकी कवितायें संवेदित करने वाली और नींद से जगाने वाली रहती हैं, ऊपर आपने देखा कि पुस्तक समीक्षा इतनी जीवंत और समावेशी है कि बस तुरंत पुस्तक पढ़ने की तीव्र अच्छा उत्पन्न हो जाए| लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ पर क्लिक करें |
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शुभकामनाएँ
-लवकुश कुमार
विनम्र स्वभाव के धनी, चिंतक, शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा जी का परिचय कुछ इस प्रकार है:
जन्म तिथि 10 मार्च 1971
जन्म स्थान उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ के सिरालीखेत गाँव में जन्म हुआ। लेकिन सेना द्वारा भूमि अधिग्रहण किए जाने के कारण वहाँ अधिक रहने का अवसर नहीं मिला। अततः इसी जनपद के लम्पाटा गाँव में बसे।
एम. ए. (राजनीति शास्त्र) किया।
शैक्षिक योग्यता - प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा जनपद में ही ग्रहण करते हुए
प्रकाशित पुस्तकें - अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह), शिक्षा के सवाल(लेख) भय अतल में (कविता संग्रह), पंछी बनती मुक्ति की चाह (कविता संग्रह), दीवार पत्रिका और रचनात्मकता (शैक्षिक अनुभव) संयुक्त कविता संकलनों-स्वर एकादश, कवि द्वादश, स्त्री होकर सवाल करती है, लिखनी ही होगी एक कविता, में कविताएँ संकलित ।
त्रैमासिक पत्रिका 'संकेत' का एक कविता केंद्रित अंक।
इसके अलावा हिन्दी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविता, लघुकथा, समीक्षा तथा आलोचनात्मक आलेख प्रकाशित।
शिक्षा पर केंद्रित पत्रिका 'शैक्षिक दखल' का संपादन
अन्य
शैक्षिक सरोकार तथा हिमाल प्रसंग के साहित्यिक अंकों का संपादन।
जनपदीय काव्य प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से 'काव्यांकुर' नाम से एक कविता फोल्डर के संपादन एवं प्रकाशन से सम्बद्ध।
एस.सी.ई.आर.टी. उत्तराखंड द्वारा स्कूली शिक्षा हेतु तैयार करवाई जाने वाली पाठ्यपुस्तकों का लेखन व संपादन।
बच्चों के लिए रोचक एवं भयमुक्त शिक्षा के वातावरण सृजन एवं वैज्ञानिक चेतना के विकास के उद्देश्य से गठित 'रचनात्मक शिक्षक मंडल', 'शैक्षिक नवाचार मंच', 'दृष्टिकोण', 'शैक्षिक दखल समिति' आदि शैक्षिक संस्थाओं की स्थापना हेतु पहलकदमी।
बच्चों की रचनात्मकता को बढ़ाने और पढ़ने की आदत को विकसित करने के लिए 'दीवार पत्रिकाः एक अभियान' का संचालन, जो आज देश भर में काफी लोकप्रिय हो रहा है। देश के लगभग एक हजार दो सौ स्कूलों तक पहुँच चुका है। इसके चलते बच्चों में लेखन कौशल का काफी विकास देखा गया है।
- पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए गाँव-गाँव पुस्तकालय खोलने का अभियान।
- गाँवों में लोककथा यात्रा के माध्यम से लोककथा चौपाल का अयोजन।
संप्रति - रा.इ. का. देवलथल-पिथौरागढ़ में अध्यापन।
संपर्क - ईमेल - punetha.mahesh@gmail.com
स्रोत - साभार "शिक्षा के सवाल"- महेश चन्द्र पुनेठा, प्रकाशक - लोकोदय प्रकाशन, 65/44, शंकर पुरी, छितवापुर रोड, लखनऊ
ईमेल - lokodayprakahsan@gmail.com